आज भारत दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और 5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है. आजादी के बाद से भारत ने साल-दर-साल तरक्की की नई कहानी गढ़ी है. साल 1947 में जब देश आजाद हुआ, तो आम भारतीय के लिए अर्थव्यवस्था का मतलब जीडीपी के बड़े-बड़े आंकड़े नहीं, बल्कि रसोई का राशन और महीने का खर्च चलाना भर था. उस समय दो वक्त की रोटी और बच्चों की पढ़ाई का खर्च ही एक आम परिवार की सबसे बड़ी चुनौती हुआ करती थी.
लेकिन पिछले आठ दशक में देश की आर्थिक तस्वीर बदल चुकी है. आज जब हम भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का सपना देख रहे हैं, तो इस बदलाव का अहसास हरेक भारतीय को होता है. गांव-गांव में पक्के मकान, सड़क, बिजली, गैस सिलेंडर और बेहतर शिक्षा-स्वास्थ्य आर्थिक तरक्की की कहानी कह रही है.
आजादी के ठीक बाद देश के सामने कई चुनौतियां थीं. तबाह हो चुकी अर्थव्यवस्था को फिर से सही दिशा देने की जरूरत थी. अंग्रेजों ने भारत को एक ऐसे मोड़ पर छोड़ा था जहां भुखमरी, गरीबी और संसाधनों का अभाव था. लगभग हर चीज के लिए भारत दूसरे देशों पर निर्भर था.
आजादी के समय भारत की आर्थिक सेहत
दरअसल, अंग्रेजों के 200 वर्षों के शासन ने भारत के पारंपरिक उद्योग, हस्तशिल्प और कृषि व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था. 1700 ईस्वी में दुनिया की कुल जीडीपी में भारत का हिस्सा लगभग 27% हुआ करता था, जो आजादी के साल में सिमटकर महज 3% के आसपास रह गया था. देश की 80% से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रही थी, साक्षरता दर सिर्फ 12% थी.
1947 में आजादी के वक्त कृषि भारत की रीढ़ की हड्डी थी, जिसका देश की जीडीपी में योगदान लगभग 50% से अधिक था और देश की 70% से ज्यादा आबादी आजीविका के लिए खेती पर निर्भर थी. फिर भी उस दौर में देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था. देश में तकनीक और सिंचाई के साधन न के बराबर थे. भारत को जनता का पेट भरने के लिए अमेरिका से अनाज आयात करना पड़ता था. सूती वस्त्र और जूट जैसे कुछ गिने-चुने उद्योगों के अलावा देश में भारी उद्योगों और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी थी.
फिर कैसे बदली भारत की तस्वीर?
1960 के दशक में हरित क्रांति ने भारत को अनाज आयात करने वाले देश से निकालकर खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाया. जिसके बाद पिछले आठ दशकों में उद्योग और सर्विस सेक्टर के तेजी से बढ़ने के कारण जीडीपी में कृषि का हिस्सा घटकर अब लगभग 15-18% के पास आ गया है. लेकिन आज भी देश की लगभग 45% आबादी को रोजगार खेती से ही मिलता है. 330 मिलियन टन से अधिक अनाज उत्पादन के साथ कृषि आज भी भारत की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक मजबूती का सबसे बड़ा आधार है.
आजादी के बाद भारत ने हालात को देखते हुए सबसे पहले मिश्रित अर्थव्यवस्था को चुना. भाखड़ा नांगल जैसे बांध, आईआईटी, आईआईएम, एम्स और भिलाई-बोकारो जैसे स्टील प्लांट की नींव रखी गई. फिर 1960 के दशक में आई हरित क्रांति ने भारत को अनाज के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर बना दिया.
LPG आर्थिक सुधार
1990 से पहले कड़े नियमों और लाइसेंस राज के कारण आर्थिक विकास की रफ्तार औसतन 3.5% के आसपास रहती थी. उसके बाद भारत ने 'LPG सुधार' को अपनाया. क्योंकि 1991 में भारत विदेशी मुद्रा संकट से जूझ रहा था. ऐतिहासिक आर्थिक सुधार के तौर पर देश ने LPG यानी उदारीकरण (Liberalization), निजीकरण (Privatization) और वैश्वीकरण (Globalization) को अपनाने का फैसला किया गया, जिसे आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था का अहम मोड़ माना जाता है.
जिसके बाद लाइसेंस राज खत्म हुआ, विदेशी कंपनियों का भारत में आगमन हुआ और निजी क्षेत्र को बढ़ावा मिला. इसी दौर में भारत के आईटी (IT) और सर्विस सेक्टर ने दुनिया में अपना परचम लहराया, जिस आज हम आईटी क्रांति के तौर पर देखते हैं.
साल 2014 के बाद डिजिटल क्रांति ने इकोनॉमी को एक नई ताकत दी. डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी-भरकम निवेश हुआ. UPI, जनधन योजना और आधार के संगम से भारत ने वित्तीय समावेशन और डिजिटल भुगतान में दुनिया को राह दिखाई.
इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को 'मेक इन इंडिया' ने नई दिशा दी. मेक इन इंडिया और पीएलआई स्कीम ने इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और सेमीकंडक्टर निर्माण में भारत को ग्लोबल हब बनाना काम किया और अब सौर और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश किए जा रहे हैं.
ये आंकड़े देश के सामने सबूत
कुछ आंकड़े सबूत के तौर हैं, जो ये दर्शाता है कि भारत ने अपनी आर्थिक तस्वीर खुद बदली है. भारत 1947 में आर्थिक तौर पर बदहाल था, वही भारत अब केवल एक विकासशील देश नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक मंच पर एक निर्णायक शक्ति बन चुका है.
आर्थिक पैमाने पर देखें तो 1947 में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार (जीडीपी) करीब 2.7 लाख करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 4 ट्रिलियन डॉलर के आसपास है. आजादी के समय विदेशी मुद्रा भंडार शून्य हो चुका था, जो अब 600 बिलियन डॉलर से अधिक का है, उस समय भारत की गिनती दुनिया सबसे गरीब देशों में होती थी, आज दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है. शिक्षा के मोर्चे पर भी भारत ने खूब काम किया है. साल 1947 में सारक्षता दर महज 12 फीसदी थी, जो अब 77 फीसदी से भी अधिक है. इसलिए हर भारतीय इस आर्थिक तरक्की का भागीदार है, और उसे गर्व होना चाहिए कि वो भारतीय है.