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अल-नीनो इफेक्ट! बिहार से महाराष्ट्र तक लू, मौसिनराम-चेरापूंजी में इतनी बारिश, आखिर क्यों?

अल-नीनो से बिहार-महाराष्ट्र में भीषण लू पड़ रही है, जबकि मौसिनराम-चेरापूंजी में 53 व 47 सेमी बारिश हुई. जून में 41-46% बारिश की कमी है. मॉनसून की यह अनियमित पैटर्न जल संकट बढ़ा रही है.

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कोलकाता में बारिश के दौरान सड़क पार करते लोग. (Photo: PTI)
कोलकाता में बारिश के दौरान सड़क पार करते लोग. (Photo: PTI)

भारत में 2026 का मॉनसून सीजन शुरू होते ही मौसम का विचित्र पैटर्न दिखाई दे रहा है. एक तरफ बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य भारत के कई हिस्सों में भीषण लू की स्थिति बनी हुई है, जहां तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच रहा है. वहीं दूसरी तरफ पूर्वोत्तर भारत के मेघालय में मौसिनराम और चेरापूंजी जैसे इलाकों में रिकॉर्ड तोड़ बारिश हो रही है.

पिछले 24 घंटों में मौसिनराम में 53 सेंटीमीटर और चेरापूंजी में 47 सेंटीमीटर बारिश दर्ज की गई. यह पैटर्न अल-नीनो की मजबूत होती स्थिति का नतीजा है, जो भारत के मौसम को पूरी तरह से बिखेर रहा है. IMD के आंकड़ों के मुताबिक 20 जून 2026 तक देशव्यापी बारिश में 41 से 46 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है, जिससे कृषि, जल संसाधन और आम जनजीवन प्रभावित हो रहा है. 

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यह स्थिति सिर्फ मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और महासागर की परिस्थितियों का संयुक्त प्रभाव है. अल-नीनो प्रशांत महासागर में पानी के गर्म होने की घटना है, जो भारत में मॉनसून की हवाओं को कमजोर कर देता है. नतीजतन कुछ इलाकों में सूखा और गर्मी पड़ रही है, तो कुछ जगहों पर अत्यधिक नमी वाले बादल भारी बारिश ला रहे हैं.

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2026 में इसका प्रभाव क्यों इतना गंभीर?

अल-नीनो तब होता है जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में सतही पानी का तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री या उससे ज्यादा बढ़ जाता है. यह वैश्विक मौसम पैटर्न को बदल देता है. 2026 में NOAA और IMD के अनुसार अल-नीनो पहले से ही विकसित हो चुका है. यह सुपर अल-नीनो बनने की ओर बढ़ रहा है. 

Mawsynram Cherrapunji Rainfall

भारत में अल-नीनो आमतौर पर दक्षिण-पश्चिम मॉनसून को कमजोर करता है क्योंकि यह क्रॉस-इक्वेटोरियल हवाओं और सोमाली जेट को प्रभावित करता है. IMD ने इस साल मॉनसून के लिए 90 प्रतिशत LPA का पूर्वानुमान दिया है, जिसमें 60 प्रतिशत संभावना कम या अत्यधिक कम बारिश की है. जून के मध्य तक देश में 40-46 प्रतिशत बारिश की कमी हो चुकी है. मध्य भारत और उत्तर-पश्चिम में कमी और भी ज्यादा है. 

बिहार से महाराष्ट्र तक लू की मार

पूर्वी और मध्य भारत में गर्मी का प्रकोप चरम पर है. बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के कई जिलों में दिन का तापमान 42-48 डिग्री तक पहुंच रहा है. IMD के अनुसार जून 2026 में इन राज्यों में ऊपर औसत लू के दिन होने की संभावना है. 

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गर्मी का यह प्रकोप इसलिए बढ़ गया क्योंकि मॉनसून की उत्तरी सीमा आगे नहीं बढ़ पा रही. नमी की कमी और तेज धूप ने तापमान को और बढ़ा दिया. महाराष्ट्र में मॉनसून दक्षिणी हिस्सों तक सीमित है, जबकि विदर्भ और मराठवाड़ा सूखे की चपेट में हैं. किसान खरीफ फसलों की बुआई टाल रहे हैं. जलाशयों का जल स्तर तेजी से गिर रहा है. मुंबई जैसे शहरों में जल संकट गहरा रहा है, जहां जलाशय मात्र 9 प्रतिशत क्षमता पर हैं.

