अगस्त 2026 के अंत में नेपाल और तिब्बत के सीमावर्ती इलाके में एक बड़ी आपदा आई. लैंगटांग लिरंग पहाड़ से करीब दो वर्ग किलोमीटर चट्टान की दीवार और ग्लेशियर का हिस्सा अचानक ढह गया. इससे चट्टान-बर्फ का हिमस्खलन हुआ जो तेजी से मलबे वाली बाढ़ में बदल गया. बाढ़ ने नीचे की घाटियों में तबाही मचाई. 1400 लोग मारे गए और हजारों अभी भी लापता हैं. विश्व मौसम एट्रिब्यूशन (WWA) समूह के वैज्ञानिकों ने गुरुवार को कहा कि जलवायु परिवर्तन ने इस आपदा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
वैज्ञानिकों का कहना है कि क्षेत्र में तेजी से बढ़ते तापमान ने ग्लेशियरों को पतला कर दिया और हिमालय की चट्टानों में गहरी जमी बर्फ यानी पर्माफ्रॉस्ट को पिघला दिया. इससे ढलान कमजोर हो गई. हालांकि किसी एक घटना में जलवायु परिवर्तन की सटीक भूमिका बताना मुश्किल है, लेकिन गर्म तापमान ने इसे ज्यादा संभावित बना दिया.
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26 अगस्त को लैंगटांग लिरंग पहाड़ के उत्तर चेहरे पर करीब 5150 मीटर ऊंचाई पर चट्टान की दीवार और उसके ऊपर का ग्लेशियर टूटा. लाखों टन चट्टान और बर्फ घाटी में गिरी. टक्कर इतनी तेज थी कि यूएस जियोलॉजिकल सर्वे ने इसे 5.2 मैग्नीट्यूड के भूकंप के बराबर ऊर्जा वाला बताया.
शुरू में भूकंप समझा गया लेकिन बाद में साफ हुआ कि भूकंपीय संकेत खुद इस ढहने से पैदा हुए. मलबा नदी में गिरकर अस्थाई बांध बना, फिर टूट गया और तेज बाढ़ जो औसतन 188 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से नीचे की ओर बढ़ी. बाढ़ ने नेपाल और तिब्बत के कई इलाकों में घर, सड़कें और बिजली संयंत्र तबाह कर दिए.

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जलवायु परिवर्तन ने कैसे मदद की
WWA स्टडी के अनुसार अगस्त में हिमालय क्षेत्र का औसत तापमान सामान्य से करीब 5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा था. इसमें 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि जलवायु परिवर्तन के कारण हुई. जुलाई और अगस्त रिकॉर्ड में सबसे गर्म रहे. पिछले साल अक्टूबर-नवंबर में असामान्य बर्फबारी हुई थी. तापमान बढ़ने पर यह बर्फ पिघली और ज्यादा पानी पैदा किया जिसने दबाव बढ़ाया.
2000 से ग्लेशियर हर साल करीब आधा मीटर पतले हो रहे हैं. इससे चट्टान पर तनाव बदल गया. पर्माफ्रॉस्ट पिघलने से चट्टान की दीवार कमजोर हुई. 2015 के 7.8 मैग्नीट्यूड भूकंप ने भी चट्टान को कमजोर किया हो सकता है लेकिन इसका सटीक असर स्पष्ट नहीं.
वैज्ञानिक वाल्टर इमरजील ने कहा कि ढलान भूवैज्ञानिक रूप से कमजोर थी. भूकंप से और कमजोर हुई, लेकिन ग्लेशियर और पर्माफ्रॉस्ट के पीछे हटने तथा पिघले पानी और असाधारण गर्मी ने इसे और अस्थिर कर दिया.
फ्रीडरिके ओटो ने साफ कहा कि मानव जनित जलवायु परिवर्तन ने पर्माफ्रॉस्ट पिघलाने, ग्लेशियर पतला करने और बर्फ की जगह बारिश बढ़ाने के जरिए आपदा की पूर्व तैयारी में भूमिका निभाई. इसमें कोई संदेह नहीं.

हिमालय में तापमान वैश्विक औसत से ज्यादा से बढ़ रहा है. सालाना करीब दो डिग्री सेल्सियस बढ़ा है. ग्लेशियर पिछले दशकों में तेजी से पीछे हट रहे हैं. 2010 के बाद लैंगटांग लिरंग ग्लेशियर का सिकुड़ना तेज हो गया.
पर्माफ्रॉस्ट वाले ऊंचाई वाले क्षेत्र सबसे संवेदनशील हैं. ये बदलाव ढलानों को अस्थिर बना रहे हैं. ऐसे रॉक-आइस एवलांच पहले भी हुए हैं लेकिन जलवायु परिवर्तन उनकी संभावना और तीव्रता बढ़ा रहा है.
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क्यों महत्वपूर्ण है यह स्टडी
यह स्टडी बताती है कि जलवायु परिवर्तन सिर्फ गर्मी या बाढ़ नहीं बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों में जटिल भूगर्भीय आपदाओं को भी बढ़ा रहा है. नेपाल जैसे देशों के लिए यह चेतावनी है जहां हजारों लोग पहाड़ी घाटियों में रहते हैं. भविष्य में ऐसी घटनाएं बढ़ सकती हैं. वैज्ञानिकों का जोर है कि उत्सर्जन कम करना और स्थानीय निगरानी व्यवस्था मजबूत करना जरूरी है. पर्माफ्रॉस्ट और ग्लेशियरों की नियमित निगरानी से चेतावनी व्यवस्था बनाई जा सकती है.
आपदा के बाद पुनर्निर्माण में अरबों डॉलर लगेंगे. जलवायु न्याय की मांग भी उठ रही है क्योंकि कम उत्सर्जन वाले देश ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं. यह घटना साबित करती है कि ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव पहले से कहीं ज्यादा जटिल और घातक हो रहे हैं. हिमालय जैसी संवेदनशील जगहों पर सतर्कता और वैश्विक सहयोग दोनों जरूरी हैं.