देश में एक अजीब लेकिन गंभीर स्थिति देखने को मिल रही है. कई राज्यों में भारी बारिश और बाढ़ से लोग परेशान हैं. नदियां उफान पर हैं. खेत जलमग्न हो रहे हैं. वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में भीषण सूखा पड़ा है. जमीन के नीचे पानी का स्तर लगातार गिर रहा है. सवाल है कि इतना पानी कहां जा रहा है? बाढ़ का पानी जमीन में क्यों नहीं समा रहा? ग्रांउडवाटर लेवल गिरने के पीछे वैज्ञानिक कारण क्या हैं?
महाराष्ट्र सरकार ने हाल ही में राज्य के 358 तालुकों में से 265 तालुकों यानी करीब 74 प्रतिशत क्षेत्रों में सूखा घोषित कर दिया है. राज्य के 36 जिलों में से 32 जिले गंभीर पानी की कमी से जूझ रहे हैं. जब किसी क्षेत्र में 21 दिनों से ज्यादा सूखा मौसम रहे, जून-जुलाई में बारिश 50% से कम हो और जून-सितंबर में 75% से कम हो, तो ट्रिगर-1 सक्रिय होता है. कृषि आयुक्त के अनुसार 24 सितंबर तक की बारिश की कमी और अन्य संकेतकों ने इस स्थिति की पुष्टि की.
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मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने प्रभावित गांवों का दौरा करने के बाद स्थिति को 'सूखे जैसी' से 'सूखा' में बदल दिया. यह स्थिति हाल के वर्षों में सबसे खराब में से एक है और 1972 के भीषण सूखे से तुलना की जा रही है.
अगर अगले दो हफ्तों में वापस जाती मॉनसून पर्याप्त बारिश नहीं लाती तो अगले नौ महीने चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं. खरीफ फसलें नष्ट हो चुकी हैं. पानी और चारे की भारी कमी है. सरकार ने 12 उपायों और रियायतों का पैकेज घोषित किया है, लेकिन फसल मुआवजा बाद में आएगा. विपक्ष और किसान संगठन तत्काल और ठोस मदद की मांग कर रहे हैं.
बाढ़ वाले इलाकों में भी भूजल क्यों नहीं बढ़ रहा?
अब मुख्य सवाल पर आते हैं. कई राज्यों में बाढ़ आ रही है, फिर भी जमीन के नीचे पानी कम क्यों हो रहा है? पानी कहां जा रहा है? सबसे बड़ा कारण है कि बाढ़ का पानी तेजी से बहकर नदियों और समुद्र में चला जाता है.
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शहरों और मैदानी इलाकों में कंक्रीट की सड़कें, इमारतें और पक्के निर्माण ने जमीन की सोखने की क्षमता बहुत कम कर दी है. पहले बारिश का पानी मिट्टी में समा जाता था. धीरे-धीरे भूजल को रिचार्ज करता था. अब ज्यादातर पानी सतह पर बहकर चला जाता है. इसे रन-ऑफ कहते हैं.
इसके अलावा नदियों पर बने बांधों और तटबंधों ने पानी के स्वाभाविक बहाव को बदल दिया है. बाढ़ का पानी नियंत्रित तरीके से फैलने के बजाय तेजी से नीचे की ओर जाता है. जंगलों की कटाई और मिट्टी कटाव ने भी जमीन की जल क्षमता घटा दी है. नतीजा यह है कि बाढ़ वाले इलाकों में भी भूजल रिचार्ज ठीक से नहीं हो पा रहा.
ग्रांउडवाटर लेवल गिरने के वैज्ञानिक कारण
ग्रांउडवाटर लेवल गिरने का सबसे बड़ा कारण पानी का अत्यधिक इस्तेमाल है. भारत दुनिया में सबसे ज्यादा भूजल निकालने वाला देश है. खेती के लिए ट्यूबवेल और बोरवेल से पानी निकाला जा रहा है. कई इलाकों में सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भरता 60-70 प्रतिशत तक पहुंच गई है. मॉनसून की बारिश असमान हो गई है.
कुछ जगहों पर बहुत ज्यादा बारिश हो रही है तो कुछ जगहों पर बहुत कम. जलवायु परिवर्तन के कारण मॉनसून पैटर्न बदल रहा है. लंबे समय तक सूखा और फिर अचानक भारी बारिश हो रही है. भारी बारिश मिट्टी में समा नहीं पाती और बाढ़ बन जाती है. वहीं सूखे इलाकों में बारिश कम होती है कि भूजल रिचार्ज ही नहीं हो पाता.
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महाराष्ट्र जैसे राज्यों में रॉक स्ट्रक्चर और मिट्टी की प्रकृति भी भूजल रिचार्ज को प्रभावित करती है. बेसाल्ट चट्टानों वाले इलाकों में पानी आसानी से अंदर नहीं जाता. औद्योगिक और घरेलू उपयोग के लिए भी भूजल का अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहा है. कई जगहों पर ग्रांउडवाटर लेवल हर साल कई मीटर गिर रहा है. कुछ क्षेत्रों में यह खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है.
असमान बारिश, जलवायु परिवर्तन और क्षेत्रीय अंतर
भारत में मॉनसून हमेशा एक समान नहीं रहता. पश्चिमी घाट, उत्तर-पूर्व और कुछ मैदानी इलाकों में ज्यादा बारिश होती है, जबकि मराठवाड़ा, विदर्भ, राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में बारिश कम रहती है. इस साल महाराष्ट्र में बारिश की भारी कमी ने सूखे की स्थिति पैदा की.
वहीं कुछ अन्य राज्यों में अधिक बारिश से बाढ़ आई. जलवायु परिवर्तन ने इस असमानता को और बढ़ा दिया है. तापमान बढ़ने से भाप ज्यादा बन रहा है, जिससे पानी भी तेजी से उड़ रहा है. मिट्टी की नमी कम हो रही है. अगर भूजल रिचार्ज के उपाय नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में स्थिति और बिगड़ सकती है. बाढ़ का पानी समुद्र में चला जाता है या वाष्पित हो जाता है, जबकि भूजल का भंडार खाली होता जा रहा है.
इस विरोधाभास को समझना और हल निकालना जरूरी है. सबसे पहले जल संरक्षण और भूजल रिचार्ज पर जोर देना होगा. तालाब, चेक डैम, रेन वाटर हार्वेस्टिंग और जंगल लगाने जैसे उपायों से बाढ़ के पानी को जमीन में समाया जा सकता है. खेती में पानी की बचत करने वाली तकनीकों जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा देना चाहिए. फसलों के साइकिल को बदलकर कम पानी वाली फसलों को प्राथमिकता देनी होगी.
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सरकार को सूखा प्रभावित किसानों को तत्काल आर्थिक मदद, मुआवजा और चारे-पानी की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए. महाराष्ट्र में घोषित राहत पैकेज को जल्द और प्रभावी तरीके से लागू करना जरूरी है. लंबी अवधि में नदी जोड़ो परियोजनाओं, वाटरशेड प्रबंधन और जलवायु अनुकूल नीतियों पर काम करना होगा.
जनता को भी जागरूक होना होगा कि पानी एक सीमित संसाधन है. बाढ़ और सूखा दोनों ही हमारे जल प्रबंधन की कमियों को उजागर कर रहे हैं. अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह संकट और गहराता जाएगा. पानी को बचाना और सही तरीके से इस्तेमाल करना ही इस समस्या का स्थायी समाधान है.
ऋचीक मिश्रा