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राहुल गांधी की 'इंदिरा-स्टोरी' के बहाने समझिए क्या गले मिलने से गिरवी रख दिए जाते हैं राष्ट्र-हित?

राहुल गांधी ने पीएम मोदी की 'हग-डिप्लोमेसी' पर निशाना साधते हुए इंदिरा गांधी के 1982 में हुए अमेरिका दौरे का दिलचस्प किस्सा सुनाया. और यह समझाने की कोशिश की कि इंदिरा किस तरह राष्ट्रहित को हमेशा सर्वोपरि रखती थीं, जबकि प्रधानमंत्री मोदी सिर्फ झप्पी देने और निजी रिश्ते बनाने में विश्वास रखते हैं.

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इंदिरा गांधी और राष्ट्रपति रेगन की पत्नी नेंसी की ड्रेस के रंग का किस्सा डिप्लोमेसी की बहस बन गया है. (Photo- White House)
इंदिरा गांधी और राष्ट्रपति रेगन की पत्नी नेंसी की ड्रेस के रंग का किस्सा डिप्लोमेसी की बहस बन गया है. (Photo- White House)

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति और उनकी 'हग-डिप्लोमेसी' पर कटाक्ष करते हुए अपनी दादी इंदिरा गांधी और मां सोनिया गांधी के बीच की बातचीत का एक किस्सा साझा किया. राहुल के मुताबिक, 1982 के अमेरिकी स्टेट विजिट के दौरान जब इंदिरा गांधी व्हाइट हाउस के ऑफिशियल डिनर से लौटीं, तो उन्होंने सोनिया गांधी से कहा, "देखा, रोनाल्ड रीगन की पत्नी ने मेरी साड़ी के रंग से मिलती-जुलती ही ड्रेस पहनी थी." राहुल गांधी के अनुसार, इंदिरा गांधी ने आगे यह भी कहा था कि "ये अमेरिकन मुझे बेवकूफ समझते हैं, सोचते हैं कि मैं इनके बहकावे में आ जाऊंगी."

राहुल गांधी ने इस किस्से के जरिए यह बताने की कोशिश की कि इंदिरा गांधी अपनी फॉरेन पॉलिसी और नेशनल इंटरेस्ट को लेकर कितनी गंभीर और फोकस्ड थीं. जबकि प्रधानमंत्री मोदी दूसरे देशों के राष्ट्रध्यक्षों से गले मिलते हैं तो यह भूल जाते हैं कि दूसरे उनका गला दबा रहे हैं. पीएम मोदी की 'हग-डिप्लोमेसी' पर आगे बात करेंगे, पहले यह समझते हैं कि 1982 में यदि इंदिरा गांधी अमेरिकी नेतृत्व को लेकर इतनी चौकस क्यों थीं?

1966 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही इंदिरा गांधी ने अमेरिकी राष्ट्रपतियों के भारत-विरोधी रवैये को बेहद करीब से देखा और भुगता था. आइए समझते हैं कि उस दौर का जियो-पॉलिटिकल बैकग्राउंड क्या था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकारों की नजर में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में शिष्टाचार, डिप्लोमेसी और राष्ट्रहित को कैसे डील किया जाता है.

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1970-80 का वो भारी तनाव और अविश्वास वाला दौर

1982 में जब इंदिरा गांधी वाशिंगटन डीसी पहुंचीं, तो भारत और अमेरिका के संबंध गहरे रणनीतिक तनाव से गुजर रहे थे. 1966 से ही इंदिरा गांधी अमेरिकी नीतियों के दबाव का सामना कर रही थीं, लेकिन 1970 के दशक में यह तनाव चरम पर पहुंच गया. 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर का रवैया भारत के प्रति बेहद आक्रामक था.

