महाराष्ट्र-आंध्र में सूखे का संकट... जानिए इससे हेल्थ, खेती, बिजनेस, इकोनॉमी और क्लाईमेट को कैसा नुकसान हैं

महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में 2026 के कमजोर मॉनसून और अल-नीनो के कारण भारी सूखा पड़ा है. महाराष्ट्र के 74 प्रतिशत तालुकों और आंध्र के आधे से ज्यादा मंडलों में सूखा घोषित है. फसलें मुरझाईं, पानी की कमी बढ़ी, स्वास्थ्य, खेती, कारोबार और अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा है.

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सिर्फ महाराष्ट्र या आंध्र प्रदेश में ही नहीं बल्कि कई अन्य राज्यों में सूखे की हालत है. राजस्थान के करौली में पानी निकालता किसान. (File Photo: PTI) सिर्फ महाराष्ट्र या आंध्र प्रदेश में ही नहीं बल्कि कई अन्य राज्यों में सूखे की हालत है. राजस्थान के करौली में पानी निकालता किसान. (File Photo: PTI)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 07 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 10:29 AM IST

भारत के दो महत्वपूर्ण राज्य महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश इस समय भारी सूखे की चपेट में हैं. 2026 के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून ने उम्मीद के मुताबिक बारिश नहीं दी. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार पूरे देश में मॉनसून की बारिश सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम रही, जो 2015 के बाद सबसे कमजोर मॉनसून है. 

इसमें अल-नीनो की भूमिका सबसे बड़ी मानी जा रही है. अल-नीनो प्रशांत महासागर के पानी के गर्म होने की स्थिति है, जिससे भारत में मॉनसून कमजोर पड़ जाता है. महाराष्ट्र सरकार ने 26 सितंबर 2026 को 358 तालुकों में से 265 तालुकों यानी करीब 74 प्रतिशत हिस्से को सूखाग्रस्त घोषित किया. 

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आंध्र प्रदेश ने 1 अक्टूबर को 688 मंडलों में से 388 मंडलों (लगभग 56 प्रतिशत) को सूखा घोषित किया, जिसमें 283 गंभीर और 105 मध्यम सूखे की श्रेणी में हैं. ये डेटा सरकारी आदेशों और राजस्व विभाग के आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित हैं.

बारिश की भारी कमी और पानी का संकट

महाराष्ट्र में जून से सितंबर के बीच सामान्य 970.9 मिमी बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन सिर्फ 798.2 मिमी हुई. यानी लगभग 18 प्रतिशत की कमी. मराठवाड़ा में यह कमी 38 प्रतिशत और विदर्भ में 27 प्रतिशत तक पहुंच गई. कुछ जिलों जैसे धाराशिव, बीड़, लातूर, हिंगोली में बारिश सामान्य की आधी भी नहीं हुई. 

आंध्र प्रदेश में जून से अगस्त तक सामान्य 424.3 मिमी के मुकाबले सिर्फ 197.6 मिमी बारिश हुई, जो 53.4 प्रतिशत की भारी कमी है. सेंट्रल वॉटर कमीशन के आंकड़ों के अनुसार आंध्र प्रदेश के जलाशयों में पानी का भंडारण पिछले साल के 88.6 प्रतिशत से घटकर सिर्फ 35.14 प्रतिशत रह गया है. 

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महाराष्ट्र में भी यह 89.22 प्रतिशत से 74.29 प्रतिशत पर आ गया. राज्य सरकार ने 16 अक्टूबर से शहरों और गांवों में कम से कम 10 प्रतिशत पानी की कटौती का आदेश दे दिया है. मुंबई जैसे बड़े शहरों में भी पानी बचाने के निर्देश जारी किए गए हैं.

खेती पर सबसे बड़ा झटका

खेती दोनों राज्यों की रीढ़ है. महाराष्ट्र भारत का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक राज्य है. देश के कुल सोयाबीन उत्पादन का करीब 48 प्रतिशत और तूर दाल का 39 प्रतिशत यहीं होता है. सूखे के कारण सोयाबीन, कपास, मक्का और तूर की फसलें बुरी तरह प्रभावित हुईं. 

मराठवाड़ा में सोयाबीन की पैदावार सामान्य की 40-50 प्रतिशत और विदर्भ में 60-70 प्रतिशत रहने का अनुमान है. कई इलाकों में 50 से 90 प्रतिशत फसल नुकसान की रिपोर्ट आई है. आंध्र प्रदेश में धान, मक्का, मूंगफली, कपास और नारियल की फसलें प्रभावित हुईं. 

