देश के कई बड़े शहरों में ग्राउंड-लेवल ओजोन प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है. छह साल के आंकड़ों के विश्लेषण में सामने आया है कि दिल्ली-NCR इस समस्या का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट बन गया है. वहीं चंडीगढ़, जयपुर, अहमदाबाद, मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु समेत कई शहर भी इसकी चपेट में हैं. बढ़ती गर्मी और प्रदूषण फैलाने वाली गैसों की वजह से ओजोन का स्तर बढ़ रहा है, जिससे लोगों की सेहत पर खतरा बढ़ सकता है.
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) ने 2021 से 2026 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, 1 मार्च से 10 मई 2026 के बीच देश के 25 बड़े शहरों का अध्ययन किया गया. इसमें 15 शहर ऐसे मिले, जहां गर्मियों के दौरान ग्राउंड-लेवल ओजोन का स्तर सरकार की तय सुरक्षित सीमा से ऊपर रहा.
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चंडीगढ़ में सबसे ज्यादा औसत ओजोन स्तर दर्ज किया गया. इसके बाद जयपुर, अहमदाबाद और भोपाल का स्थान रहा. वहीं मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहरों में भी ओजोन प्रदूषण तेजी से बढ़ता मिला. रिपोर्ट में कहा गया है कि अब यह समस्या सिर्फ उत्तर भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के दूसरे हिस्सों में भी फैल रही है.

ग्राउंड-लेवल ओजोन जमीन के पास बनने वाली एक हानिकारक गैस है. यह सीधे हवा में नहीं निकलती. जब वाहनों, फैक्ट्रियों, बिजलीघरों और ईंधन जलाने से निकलने वाली गैसें तेज धूप और गर्मी के संपर्क में आती हैं, तब आपस में मिलकर ओजोन बनाती हैं. ज्यादा मात्रा में यह गैस इंसानों, फसलों और पर्यावरण तीनों के लिए नुकसानदायक मानी जाती है.
दिल्ली-NCR सबसे बड़ा हॉटस्पॉट
दिल्ली-NCR इस समय ग्राउंड-लेवल ओजोन प्रदूषण का सबसे बड़ा क्षेत्रीय हॉटस्पॉट बन गया है. स्टडी के दौरान पूरे 71 दिनों तक यहां ओजोन का स्तर सरकार की तय सुरक्षित सीमा से ऊपर रहा. दिल्ली के अलावा ग्रेटर नोएडा, नोएडा और गाजियाबाद के कई मॉनिटरिंग स्टेशनों पर भी लगातार ज्यादा ओजोन दर्ज किया गया. अब यह प्रदूषण सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे NCR में फैल चुका है.
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कई घंटों तक बना रहता है ओजोन
स्टडी में सामने आया कि सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि ओजोन कितने दिनों तक बढ़ा. यह भी जरूरी है कि एक दिन में वह कितनी देर तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है. जितनी देर ओजोन हवा में रहता है, उतनी देर लोग भी उसके संपर्क में रहते हैं. भोपाल में औसतन 17 घंटे तक ओजोन का स्तर तय सुरक्षित सीमा से ऊपर रहा. लखनऊ में यह समय 16.3 घंटे दर्ज किया गया. वहीं मुंबई और बेंगलुरु में भी करीब 15.9 घंटे तक ओजोन का स्तर ज्यादा रहा.
पहले माना जाता था कि ओजोन प्रदूषण सिर्फ दिन में ज्यादा होता है, लेकिन अब कई शहरों में इसका असर रात में भी बना रहता है. दिल्ली-NCR में सबसे ज्यादा 46 रातों तक ओजोन का स्तर तय सीमा से ऊपर दर्ज किया गया. इसके बाद बेंगलुरु में 14, भोपाल में 13 और पटना व मुजफ्फरपुर में 8-8 रातों तक ज्यादा ओजोन रिकॉर्ड किया गया. इसका मतलब है कि लोगों का प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने का समय लगातार बढ़ रहा है.

ओजोन क्यों बढ़ रहा है?
वाहनों, फैक्ट्रियों, बिजलीघरों, घरों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन और कचरा या फसल के अवशेष जलाने से कई तरह की गैसें निकलती हैं. इनमें नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), VOC और कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) शामिल हैं. जब ये गैसें तेज धूप और ज्यादा गर्मी के संपर्क में आती हैं, तो आपस में मिलकर ग्राउंड-लेवल ओजोन बनाती हैं. इसलिए गर्मियों में इसका स्तर तेजी से बढ़ जाता है.
ज्यादा ओजोन फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है. इससे सांस लेने में दिक्कत, अस्थमा की परेशानी बढ़ना, गले और सांस की नली में जलन जैसी समस्याएं हो सकती हैं. लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से दिल और फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है. इसका असर खेती पर भी पड़ता है. ओजोन की वजह से पौधों की बढ़त प्रभावित होती है और गेहूं जैसी फसलों की पैदावार हर साल 14% से 15% तक कम हो सकती है.
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क्या करना होगा?
रिपोर्ट में कहा गया है कि सिर्फ धूल और PM2.5 को कम करना काफी नहीं होगा. ओजोन बनाने वाली गैसों के इमिशन को भी घटाना होगा. इसके लिए वाहनों, फैक्ट्रियों, घरों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन, कचरा और फसल के अवशेष जलाने से होने वाले प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण जरूरी है. वायु प्रदूषण से निपटने की मौजूदा प्लानिंग में ओजोन को भी शामिल करने की जरूरत बताई गई है.
बढ़ती गर्मी के साथ ग्राउंड-लेवल ओजोन प्रदूषण अब देश के कई शहरों में तेजी से फैल रहा है. अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में इसका असर लोगों की सेहत, खेती और पर्यावरण पर और ज्यादा पड़ सकता है. रिपोर्टः साक्षी प्रजापति