धर्म और आस्था की नगरी काशी को बाबा भोलेनाथ की नगरी भी कहा जाता है. यहां बाबा विश्वनाथ के अनेक स्वरूपों में शिवलिंग स्थापित है, जिसका जिक्र द्वापर और त्रेता युग में भी मिलता है. काशी के प्राचीन शिव मंदिर को लेकर यहां मान्यता है कि इसका शिवलिंग एक वर्ष में तिल के बराबर बढ़ता है. मान्यता है कि मंदिर का शिवलिंग जितना जमीन के ऊपर है, उससे कहीं ज्यादा जमीन के नीचे भी है. औरंगजेब द्वारा एक बार मंदिर को क्षति पहुंचने की कोशिश की गई थी. लेकिन मंदिर में भौरों के हमले औरंगजेब के मंसूबों पर पानी फेर दिया.
तिल भाण्डेश्वर महादेव
वाराणसी के पांडे हवेली क्षेत्र में स्वयंभू शिवलिंग को तिलभाण्डेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है. कहते हैं कि यह शिवलिंग हर वर्ष मकर संक्रांति के दिन एक तिल के बराबर बढ़ता है. यही कारण है कि आज यह शिवलिंग विशाल आकार धारण कर चुका है. यहां दूध, जल और बेलपत्र अर्पित कर भक्त भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. यहां न सिर्फ वाराणसी, बल्कि दक्षिण भारत और विदेशों से भी श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते है.
60 फीट ऊंचाई पर तिल भाण्डेश्वर महादेव
तिल भाण्डेश्वर महादेव मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र है. सावन माह और प्रत्येक सोमवार को यहां दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है. मंदिर संचालकों के अनुसार, यह स्वयंभू शिवलिंग अनादि काल से अपने आकार में वृद्धि करता आ रहा है. मान्यता है कि द्वापर युग में यह शिवलिंग प्रतिदिन एक तिल के बराबर बढ़ता था. लेकिन कलयुग में यह वृद्धि केवल मकर संक्रांति के दिन होती है. शिवलिंग का दिखाई देने वाला भाग जमीन से लगभग 60 फीट ऊपर है. जबकि इसका आधार धरती के भीतर स्थित माना जाता है.
नवग्रह और 27 नक्षत्रों की शांति
ऐसा कहा जाता है कि तिल भाण्डेश्वर महादेव की पूजा-अर्चना करने से नवग्रह और 27 नक्षत्रों से जुड़े दोष शांत होते हैं. ऐसी भी मान्यता है कि जिन लोगों की कुंडली में ग्रह दोष होते हैं, वे यदि लगातार सोमवार के दिन यहां जलाभिषेक और दर्शन करें तो उन्हें विशेष लाभ प्राप्त होता है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि केदार खंड स्थित इस शिवलिंग की आराधना करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं.
द्वापर युग से जुड़ी है प्राचीन कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, इस स्थान पर विभांडा ऋषि भगवान शिव की कठोर तपस्या करते थे. वे प्रतिदिन भगवान शिव को तिल और गंगाजल अर्पित करते थे. एक दिन उनके पात्र में रखा सारा तिल भूमि पर बिखर गया, तभी उसी स्थान पर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए. चूंकि शिवलिंग का प्राकट्य तिल से हुआ था, इसलिए इसका नाम तिल भाण्डेश्वर महादेव पड़ गया. तभी से यह मान्यता चली आ रही है कि शिवलिंग हर वर्ष एक तिल के बराबर बढ़ता है.
इनपुट- सुरेंद्र कुमार गुप्ता