पूर्व विदेश सचिव जे.एन. दीक्षित अपनी किताब 'इण्डियाज़ फॉरेन पॉलिसी एंड इट्स नेबर्स' में लिखते हैं कि 1970 का दशक भारत-अमेरिका संबंधों का सबसे कड़वा दौर था, जहां अमेरिका ने भारत को दबाने के लिए हर कूटनीतिक और सैनिक पैंतरा अपनाया. बाद में सार्वजनिक किए गए अमेरिकी व्हाइट हाउस के टेप्स से यह साबित हुआ कि किसिंजर और निक्सन ने इंदिरा गांधी और भारतीय नेतृत्व के लिए बेहद भद्दी और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया था. इसके अलावा अमेरिका ने भारत को डराने और पाकिस्तान की मदद करने के लिए बंगाल की खाड़ी में अपना नेवल फ्लीट भी भेज दिया था.

1981 में अमेरिका में रोनाल्ड रीगन राष्ट्रपति बने. इंदिरा गांधी जानती थीं कि भारत को अपनी तकनीकी जरूरतों, जैसे तारापुर परमाणु बिजलीघर के लिए ईंधन, और आर्थिक फायदों के लिए अमेरिका के साथ बातचीत का रास्ता खोलना होगा. सोवियत संघ के साथ 1971 की सुरक्षा संधि के बावजूद, भारत अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाना चाहता था.

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अमेरिकी कूटनीतिज्ञ हेनरी किसिंजर ने अपनी किताब 'डिप्लोमेसी' में लिखा है कि कूटनीति का असली मकसद भावनाओं को अलग रखकर ठंडे दिमाग से अपने राष्ट्रीय हितों को साधना होता है. यानी 1982 में नैंसी रीगन की ड्रेस को लेकर इंदिरा के जो भी विचार रहे हों, उनका शिष्टाचार दिखाना कूटनीति के लिहाज से 'आइस-ब्रेकर' ही माना जाएगा. भले बैकग्राउंड में इंदिरा गांधी अमेरिकी मंसूबों को लेकर पूरी तरह सतर्क रहीं हों.

Indira Gandhi-Fidel Castro
गुट-निरपेक्ष देशों के सम्मेलन में इंदिरा गांधी का क्यूबा के तत्कालीन राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो से गले मिलना चर्चा का विषय रहा था. क्योंकि, कोस्त्रो की पहचान घोर अमेरिका-विरोधी की थी.

फिदेल कास्त्रो और यासेर अराफात से प्रगाढ़ संबंधों के मायने

अमेरिका के साथ बातचीत की खिड़की खोलने के बावजूद, भारत ने अपनी गुटनिरपेक्ष छवि और आजादी से फैसले लेने की नीति से कोई समझौता नहीं किया. 1983 में नई दिल्ली में आयोजित गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) सम्मेलन के दौरान क्यूबा के कम्युनिस्ट और अमेरिका-विरोधी नेता फिदेल कास्त्रो ने सार्वजनिक मंच पर इंदिरा गांधी को गर्मजोशी से गले लगा लिया था. इसी तरह इंदिरा गांधी फिलिस्तीनी नेता यासेर अराफात को भी अपना 'छोटा भाई' मानती थीं और भारत ने इजरायल से किनारा करके फिलिस्तीन के मुद्दे का खुलकर समर्थन किया था.

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जाने-माने विद्वान जोसेफ नाई अपनी किताब 'सॉफ्ट पावर' में बताते हैं कि किसी देश का प्रभाव केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक, नैतिक और कूटनीतिक छवि से भी तय होता है. पश्चिम के दबाव के बावजूद अमेरिका के विरोधियों से गहरे संबंध यह दिखाते थे कि अमेरिका से मुस्कुराकर बात करने का मतलब उसके गुट में शामिल होना नहीं था, बल्कि यह भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का ही हिस्सा था.

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डिप्लोमेसी की भाषा और बॉडी लैंग्वेज के बुनियादी नियम

अंतरराष्ट्रीय संबंधों में नेताओं के उठने-बैठने और मिलने के तरीके का अपना रणनीतिक महत्व होता है. फिर चाहे हाथ मिलाना हो, मुस्कुराना हो या गले मिलना. येल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पॉल कैनेडी अपनी किताब 'द राइज एंड फॉल ऑफ द ग्रेट पावर्स' में बताते हैं कि बड़ी शक्तियां अपने आर्थिक और रणनीतिक संतुलन के लिए हमेशा बातचीत के लचीले रास्ते खुले रखती हैं.

