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ये अभय तिवारी हर बार पास कैसे हो जाता है? रांची प्रोटेस्ट में फूटा JPSC छात्रों का गुस्सा, बोले- अब बात यहीं होगी

मूसलाधार बार‍िश में चना गुड़ खाकर प्रोटेस्ट में ट‍िके इन बच्चों का गुस्सा अब चरम पर है. अनशन के 13वें द‍िन मूसलाधार बारि‍श में टिके ये छात्र चना-गुड़ खाकर भी यहां रुकने को तैयार हैं. छात्रों ने कहा कि हम 500 रुपए कमाने वाले परिवार से आते हैं जीवन आसान नहीं है. छात्रों ने कहा कि वोअब आर-पार की जंग को तैयार हैं. पढ़ें- ग्राउंड रिपोर्ट. 

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रांची से ग्राउंड रिपोर्ट- मूसलाधार बार‍िश में भी ट‍िके बच्चे, नहीं टूटा हौसला
रांची से ग्राउंड रिपोर्ट- मूसलाधार बार‍िश में भी ट‍िके बच्चे, नहीं टूटा हौसला

मूसलाधार बारिश, वाटरप्रूफ टेंट और भूखे पेट जलता हुनर... झारखंड के युवाओं का यह आक्रोश अब केवल एक धरना नहीं, बल्कि अपनी किश्तों में बेची जा रही उम्मीदों की जंग बन चुका है. आंदोलन का ये 13वां दिन है. 1200 किलोमीटर दूर दिल्ली तक गूंज रही इस आवाज ने सरकार को घुटनों पर ला दिया है. चार मंत्रियों का प्रतिनिधिमंडल बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन सड़कों पर डटे छात्रों का एक ही फरमान है, 'बातचीत होगी तो इसी मंच पर, पूरे मीडिया और जनता के सामने होगी. बंद कमरों में अब सौदेबाजी नहीं होगी.'

छात्रों का कहना है कि जेल में 19 गिरफ्तारियां इस बात की मुहर हैं कि ओएमआर शीट बाहर आई थी और बैकडोर से भर्तियां बेचने की कोशिश हुई. अगर यह चौतरफा दबाव न होता, तो शायद यह धांधली भी फाइलों के नीचे दबा दी जाती.

'500 रुपये कमाने वाला बाप किताब लाए या रोटी?'
इस आंदोलन में शामिल अधिकतर छात्र किसी बड़े शहर के एलीट कोचिंग संस्थानों से नहीं, बल्कि राज्य के उन सुदूर इलाकों से आए हैं जहां आज भी बुनियादी सुविधाएं सपना हैं. दूर-दराज़ के गांवों में न ढंग के स्कूल हैं, न कॉलेज. किसी तरह पेट काटकर, शहर में 10x10 के कमरे में रहकर बच्चे महीनों चना-गुड़ खाकर तैयारी करते हैं.

फिर जब साल-दो साल में एक परीक्षा होती है, तो पेपर लीक हो जाता है या ओएमआर शीट में हेरफेर कर दी जाती है. छात्रों का आरोप है कि पिछली बार भी जब जांच की कमेटी बनी थी, तो बड़े मगरमच्छ बच निकले थे और छोटी मछलियों को बलि का बकरा बना दिया गया था.

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केस स्टडीज: तीन जिंदगियां, एक ही सवाल

केस 1. साहिबगंज के रहने वाले रमेश (बदला हुआ नाम) के पिता महीने में बमुश्किल 500-600 रुपये रोजाना की दिहाड़ी कमा पाते हैं. घर में चूल्हा जलना इस बात पर निर्भर करता है कि पिता को काम मिला या नहीं. रमेश ने 4 साल तक अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए ट्यूशन पढ़ाए. रमेश का सवाल है कि हमारा एक-एक दिन का खर्च हमारे परिवार का खून-पसीना है. जब हम परीक्षा देने केंद्र पहुंचते हैं, तो पता चलता है कि सीट पहले ही बिक चुकी है. हम किसके भरोसे जीएं?

केस 2. आंदोलन के मंच से उठ रहा यह सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है. गिरिडीह से आए आलोक का कहना है कि यह 'अभय तिवारी' कौन सा करिश्माई नाम है जो हर संदिग्ध परीक्षा की मेरिट लिस्ट में सबसे ऊपर आ जाता है? बिना पढ़े, बिना कोचिंग किए, बैकडोर से हर बार ऐसे ही नाम कैसे टॉप कर जाते हैं? क्या राज्य के ईमानदार और मेहनती बच्चों की तकदीर में सिर्फ लाठियां और बारिश में भीगना ही लिखा है?

केस 3. खूंटी से आई सुजाता बताती हैं कि जब साथियों का अनशन टूटता है, तो चार और छात्र खुद अनशन पर बैठ जाते हैं. स्थानीय लोग पिज्जा-बर्गर तो नहीं, लेकिन अपने छात्रों को भूखा न सोने देने के लिए चना और गुड़ लेकर पहुंच रहे हैं. सुजाता कहती हैं कि यह सिर्फ परीक्षा रद्द कराने की लड़ाई नहीं है, यह झारखंड के गरीब छात्र की अस्मिता की लड़ाई है.

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आज विधानसभा मार्च और सरकार के सामने सीधी चुनौती
आज विधानसभा के मानसून सत्र का पहला दिन है. छात्रों का एक धड़ा सीधे विधानसभा कूच करने की तैयारी में है, जबकि पुलिस प्रशासन उन्हें रोकने के लिए बैरिकेडिंग मजबूत कर रहा है.

छात्रों का रुख बिल्कुल साफ है कि मंत्रियों का प्रतिनिधिमंडल यहीं मंच पर आए और 10,000 छात्रों के सामने जवाब दे. अब पुरानी जांचों की तरह इस बार लीपापोती नहीं चलेगी, 'अभय तिवारी' जैसे तमाम संदिग्धों और सिंडिकेट का पर्दाफाश होना चाहिए. छात्रों ने ऐलान कर द‍िया है कि जब तक पूरी परीक्षा प्रणाली पारदर्शी नहीं होती, आंदोलन का टेंट यहीं गड़ा रहेगा.

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