कहानी उर्दू के उस शायर की जिसने अपनी ज़िंदगी में फैली बदसूरती को खूबसूरत चेहरों से ढकने की कोशिश की... उस शायर ने बचपन में क्या नहीं देखा... बाप के औरतें से नाजायज़ रिश्ते, चचा का कत्ल, मां की दूसरी शादी, बाप की मौत... सबकुछ... शायद इसीलिए जब वो लालकिले में बड़ा हो रहा था... और उसके इर्द-गिर्द रंगीनियां थीं... तो उसने उन्हें अपनी आगोश में ले लिया... कहने वालों ने उन्हें रसिया और बदकार कहा… छींटकशी की लेकिन इस सब के बावजूद उनकी पहचान सिर्फ उर्दू शायरी का PLAYBOY नहीं हो सकती... मेरा मानना है कि उनका कॉनट्रीब्यूशन जो अदब के लिए है, वो उन इल्ज़ामात से बहत बड़ा है... आदाब मेरा नाम है जमशेद क़मर सिद्दीक़ी और आज कहानी - बुलबुल-ए-हिंद, फ़सीह-उल-मुल्क नवाब मिर्ज़ा दाग़ और उन के रिश्तों की। (या तो कहानी को आगे पढें या इसी कहानी को वीडियो में देखें, वीडियो नीचे दी गयी है)
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पहले एक किस्सा सुनाता हूं। दाग़ साहब एक दोपहर अपने घर पर नमाज़ पढ़ रहे थे। उसी वक्त उनके दोस्त बशीर रामपुरी आए, देखा दाग़ नीयत बांधे खड़े हैं, सोचा वक्त लगेगा.. तो लौट गए। कुछ दिनों बाद जब मुलाक़ात हुई तो दाग़ ने यूं कहा पूछा, "क्या बशीर भाई, आपने तो घर आना ही छोड़ दिया” वो बोले, "अरे नहीं हुज़ूर, मैं तो उस दिन आपके घर आया था, लेकिन आप नमाज़ पढ़ रहे थे तो मैं चला गया" दाग़ बोले, "अरे तो मैं नमाज़ ही पढ़ रहा था, ला हौल वला कूवत थोड़ी पढ़ रहा था जो आप चले गए"
दाग़ देहलेवी की कहानी में सिर्फ कहकहे नहीं हैं, उदासी है, मायूसी है और एक मर्डर मिस्ट्री भी है... जिसने उनकी ज़िंदगी में बहुत कुछ तय किया। चलिए उसी मर्डर मिस्ट्री से शुरु करते हैं। तो बात यूं है साहब... आज भी दिल्ली के कश्मीरी गेट पुलिस स्टेशन के पुराने दस्तावेज़ों में एक मर्डर का केस दर्ज है। FIR में मर्डर का वक्त लिखा है - 22 मार्च 1835 की रात। क्या हुआ था उस रात... बताता हूं। कभी आप कश्मीरी गेट के पास चर्च रोड पर आगे बढ़ें तो आपको रेलवे का एक कंस्ट्रक्शन डिपार्टमेंट का दफ्तर दिखेगा... जिसकी छत गुंबदनुमा है... उस पर लिखा है ‘मुख्य प्रशासनिक अधिकारी (निर्माण) आज से 191 साल पहले यानि आखिरी मुगल बहादुर शाह ज़फर के वक्त ये बंग्ला था... एक बेहद ताकतवर ब्रिटिश ऑफिसर का... जो दिल्ली का कमिश्मर हुआ करता था - नाम था विलियम फ्रेज़र...आज भी उसका नाम फ्रेज़र हाउस ही है
तो साहब.... 22 मार्च 1835 की रात....विलियम फ्रेज़र ताज़ी हवा के लिए अपने बंग्ले के बाहर आया। अभी वो खड़ा ही था कि ठीक उसी वक्त रफ्तार में एक घुड़सवार वहां आया... जिसके पास एक कारबाइन बंदूक थी, अचानक घुड़सवार ने फ्रेज़र पर फायर किया और फरार हो गया.... विलियम फ्रेज़र... की मौत हो गयी।
Westminster Detective Library का एक ऑफिशियल दस्तावेज़ है जिसके मुताबिक... ब्रिटश सरकार इससे बहुत नाराज़ थी... फ़्रेज़र बड़ा अफसर था... अंग्रेज़ हुकूमत हर हाल में कातिल को पकड़ना चाहती थी। तो उस ज़माने में पानीपत के एक मेजिस्ट्रेट हुआ करते थे... जॉन लॉरेंस... बड़े तेज़-तर्रार... उन्हें कातिल का पता लगाने की ज़िम्मेदारी दी गयी
