आगरा का नाम सुनते ही सबसे पहले ताजमहल याद आता है. लेकिन इस शहर की एक और पहचान है. यहां बनने वाले जूते, चप्पल और दूसरे लेदर प्रोडक्ट. कभी यह काम छोटे घरों और वर्कशॉप तक सीमित था. आज यही कारोबार हजारों लोगों की जिंदगी बदल रहा है. इसकी बड़ी वजह बनी है उत्तर प्रदेश सरकार की 'वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडक्ट' (ODOP) योजना. इस योजना ने कारीगरों को ट्रेनिंग, आधुनिक मशीनें, आर्थिक मदद और बाजार तक पहुंच दिलाई है. इसका असर अब लोगों की कमाई में भी दिख रहा है.
आगरा देश के सबसे बड़े फुटवियर हब में गिना जाता है. यहां तैयार जूते और लेदर प्रोडक्ट भारत ही नहीं, विदेशों तक भेजे जाते हैं. संयुक्त आयुक्त उद्योग अनुज कुमार सिंह बताते हैं कि ODOP सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि कई योजनाओं का समूह है. शुरुआत में आगरा को लेदर और स्टोन एंड मार्बल हैंडीक्राफ्ट के लिए चुना गया था. बाद में नॉन-लेदर फुटवियर को भी इसमें शामिल किया गया.
आज आगरा से करीब 4 हजार करोड़ रुपये के लेदर उत्पाद निर्यात होते हैं. इस उद्योग से करीब 150 एक्सपोर्ट यूनिट्स जुड़ी हैं. वहीं 4 से 5 लाख लोगों की आजीविका इसी कारोबार पर निर्भर है.

जहां हुनर को मिल रही नई पहचान
किसी भी उद्योग की असली ताकत मशीनें नहीं होतीं. उसे आगे बढ़ाने वाले लोग होते हैं. इसी सोच के साथ शमशाबाद रोड के नवादा गांव में कॉमन फैसिलिटी सेंटर बनाया गया. यहां युवाओं को कटिंग, स्टिचिंग, फिनिशिंग, पैकेजिंग और आधुनिक मशीनों पर काम करने की ट्रेनिंग दी जाती है. सिर्फ काम सिखाया नहीं जाता, बल्कि अपना कारोबार शुरू करने का रास्ता भी बताया जाता है. ट्रेनर आकाश तोमर बताते हैं कि सेंटर में आने वाले कई युवाओं ने पहले कभी मशीन पर काम नहीं किया था. आज वही लोग बाजार में बिकने वाले प्रोडक्ट तैयार कर रहे हैं.

सिर्फ ट्रेनिंग नहीं, कारोबार शुरू करने में भी मदद
ODOP योजना का मकसद सिर्फ हुनर सिखाना नहीं है. योजना के तहत कारीगरों को बैंक से ऋण, 10 से 25 फीसदी तक सब्सिडी और मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना के तहत 5 लाख रुपये तक की मदद मिल सकती है. इसके साथ टूलकिट, सिलाई मशीन और देशभर की प्रदर्शनियों में हिस्सा लेने का मौका भी दिया जाता है. कोशिश यही है कि कारीगर नौकरी ढूंढने के बजाय अपना काम शुरू करें.

महिलाएं भी बन रही हैं आत्मनिर्भर
कॉमन फैसिलिटी सेंटर की सबसे अच्छी तस्वीर यहां प्रशिक्षण ले रहीं युवतियां हैं. कोई बैग बना रही है. कोई पर्स तैयार कर रही है. कोई वॉलेट पर काम कर रही है. कई महिलाएं पहली बार अपने हाथों से ऐसा सामान बना रही हैं, जो बाजार में बिक रहा है.
प्रशिक्षण ले रहीं लक्ष्मी बताती हैं कि पहले उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वह खुद अपने हाथों से ऐसे प्रोडक्ट बना पाएंगी. तीन महीने की ट्रेनिंग के बाद उनके अंदर आत्मविश्वास आया. अब उन्हें भरोसा है कि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं.
आगरा की पहचान सिर्फ ताजमहल तक सीमित नहीं है. इस शहर के हुनरमंद हाथ भी इसकी बड़ी ताकत हैं. ODOP योजना ने इन्हीं हाथों को नई तकनीक, ट्रेनिंग और बाजार से जोड़ा है. इसका असर अब कारीगरों की कमाई, उनके आत्मविश्वास और कारोबार में दिख रहा है. यह बदलाव बताता है कि अगर हुनर को सही मौका मिले, तो छोटे शहरों के कारीगर भी देश और दुनिया में अपनी पहचान बना सकते हैं.