आम धारणा यह होती है कि गले मिलना या मुस्कुराना किसी समझौते या दबाव में झुकने का संकेत है, जबकि जियो-पॉलिटिकल हकीकत यह है कि यह केवल बातचीत को आसान बनाने और अपनी शर्तें मनवाने के लिए जगह बनाने का जरिया है. उसी तरह तनाव या दूरी का मतलब यह नहीं होता कि दोनों देश हमेशा के लिए दुश्मन बन गए हैं, बल्कि इसका मतलब किसी खास मुद्दे पर असहमति होना होता है, जबकि पर्दे के पीछे बातचीत चलती रहती है. विदेश नीति में निजी रिश्ते राष्ट्रीय हित हासिल करने का एक जरिया होते हैं, न कि खुद राष्ट्रीय हित.

Modi-Putin-Zelensky
पीएम मोदी की झप्पी अब ग्लोबल दायरों से परे है. वो पुतिन और जेलेंस्की दोनों से एक तरह से मिलते हैं. (Photo- Reuters)

फॉरेन पॉलिसी: इंदिरा गांधी से नरेंद्र मोदी तक

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राहुल गांधी का बयान दो अलग-अलग दौर की कूटनीतिक शैलियों की तुलना सामने रखता है. दोनों ही दौर में भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत यही रहा है कि देश के फैसले भारत खुद तय करेगा. विदेश मंत्री एस. जयशंकर अपनी किताब 'द इंडिया वे: स्ट्रेटेजीज फॉर एन अनसर्टेन वर्ल्ड' में लिखते हैं कि वर्तमान मल्टी-पोलर वर्ल्ड में भारत को किसी एक खेमे में बंधने के बजाय 'मल्टी-अलाइनमेंट' (सबके साथ रिश्ते बनाना) का रास्ता अपनाना पड़ता है, ताकि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जा सके.

इंदिरा गांधी के दौर में दुनिया दो खेमों में बंटी थी, जहां भारत ने दो बड़ी ताकतों के बीच संतुलन बनाए रखा. अमेरिका से बातचीत करते हुए भी सोवियत संघ से सुरक्षा संबंध मजबूत बनाए गए. आज नरेंद्र मोदी के दौर में दुनिया में कई ताकतें हैं और भारत सबके साथ रिश्ते बनाने की नीति अपनाता है.

प्रधानमंत्री मोदी की विदेशी नेताओं के साथ 'हग-डिप्लोमेसी' और निजी रिश्ते बनाने के पीछे रणनीतिक लक्ष्य छिपे होते हैं. उदाहरण के तौर पर रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद रूस से तेल खरीदना जारी रखा और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ-साथ यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की से भी बातचीत बनाए रखी. इसके अलावा भारत एक तरफ अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ 'क्वाड' का हिस्सा है, वहीं दूसरी तरफ रूस और चीन के साथ 'ब्रिक्स' में भी मौजूद है.

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राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद से भारत-अमेरिका संबंधों में तल्खी आई है. दोनों देश अपने-अपने नेशनल इंट्रेस्ट की दुहाई देकर सालभर से ट्रेड एग्रीमेंट नहीं कर पा रहे हैं. इस हकीकत के बीच ट्रंप भारत के बारे में जो भी विचार रखते हों, वे अपने बयानों में प्रधानमंत्री मोदी को हमेशा डियर फ्रेंड, क्लोज फ्रेंड, ग्रेट लीडर कहकर संबोधित करते हैं.

ट्रंप के बयानों का ये मतलब नहीं कि वे मोदी या भारत के बहुत बड़े फैन हैं. लेकिन, डिप्लोमेसी में ये कहना पड़ता है. और ये बात मोदी भी बहुत अच्छे से जानते हैं.

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