Mawsynram Cherrapunji Rainfall

मौसिनराम-चेरापूंजी में रिकॉर्ड बारिश 

दूसरी ओर पूर्वोत्तर भारत में स्थिति पूरी तरह अलग है. मेघालय के मौसिनराम और चेरापूंजी में पिछले 24 घंटे में 53 सेमी और 47 सेमी बारिश हुई है. यह क्षेत्र दुनिया के सबसे गीले इलाकों में शामिल हैं, जहां सालाना 10,000-12,000 मिलीमीटर बारिश होती है. लेकिन इस बारिश की तीव्रता असामान्य है.

कारण है कि अल-नीनो के बावजूद बंगाल की खाड़ी से नमी युक्त हवाएं पूर्वोत्तर की ओर मुड़ रही हैं. हिमालय की पहाड़ियां इन हवाओं को ऊपर उठाती हैं, जिससे ऑरोग्राफिक बारिश होती है. IMD की चेतावनी के अनुसार 25 जून तक पूर्वोत्तर भारत और सब-हिमालयन पश्चिम बंगाल में भारी से अत्यधिक भारी बारिश की संभावना है. इससे बाढ़, भूस्खलन और नदियों में उफान का खतरा बढ़ गया है. 

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भारत में मॉनसून की असमानता क्यों बढ़ रही है?

भारत का मॉनसून हमेशा से असमान रहा है, लेकिन जलवायु परिवर्तन ने इसे और बढ़ा दिया है. अल-नीनो के साथ इंडियन ओशन डाइपोल - IOD न्यूट्रल है, MJO प्रतिकूल स्थिति में है और पश्चिमी विक्षोभ भी कमजोर हैं. इन सबके मिले-जुले प्रभाव ने मॉनसून को रेंगने वाली स्पीड में ला दिया है. 

Mawsynram Cherrapunji Rainfall

IMD के आंकड़ों के अनुसार जून 2026 में देशव्यापी कमी 41 प्रतिशत के आसपास है. मध्य भारत में 50-55% कमी दर्ज की गई. इतिहास में देखें तो 1972, 2009 और 2015 जैसे मजबूत अल-नीनो वर्षों में भी ऐसी स्थिति बनी थी. लेकिन 2026 में सुपर अल-नीनो की आशंका इसे और गंभीर बना रही है.

जलवायु परिवर्तन की भूमिका और असर

वैश्विक तापमान बढ़ने से महासागर गर्म हो रहे हैं, जो अल-नीनो जैसी घटनाओं को तेज कर रहे हैं. गर्म हवा ज्यादा नमी सोखती है, जिससे जहां बारिश होती है वहां अधिक भारी बारिश होती है, जबकि अन्य क्षेत्र सूखे रह जाते हैं. यह ड्राई गेट्स वेटर, वेट गेट्स वेटर का सिद्धांत है.

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कृषि पर सबसे बड़ा खतरा है. खरीफ फसलें (धान, मक्का, सोयाबीन) मॉनसून पर निर्भर हैं. 40 प्रतिशत से ज्यादा कमी से बुआई प्रभावित हो रही है. जल संसाधन कम हो रहे हैं. लंबे समय में सूखा प्रतिरोधी फसलें, बेहतर सिंचाई और जल संरक्षण जरूरी हैं.

IMD के अनुसार जून के अंत में सोमाली जेट मजबूत हो सकता है, जिससे कुछ सुधार संभव है. लेकिन पूरा सीजन सामान्य से कम रहने की आशंका बनी हुई है. जलवायु परिवर्तन के युग में ऐसे विरोधाभासी मौसम पैटर्न सामान्य होते जा रहे हैं.

अल-नीनो 2026 ने भारत के मौसम को दो ध्रुवों पर बांट दिया है – एक तरफ जलती गर्मी, दूसरी तरफ बाढ़ लाती बारिश. यह घटना हमें याद दिलाती है कि प्रकृति संतुलन बिगड़ने पर कितनी अनिश्चित हो सकती है. बेहतर पूर्वानुमान, अनुकूलन रणनीति और पर्यावरण संरक्षण ही भविष्य की राह है. 

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