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राज्य में सामान्य 25.6 लाख हेक्टेयर की जगह सिर्फ 20.4 लाख हेक्टेयर में ही बुआई हो पाई. यानी करीब 5.3 लाख हेक्टेयर जमीन खाली रह गई. किसानों को बीज, खाद और मजदूरी का नुकसान उठाना पड़ रहा है. चारे की कमी से पशुपालन भी संकट में है. महाराष्ट्र सरकार ने हजारों करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा की है, जिसमें फसल ऋण पुनर्गठन और बिजली बिल में रियायत शामिल है.

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स्वास्थ्य पर सूखे का सीधा असर

सूखा सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहता. पानी की कमी से पीने का साफ पानी दुर्लभ हो जाता है. इससे हैजा, डायरिया और अन्य जल जनित बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ जाता है. गर्मी बढ़ने और धूल भरी हवाओं से सांस की बीमारियां भी बढ़ती हैं. ग्रामीण इलाकों में महिलाओं और बच्चों को पानी लाने के लिए दूर जाना पड़ता है, जिससे थकान और कुपोषण का खतरा बढ़ता है. 

पशुओं के चारे और पानी की कमी से दूध उत्पादन घटता है, जिससे बच्चों को पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता. मानसिक तनाव भी बढ़ता है. महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में जनवरी से अगस्त 2026 के बीच 653 किसानों की आत्महत्या की रिपोर्ट आई है. ये आंकड़े स्थानीय प्रशासन और समाचार स्रोतों से आए हैं. लंबे समय तक सूखा रहने पर त्वचा संबंधी समस्याएं और आंखों में जलन जैसी शिकायतें आम हो जाती हैं.

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महाराष्ट्र भारत की अर्थव्यवस्था का करीब 14 प्रतिशत हिस्सा है. यहां बड़े उद्योग, बैंक और कंपनियां हैं. पानी की कटौती से फैक्टरियों को पानी बचाने और 30 प्रतिशत पानी रीसाइकल करने के निर्देश दिए गए हैं. इससे उत्पादन लागत बढ़ेगी. कृषि आधारित उद्योग जैसे तेल मिल, दाल मिल और चीनी मिल प्रभावित होंगे. 

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सोयाबीन और तूर की कमी से खाद्य तेल और दालों के दाम बढ़ सकते हैं, जिससे महंगाई का दबाव बढ़ेगा. आंध्र प्रदेश में भी खेती से जुड़े छोटे कारोबार, ट्रांसपोर्ट और मजदूरों की कमाई घटेगी. ग्रामीण मांग कम होने से पूरे बाजार पर असर पड़ेगा. 

राज्य सरकारों को राहत पैकेज पर भारी खर्च करना पड़ रहा है, जिससे बजट पर दबाव बढ़ेगा. विशेषज्ञों का अनुमान है कि फसल नुकसान और राहत खर्च मिलकर हजारों करोड़ रुपये का बोझ डाल सकते हैं.

क्लाइमेट और पर्यावरण पर लंबे समय का असर

सूखा सिर्फ इस साल की समस्या नहीं है. जलवायु परिवर्तन के कारण मॉनसून का पैटर्न बदल रहा है. लंबे समय तक बारिश न होने से मिट्टी की नमी खत्म हो जाती है. भूजल स्तर तेजी से गिरता है. आंध्र प्रदेश में भूजल स्तर पिछले साल की तुलना में 3 मीटर से ज्यादा नीचे चला गया है. पेड़-पौधे सूखने से पर्यावरण का संतुलन बिगड़ता है. 

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जंगल और हरियाली कम होने से तापमान और बढ़ता है. वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि बार-बार सूखा पड़ने से भूमि बंजर होने का खतरा बढ़ जाता है. अल-नीनो जैसी घटनाएं जलवायु परिवर्तन के कारण ज्यादा बार और ज्यादा तेज हो रही हैं. इससे भविष्य में भी ऐसे संकट आने की आशंका बनी रहती है.

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सरकारें राहत कार्य चला रही हैं. महाराष्ट्र में पानी की प्राथमिकता पीने के पानी और चारे को दी जा रही है. आंध्र प्रदेश में सूखा प्रतिरोधी फसलों और माइक्रो इरिगेशन को बढ़ावा दिया जा रहा है. लेकिन आम आदमी को समझना होगा कि पानी बचाना, कम पानी वाली फसलें लगाना और वर्षा जल संचयन जैसी आदतें अपनानी होंगी. 

यह संकट सिर्फ बारिश की कमी नहीं, बल्कि हमारी पानी की बर्बादी और जलवायु परिवर्तन का नतीजा भी है. समय रहते कदम उठाए गए तो नुकसान कम किया जा सकता है. नहीं तो स्वास्थ्य, खेती, कारोबार और आने वाली पीढ़ियों पर इसका बोझ और बढ़ेगा.

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