जॉन लॉरेंस इनवेस्टिगेशन में जुट गए... हज़ारों लोगों से पूछताछ की, महीनों तक अलग-अलग थ्योरी लगाईं... आखिरकार कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए वो दिल्ली के एक मकान तक पहुंच गए। ये मकान करीम खान नाम के आदमी का था। शक था कि यही करीम खान उस दिन घोड़े पर आया था। पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया... और उसके पास से एक फारसी में लिखा खत मिला। खत में लिखावट मिट चुकी थी... लेकिन सोचिए उस ज़माने में भी अंग्रेज़ों ने खत को एक केमिकल से ट्रीट किया और लिखावट उभर कर आई। इस खत से पता चला कि करीम खान को किसी ने फ्रेज़र की मौत की सुपारी दी थी। जब उससे पूछा गया... तो करीम खान ने नाम लिया – नवाब शमशुद्दीन का।
हरियाणा में एक जगह है झिरका... शमशुद्दीन वहीं के नवाब थे। मामला ये था कि नवाब शमशुद्दीन की... रियासत में प्रॉपर्टी को लेकर अपने सगे भाई से लड़ाई चल रही थी। विलियम फ्रेज़र कमिश्नर के तौर पर रिश्वत खाकर नवाब साहब के भाई का साथ दे रहा था... इसलिए नवाब साहब ने करीम खान को हायर किया.. और फ्रेज़र का कत्ल करवा दिया। नवाब साहब और करीम ख़ान दोनों गिरफ़्तार हुए और अगस्त 1835 को करीम खान और दो महीने बाद नवाब शम्सुद्दीन को ब्रिटिश सरकार ने सज़ाए मौत दे दी।
अब आप कहेंगे कि इस पूरी कहानी में दाग़ साहब कहां हैं... बताते हैं.. नवाब शमशुद्दीन को जब सज़ाए-मौत दी जा रही थी... तो उस वक्त उनका एक बेटा था... साढ़े चार साल का... अपनी मां की गोद में... उसका नाम था – मिर्ज़ा... यही मिर्ज़ा आगे चलकर दाग़ देहलवी बना.... लेकिन अभी तो वो बहुत छोटा था... यतीम हो गया था। मां वज़ीर खानम बेवा हो गयीं। बाई दा वे... ये वही वज़ीर खानम हैं जो शमसुर्र रहमान फारुखी के मशहूर नॉवेल ‘कई चांद थे सरे आसमां’ का मरकज़ी किरदार हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि बेहद खूबसूरत थीं। उनके हमअसर राइटर्स ने उन्हें दिल्ली की सबसे खूबसूरत खातून कहा। और वो एक साहिबे हैसियत घराने से भी थीं... वज़ीर खानम के वालिद साहब यानि दाग़ साहब के नाना... दिल्ली के एक बड़े जौहरी थे। बहरहाल, कहानी आगे बढ़ी और कुछ सालों के बाद वज़ीर खानम पर नज़र पड़ी… मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के बेटे मिर्ज़ा फख़रू की। मिर्ज़ा फख़रू ने उन्हें शादी के लिए प्रोपोज़ किया... वज़ीर खानम ने हां कर दिया... और 24 जनवरी 1845 को मिर्ज़ा फखरू और दाग़ साहब की मां यानी वज़ीर ख़ानम का लाल किले में निकाह हुआ। और इसके बाद वो लालकिले में ही रहने लगीं.. अपने बेटे यानी दाग़ देहेलवी के साथ।
दाग साहब की उम्र उस वक्त 14 साल थी। अब लाल किले में उनकी परवरिश उस तरह हुई जैसे बादशाहों के बेटों की होती थी... रहन सहन शाही हो गया... इब्राहीम ज़ौक जैसे शायर इनको पढ़ाने के लिए रखे गए... हालांकि ये भी सच है कि मुगलियां सल्तनत तो बस कहने के लिए बाकी थी, लोग प्यार से बहादुर शाह को बादशाह कह देते थे... वरना अंग्रेज़ों का राज था लेकिन फिर भी... जो कुछ बचा कुचा था, वो भी बहुत था... तो रंगीनियां तो बहुत थीं इनके इर्द गिर्द... लेकिन पिछली ज़िंदगी में जो कुछ देखा था दाग़ ने ज़हन में उसकी परछाइयां भी थी... शायद उनका तखल्लुस इसी की गवाही था... कि ज़ख्म तो भर गए थे... लेकिन दाग़ रह गए थे, हमेशा के लिए।
यही वो वक्त था... जब दाग़ साहब के अंदर का शायर जगना शुरु हुआ और वो खूबसूरत चेहरों के परस्तार बन गए। उनमें वो जिंसी ख्वाहिशात जगनी शुरु हुईं जो इस उम्र में होती हैं, और यहीं किले में वो पूरी भी हो जाती थीं। ज़िंदगी की जो भी कड़वाहटें और बदसूरती उन्होंने देखी थी... उनकी यादें अब खूबसूरत चेहरों से मिटा रहे थे वो...
