नासा के लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर (LRO) ने चंद्रमा की सतह पर एक नया और विशाल क्रेटर खोज निकाला है. यह क्रेटर अप्रैल 11 से मई 22, 2024 के बीच बने किसी बड़े इम्पैक्ट से पैदा हुआ. वैज्ञानिकों ने इसे मैकगेटचिन क्रेटर नाम दिया है. यह 222 मीटर चौड़ा और औसतन 43 मीटर गहरा है.
यह सौर मंडल में हाल के समय में पाया गया सबसे बड़ा ताजा इम्पैक्ट क्रेटर है. ऐसे बड़े क्रेटर चंद्रमा पर औसतन हर 132 साल में एक बार ही बनते हैं. इसलिए यह खोज वैज्ञानिकों के लिए बहुत खास है. LRO कैमरा टीम ने पुरानी और नई तस्वीरों की तुलना करके इस क्रेटर को पहचाना. 2025 में वाइड एंगल कैमरा की इमेज में एक चमकदार धब्बा दिखाई दिया. फिर नैरो एंगल कैमरा से डिटेल तस्वीरें ली गईं.
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इससे पहले और बाद की तस्वीरों से साफ हुआ कि 2024 के वसंत में कोई बड़ा उल्कापिंड या धूमकेतु का टुकड़ा चंद्रमा से टकराया. यह टुकड़ा तीन से छह मंजिला इमारत जितना बड़ा हो सकता था. टक्कर से इतनी ऊर्जा निकली कि सतह पर गहरा गड्ढा बन गया.

क्रेटर कैसे बना और इसकी खासियत
मैकगेटचिन क्रेटर चंद्रमा के पूर्वी किनारे पर बना है. यह हाईलैंड और मारे (समतल ज्वालामुखी क्षेत्र) की सीमा के पास स्थित है. क्रेटर के आसपास चमकदार इजेक्टा ब्लैंकेट है. इम्पैक्ट से निकली चट्टानें और धूल सैकड़ों मीटर तक फैली हुई हैं. कुछ मलबा 120 किलोमीटर से भी दूर तक पहुंचा.
The Moon’s got a big new crater! 🕳️
— NASA Solar System (@NASASolarSystem) September 16, 2026
Spotted by NASA’s Lunar Reconnaissance Orbiter, the McGetchin crater formed when a rock as big as a six-story building crashed into the Moon. It’s 141 feet deep and wider than the length of two football fields.🪨💥🌕https://t.co/I2fX7bPts1 pic.twitter.com/Zft4mKUv1Z
वैज्ञानिकों ने पाया कि इम्पैक्ट से सतह पर 7 किलोमीटर चौड़ा एक ठंडा क्षेत्र (कोल्ड स्पॉट) भी बना. रात के समय यह क्षेत्र आसपास की तुलना में कुछ डिग्री ठंडा रहता है क्योंकि धूल ढीली हो गई है. जल्दी ठंडी पड़ती है. क्रेटर की दीवारें औसतन 24 डिग्री की ढलान वाली हैं, कुछ जगहों पर 40 डिग्री तक.
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किनारा औसतन 8 मीटर ऊंचा है. इम्पैक्ट से सतह के नीचे 20 मीटर से अधिक गहराई की सामग्री बाहर निकली. यह क्रेटर अभी बिल्कुल ताजा है. अंतरिक्ष के मौसम और छोटे उल्कापिंडों से अभी इसे नुकसान नहीं पहुंचा है. इसलिए यह इम्पैक्ट प्रक्रिया का अध्ययन करने के लिए एक बेहतरीन प्राकृतिक प्रयोगशाला है.

यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले LRO मिशन के दौरान पाया गया सबसे बड़ा नया क्रेटर सिर्फ 70 मीटर का था. मैकगेटचिन क्रेटर उससे तीन गुना बड़ा है. इससे इम्पैक्ट की मैकेनिक्स, इजेक्टा का फैलाव और सतह में बदलाव के मॉडल को सुधारने में मदद मिलेगी.
लगातार निगरानी की जरूरत
यह भविष्य में चंद्रमा पर मानवीय मिशनों और बेस बनाने के लिए भी उपयोगी जानकारी दे सकता है. अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ ने इसे मैकगेटचिन नाम दिया. यह नाम अपोलो युग के चंद्र वैज्ञानिक थॉमस मैकगेटचिन के सम्मान में रखा गया. उन्होंने इम्पैक्ट क्रेटरों से निकलने वाले मलबे के मॉडल पर महत्वपूर्ण काम किया था.
यह घटना बताती है कि चंद्रमा अभी भी सक्रिय है. छोटे-बड़े इम्पैक्ट लगातार होते रहते हैं. LRO जैसे ऑर्बिटर लगातार तस्वीरें लेकर इन बदलावों को पकड़ते हैं. बिना नियमित निगरानी के यह क्रेटर शायद लंबे समय तक अनदेखा रह जाता. वैज्ञानिक इस क्रेटर का और अध्ययन कर रहे हैं ताकि इम्पैक्ट प्रक्रिया को बेहतर समझ सकें.