इंडोनेशिया के बांग्का द्वीप पर करीब 90 साल से लापता माने जा रहे बांग्का स्लो लोरिस के जिंदा होने का पता चला है. यह एक छोटा जानवर है, जो ज्यादातर रात में बाहर निकलता है और पेड़ों पर रहता है. इसके काटने से इंसानों को भी गंभीर एलर्जी हो सकती है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, 2015 से 2025 के बीच इस द्वीप पर 90 से ज्यादा बांग्का स्लो लोरिस मिले हैं. इनमें से 86 को बचाने और इलाज करने के बाद वापस जंगल में छोड़ दिया गया. इस जानवर का आखिरी वैज्ञानिक रिकॉर्ड 1930 से 1932 के बीच मिला था.
साल 2020 में इस प्रजाति को उन जानवरों की सूची में रखा गया था, जिनके विलुप्त होने का बहुत ज्यादा खतरा है. उस समय इसके पूरी तरह खत्म होने की आशंका भी जताई गई थी. अब एक नए वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि यह जानवर बांग्का द्वीप के अलग-अलग इलाकों में अब भी जिंदा है. हालांकि, इस समय द्वीप पर इनकी कुल संख्या कितनी है, इसकी सही जानकारी नहीं है.
यह भी पढ़ें: 60 साल में 5 से 102 हुईं हीट स्टॉर्म, 367 दिन तक धरती को झुलसाती रही गर्मी
कैसा दिखता है बांग्का स्लो लोरिस?
बांग्का स्लो लोरिस का वैज्ञानिक नाम निक्टिसबस बैंकानस है. यह आकार में छोटा होता है. इसके शरीर पर लाल-भूरे रंग के बाल, बड़ी आंखें और चेहरे पर खास निशान होते हैं. यह पेड़ों पर रहता है और रात में खाने की तलाश करता है. यह जानवर पेड़ों पर बहुत धीरे-धीरे चलता है. यह बंदरों की तरह तेजी से एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर नहीं कूदता. वैज्ञानिकों के मुताबिक, इसका रिश्ता मेडागास्कर में पाए जाने वाले लीमर और अफ्रीका के गैलगो से ज्यादा करीब है. यह बंदरों और इंसानों से अलग प्राइमेट समूह का हिस्सा है.
Feared extinct, Bangka slow loris primate rediscovered in Indonesia https://t.co/CmKI709RUT https://t.co/CmKI709RUT
— Reuters (@Reuters) October 21, 2026
इसके काटने से इंसानों को भी खतरा
बांग्का स्लो लोरिस की सबसे खास बात यह है कि इसके काटने से जहर शरीर में पहुंच सकता है. स्तनधारी जानवरों में ऐसी खासियत बहुत कम देखने को मिलती है. इसकी कोहनी के पास खास ग्रंथियां होती हैं, जिनसे एक तरह का तरल निकलता है. यह जानवर अपने हाथों को मुंह तक ले जाकर इस तरल को लार के साथ मिलाता है.
इसके बाद काटने पर जहर शरीर में पहुंच सकता है. इसके काटने से इंसानों को गंभीर एलर्जी हो सकती है. कुछ मामलों में यह जानलेवा भी हो सकती है. दूसरी स्लो लोरिस प्रजातियों पर हुई रिसर्च में पता चला है कि ये जानवर दूसरे लोरिस से लड़ते समय और दुश्मनों से बचने के लिए भी जहर का इस्तेमाल कर सकते हैं.
यह भी पढ़ें: पहाड़ों पर जाने का तो नहीं बना रहे प्लान... 4 दिन होगी बारिश-बर्फबारी
10 साल में मिले 90 से ज्यादा जानवर
इंडोनेशिया के अलोबी वाइल्डलाइफ रेस्क्यू सेंटर ने 2015 से 2025 के बीच 90 से ज्यादा बांग्का स्लो लोरिस को बचाया या उनके बारे में जानकारी दर्ज की. ये जानवर द्वीप के अलग-अलग इलाकों में मिले. कई जानवर घरों, बगीचों, खेतों और सड़कों के आसपास पाए गए थे. कुछ जानवर बिजली के तारों से टकराकर गंभीर रूप से घायल हो गए थे. इनमें से कुछ की इलाज के दौरान मौत हो गई.
बाकी जानवरों की देखभाल की गई और ठीक होने के बाद 86 को वापस जंगल में छोड़ दिया गया. अलग-अलग जगहों पर इन जानवरों का मिलना बताता है कि यह प्रजाति अब भी द्वीप के कई इलाकों में मौजूद है. हालांकि, इनकी कुल संख्या जानने के लिए और सर्वे करने की जरूरत है.
यह भी पढ़ें: फ्रांस में मिराज 2000D फाइटर जेट क्रैश, एक पायलट की मौत, दूसरे की तलाश जारी
जंगल खत्म होने से बढ़ रहा खतरा
बांग्का स्लो लोरिस के लिए सबसे बड़ा खतरा जंगलों का कम होना है. इस द्वीप पर टिन निकालने के लिए खनन किया जा रहा है. इसके अलावा, पाम ऑयल के बागान बनाने के लिए भी जंगल काटे जा रहे हैं. इससे इस जानवर के रहने और खाने की जगह लगातार कम हो रही है. वैज्ञानिकों का कहना है कि सबसे पहले बचे हुए जंगलों को बचाना जरूरी है. इसके साथ ही द्वीप के अलग-अलग इलाकों में सर्वे करना होगा, ताकि पता चल सके कि यह जानवर कहां-कहां मौजूद है और इसकी आबादी कितनी है.
बांग्का स्लो लोरिस का दोबारा मिलना अच्छी खबर है, लेकिन इसके सामने खतरा अब भी बना हुआ है. अगर जंगलों को नुकसान पहुंचता रहा, तो आने वाले समय में इस प्रजाति के लिए जिंदा रहना मुश्किल हो सकता है. इसलिए इसके प्राकृतिक घर यानी जंगलों को बचाना जरूरी है.