दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग यानी धरती के तापमान में बढ़ोतरी तेजी से हो रही है. कोयला, पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधन जलने से निकलने वाली गैसें धरती को गर्म कर रही हैं. इसका असर जंगलों, समुद्र और मौसम पर पड़ रहा है. जर्मनी के पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के डायरेक्टर जोहान रॉकस्ट्रॉम ने चेतावनी दी है कि आने वाले कुछ सालों में धरती का औसत तापमान औद्योगिक दौर से पहले के स्तर के मुकाबले 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ने की सीमा पार कर सकता है. इससे लू, भारी बारिश और खराब मौसम की दूसरी घटनाएं ज्यादा बार हो सकती हैं.
रॉकस्ट्रॉम ने मंगलवार को एक कॉन्फ्रेंस में कहा कि अमेजन के जंगलों और कोरल रीफ को इतना नुकसान पहुंच सकता है कि उन्हें दोबारा पहले जैसा बनाना मुश्किल हो जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि अटलांटिक महासागर में पानी के बहाव से जुड़े सिस्टम पर भी खतरा बढ़ रहा है. उनके मुताबिक, ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए प्रदूषण कम करने के साथ-साथ प्रकृति को बचाना भी जरूरी है.
धरती का तापमान बढ़ने का असर सिर्फ गर्मी बढ़ने तक सीमित नहीं है. इससे बारिश, सूखा और समुद्र से जुड़े प्राकृतिक सिस्टम में भी बदलाव हो सकते हैं. तापमान बढ़ने से लू और भारी बारिश जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है. इसका असर इंसानों के साथ पेड़-पौधों और जानवरों पर भी पड़ता है.
रॉकस्ट्रॉम के मुताबिक, दुनिया अगले कुछ सालों में तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी की सीमा पार कर सकती है. यह बढ़ोतरी औद्योगिक दौर से पहले के औसत तापमान के मुकाबले है. इसका मतलब यह नहीं है कि हर जगह तापमान 1.5 डिग्री बढ़ जाएगा, बल्कि पूरी दुनिया के औसत तापमान में इतनी बढ़ोतरी होगी.

अमेजन के जंगलों और कोरल रीफ पर खतरा
अमेजन के जंगल दुनिया के सबसे बड़े उष्णकटिबंधीय जंगलों में शामिल हैं. ये हवा से कार्बन डाइऑक्साइड सोखने में मदद करते हैं और धरती के तापमान को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाते हैं. लेकिन बढ़ती गर्मी, जंगलों में आग और पेड़ों की कटाई से इन्हें नुकसान पहुंच रहा है. अगर जंगलों का बड़ा हिस्सा खत्म होता है, तो जलवायु परिवर्तन का खतरा और बढ़ सकता है.
कोरल रीफ समुद्र में रहने वाले कई जीवों का घर हैं. समुद्र का पानी ज्यादा गर्म होने पर कोरल अपना रंग खोने लगते हैं. इस प्रक्रिया को कोरल ब्लीचिंग कहते हैं. अगर पानी का तापमान लंबे समय तक बढ़ा रहता है, तो कोरल मर भी सकते हैं. इससे समुद्र में रहने वाले दूसरे जीवों को भी नुकसान पहुंच सकता है.
अटलांटिक महासागर के पानी पर भी खतरा
अटलांटिक महासागर में पानी का बहाव दुनिया के मौसम पर असर डालता है. इस सिस्टम का एक हिस्सा कैरेबियन क्षेत्र से गर्म पानी पश्चिमी यूरोप तक ले जाता है. इससे यूरोप के मौसम को प्रभावित करने में मदद मिलती है. रॉकस्ट्रॉम ने कहा कि इस सिस्टम के कुछ हिस्सों पर भी खतरा बढ़ रहा है. बढ़ती गर्मी और बर्फ पिघलने से समुद्र में मीठे पानी की मात्रा बढ़ सकती है. इससे पानी के बहाव में बदलाव आ सकता है. अगर ऐसा होता है, तो कई इलाकों के मौसम पर असर पड़ सकता है.

प्रदूषण कम करने के साथ प्रकृति बचाना भी जरूरी
रॉकस्ट्रॉम ने कहा कि कंपनियों को जलवायु परिवर्तन और प्रकृति को होने वाले नुकसान को एक साथ समझना चाहिए. उनके मुताबिक, कोयले, पेट्रोल और डीजल के इस्तेमाल को कम करने के साथ जंगलों, पेड़-पौधों, जानवरों और पानी के स्रोतों को बचाना भी जरूरी है.
उन्होंने पेट्रोल-डीजल से चलने वाली गाड़ियों को हटाने के नियमों में ढील देने की कोशिशों पर भी चिंता जताई. उनका कहना है कि पेट्रोल और डीजल पर मिलने वाली सब्सिडी से इलेक्ट्रिक गाड़ियों की मांग कम हो सकती है.
धरती की बढ़ती गर्मी को रोकने के लिए जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से होने वाले प्रदूषण को कम करना जरूरी है. इसके साथ जंगलों को बचाने, पानी के स्रोतों की रक्षा करने और प्राकृतिक संसाधनों का सही इस्तेमाल करने पर भी ध्यान देना होगा. संयुक्त राष्ट्र का COP31 जलवायु सम्मेलन 9 नवंबर से शुरू होना है.
इसमें जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपायों पर चर्चा होगी. रॉकस्ट्रॉम की चेतावनी है कि ग्लोबल वार्मिंग का असर केवल बढ़ती गर्मी तक सीमित नहीं रहेगा. इससे जंगलों, समुद्र और उन प्राकृतिक सिस्टम को भी नुकसान पहुंच सकता है, जिन पर इंसानों और दूसरे जीवों का जीवन निर्भर है.