“जिस में लाखों बरस की हूरें हों
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई”
दाग़ की ज़ाती ज़िंदगी जैसी भी रही हो, लेकिन उर्दू अदब को उन्होंने एक नई ज़मीन और नया आसमान था। उनके शेर मिर्ज़ा ग़ालिब तक पहुंचे तो ग़ालिब ने भी उनके शेरों की तारीफ की... और तमाम बड़े-बड़े इंटलेक्चुअल्स थे उस ज़माने में इमाम बख्श सहबाई फारसी के बहुत बड़े आलिम थे... नवाब मुस्तफा खान शेफ्ता वो भी दिल्ली के बड़े शायर थे... इन लोगों ने तभी पहचान लिया था कि उर्दू में अगली सफे का एक बड़ा शायर पैदा हो गया है। क्योंकि उसने कहा...
“उर्दू है जिस का नाम हमीं जानते हैं 'दाग़' - हिन्दोस्ताँ में धूम हमारी ज़बाँ की है”
दाग़ की शायरी इसलिए पसंद की गयी क्योंकि उन्होंने उस वक्त... आम बोलचाल की ज़बान को गज़ल का हिस्सा बनाया... जैसे ये शेर देखिए...
“हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के दाग़ - जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं” - उस वक्त जो बड़े बड़े शायर थे उनकी छाप अपनी शायरी पर नहीं पड़ने दी... चाहते तो उस्तादों की नकल कर सकते थे लेकिन उन्होंने अपनी राह चुनी... गालिब की फिलॉसफी, मोमिन के अल्फाज़ का उलझाव और ज़ौक की अख़लाकी कद्रे खुद पर हावी नहीं होने दी। उन्होंने तो कहा....
“लुत्फ़-ए-मयकशी तुम क्या जानो, हाय कमबख्त तुमने पी ही नहीं”
वो बहुत आसानी से शेर कहते थे... जैसे अंग्रेज़ी में कहते हैं एफर्टलेसली... बल्कि इस पर एक मज़ेदार किस्सा है... एक शायर साहब दाग़ साहब से मिलने आए थे... बात होने लगी कि शेर कैसे कहा जाए... वो साहब बोले, देखिए साहब... शेर लिखना कोई हंसी खेल नहीं है, बहुत मुश्किल से होता है शेर... अब मुझे देख लीजिए... मुझे जब शेर कहना होता है तो... मैं पहले तो हुक्का भरवा के अलग-थलग एक कमरे में लेट जाता हूँ। फिर अंदर से शेर आता है... और मैं तड़प-तड़प के करवटें बदलता हूँ, तब कोई शेर होता है” दाग़ बोले, “अरे अरे... इसका मतलब ये हउआ कि आप शेर कहते नहीं, शेर जनते हैं.. पैदा करते हैं
इसी तरह की हाज़िर जवाबी और ज़िंदगी के सबसे नर्म और सबसे नाज़ुक एहसास को आसानी से कह देने की वजह से दाग़ उर्दू के उस्तादों में शुमार होने लगे.... बेहिसाब शोहरत उन्हें मिलने लगी और इश्क होते रहे... रिश्ते बनते बिगड़ते रहे जिसकी कभी परवाह नहीं की.... लेकिन इसी दौरान ज़िंदगी ने फिर एक मोड़ लिया... इनके सौतेले वालिद यानि मुगलिया सल्तनत के आखिरी प्रिंस मिर्ज़ा फखरू का 10 जुलाई 1856 यानि गदर से एक साल पहले... इंतकाल हो गया। उस वक्त के अंग्रेज़ी दस्तावेज़ों में मौत की वजह कॉलेरा बताई गयी, हालांकि महल के अंदर ज़हर देने की बातें चली थीं पर उसका कोई सबूत नहीं।
बहरहाल, ये दाग़ देहलवी की ज़िंदगी का बड़ा मोड़ था। मिर्ज़ा फ़ख़रू सिर्फ उनके सौतेले वालिद नहीं, बल्कि उनके मुहाफिज़ थे। उनके जाते ही... एक साल बाद गदर हुई... दिल्ली लाशों से पट गयी... लाल किला उजड़ गया... और दाग़ को दिल्ली छोड़कर रामपुर आना पड़ा अपनी खाला के पास... जो रामपुर के नवाब के यहां काम करती थीं। और रामपुर में उन्हें... फिर इश्क़ हुआ...
