सावन का पावन महीना शुरू होते ही भगवान भोलेनाथ के प्रति लोगों की आस्था चरम पर है. हर-हर महादेव और ॐ नमः शिवाय के जयघोष से मंदिर गूंज रहे हैं. इसी दौरान कोटा के नांता क्षेत्र में स्थित करीब 500 साल पुराना प्राचीन शिवालय श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है. अपनी अनूठी वास्तुकला, दुर्लभ शिल्पकला, पौराणिक मान्यताओं और सदियों पुरानी परंपराओं के कारण यह शिवालय देशभर के शिव भक्तों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है. सावन के पूरे महीने यहां जलाभिषेक और दर्शन के लिए सुबह से देर रात तक भक्तों की लंबी कतारें लगी रहती हैं.
इस प्राचीन शिवालय की सबसे विलक्षण पहचान वो दुर्लभ शिल्पकृति है, जो इसे अन्य शिव मंदिरों से अलग बनाती है. यहां एक विशाल पत्थर की शिला को तराशकर शिवलिंग और भगवान शिव को अपना शीश अर्पित करते लंकापति रावण की प्रतिमा उकेरी गई है. इस तरह की प्रतिमा बेहद दुर्लभ मानी जाती है. प्रतिमा में रावण को अपनी शिवभक्ति की चरम सीमा पर पहुंचकर स्वयं का शीश काटकर भगवान शिव को समर्पित करते हुए दर्शाया गया है. यह दृश्य न केवल अद्भुत शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण है, बल्कि रावण की अटूट तपस्या और भगवान भोलेनाथ के प्रति उसकी अनन्य भक्ति का भी जीवंत प्रतीक माना जाता है.
जब रावण ने एक-एक कर अर्पित किए शीश
मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, लंकापति रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कैलाश पर्वत पर वर्षों तक कठोर तपस्या की. जब उसकी साधना से भी भगवान शिव प्रसन्न नहीं हुए, तो उसने अपनी भक्ति की अंतिम परीक्षा देते हुए एक-एक कर अपने शीश अर्पित करने शुरू कर दिए. रावण की इस अद्वितीय तपस्या और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ ने उसे दर्शन दिए, वरदान प्रदान किया और दिव्य चंद्रहास तलवार भेंट की. इसी पौराणिक प्रसंग को इस शिवालय की दुर्लभ शिल्पकला में सजीव रूप देकर सदियों से सुरक्षित रखा गया है.
शिवलिंग की सुरक्षा के लिए अनोखी परंपरा
करीब पांच शताब्दियों से आस्था का केंद्र बने इस शिवालय में जलाभिषेक की परंपरा भी बेहद अनूठी है. लगातार जल चढ़ाने से प्राचीन शिवलिंग को किसी प्रकार का क्षरण न हो, इसके लिए सावन के पहले सोमवार सहित विशेष पर्वों और अवसरों पर शिवलिंग को पीतल के विशेष पात्र से ढक दिया जाता है. श्रद्धालु उसी पात्र पर जल अर्पित करते हैं. इससे एक ओर शिवलिंग सुरक्षित रहता है तो दूसरी ओर सदियों पुरानी पूजा परंपरा भी अक्षुण्ण बनी रहती है.
सावन में दिनभर गूंजता है 'हर-हर महादेव'
सावन के प्रत्येक सोमवार को यहां तड़के मंगला आरती से लेकर देर रात तक भक्तों का सैलाब उमड़ता है. दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक कर बेलपत्र, धतूरा, पुष्प और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करते हैं. पूरा मंदिर परिसर हर-हर महादेव और ॐ नमः शिवाय के जयघोष से भक्तिमय वातावरण में डूब जाता है.
आस्था, इतिहास और दुर्लभ शिल्पकला
कोटा का यह 500 वर्ष पुराना शिवालय केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास, पौराणिक परंपराओं और अद्भुत भारतीय शिल्पकला का जीवंत धरोहर है. एक ही शिला में शिवलिंग और भगवान शिव को शीश अर्पित करते रावण की दुर्लभ प्रतिमा इसे विशेष पहचान देती है. सावन के पावन महीने में यहां पहुंचने वाला हर श्रद्धालु न केवल भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करता है, बल्कि सदियों पुरानी इस विरासत के दर्शन कर आध्यात्मिक शांति और दिव्यता का भी अनुभव करता है.