“लीजिये सुनिए अब अफ़साना ए फुरक़त मुझ से - आपने याद दिलाया तो मुझे याद आया”
तो रामपुर में जब ये रहते थे तो वहां एक मेले में गए.. .मेले में आई हुई थीं कलकत्ता की एक तफायफ़... मुन्नीबाई। अपने ज़माने की बड़ी मशहूर। इन्होंने देखा और वही हुआ जिसका डर था... फिर इश्क में पड़ गए। उन पर रामपुर नावब के छोटे भाई हैदर साहब की पहले से नज़र थी... हालांकि वो बड़े आदमी थे.. उनकी नज़र तो कइयों पर थी... ये बेचारे एक शायर... इन्होंने उनको खत में लिखा... वो खत आज भी है... रामपुर महल में... उसमें लिखा है “दाग़ हिजाब के तीरे नजर का घायल है / आपके दिल को बहलाने को और भी सामां होंगे / दाग़ बिचारा हिजाब को न पाए तो और कहां जाए.’
नवाब हैदर साहब ने कहा चलिए साहब कोई और होता तो लड़ते भी अब शायर कौन से भिड़े... हम आज के बाद मुन्नी बाई की तरफ नहीं देखेंगे। अब दाग़ साहब खुश... लगा सब कुछ मिल गया लेकिन भूल गए कि भई मुन्नी की अपनी भी तो ख्वाहिशें थी... जब ये तंगहाली में आए., इनके पास पैसा खत्म हो गया... तो एक दिन मुन्नी इन्हें छोड़कर चली गयी... अपने एक साजिंदे के साथ शादी करके...
तब इन्होंने वो शेर कहा -
“उड़ गई यूँ वफ़ा ज़माने से - कभी गोया किसी में थी ही नहीं”
लेकिन ख़ैर, वक्त का पहिया घूमा, हैदराबाद के छठे निज़ाम, मीर महबूब अली ख़ान आसफ़ जां का दिल आ गया इनकी शायरी पर... वो खुद भी शायरी सुखन आदमी थे... उन्होंने दाग़ साहब को अपने पास बुला लिया... फिर ज़िंदगी वापस पटरी पर आई... लेकिन हाँ, अब हैदराबाद में भी कई चेहरों पर दाग़ साहब का दिल आया... और इन्होंने शेर कहे.. जैसे
तुम को चाहा तो ख़ता क्या है, बता दो मुझ को
दूसरा कोई तो अपना सा दिखा दो मुझ को
लेकिन हां, आप इश्क मुहब्बत के मामलों में जो चाहें उन्हें कहिए लेकिन एक ऐसा काम किया उन्होंने कि साबित कर दिया कि आदमी बड़े दिल के थे... हुआ यूं कि जब हैदराबाद में ज़िंदगी वापस पटरी पर आने के बहुत सालों बाद... उनसे मिलने एक बूढ़ी औरत आई... उम्र थी 73 साल... मुंह पोपला फटे कपड़े, बाल बिखरे... उसने कहा, “पहचाना मुझे... मैं हूं मुन्नी बाई” आप जानते हैं उन्होंने क्या किया... उसे अपना लिया। बल्कि ये तो शादी बी करना चाहते थे लेकिन घर वालों के दबाव में नहीं कर सके... पर ज़िंदगी की आख़िरी सांस तक... मुन्नी बाई उनके साथ रही.. दाग अच्छे थे। मुननी बाई ने खुदा की कसम खाई की वो अब हमेशा उनके साथ रहेंगी... जिस पर दाग ने शेर कहा
ख़ुदा की क़सम उस ने खाई जो आज - क़सम है ख़ुदा की मज़ा आ गया
बहरहाल, दाग की ज़ाती ज़िंदगी के उतार चढ़ाव लेकिन उनका शायरी पर उबूर कमाल था... अदब को शेर तो अच्छे अता किये ही.. साथ ही ज़माने को अच्छे शायद दिए... अल्लामा इकबाल, जिगर साहब, सीमाब अकबराबादी.. बेखुद देहेलवी... ये सब उनके शागिर्द हैं...
तो दाग़ पर जो भी इल्ज़ाम लगें...वो अपनी जगह लेकिन उर्दू शायरी में जो उनका कॉनट्रीब्यूशन है उसके लिए अदब के कद्रदान हमेशा उनके कर्ज़दार रहेंगे... और याद करेंगे कि एक शायर था जो खूबसूरत चेहरों से कहता था -
हमें है शौक़ कि बे-पर्दा तुम को देखेंगे
तुम्हें है शर्म तो आँखों पे हाथ धर लेना
(ये शो SPOTIFY AMAZON MUSIC JIO SAAVN जैसी apps पर भी है, आपको बस सर्च करना है STORYBOX WITH JAMSHED)