कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने भारत की आर्थिक नीतियों, मैन्युफैक्चरिंग, निजी निवेश, रेगुलेशन, विदेशी व्यापार और प्रतिस्पर्धा को लेकर सरकार पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि मजबूत राजनीतिक नेतृत्व के साथ ऐसी आर्थिक विशेषज्ञता भी जरूरी है, जो भारतीय और वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहराई से समझती हो.
Business Today के ‘India @ 100’ इवेंट में चिदंबरम ने कहा कि राजनीतिक नेतृत्व कितना भी मजबूत क्यों न हो, सरकार को आर्थिक मामलों में गहरी समझ और विशेषज्ञता रखने वाले नेतृत्व की जरूरत होती है, उन्होंने 1991 के आर्थिक सुधारों का उदाहरण देते हुए कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव राजनीतिक नेतृत्व प्रदान कर रहे थे, जबकि डॉ. मनमोहन सिंह ने आर्थिक विशेषज्ञ और ‘इकोनॉमिक ब्रेन’ के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
चिदंबरम के मुताबिक, आज सरकार में डॉ. मनमोहन सिंह जैसी आर्थिक विशेषज्ञता रखने वाला कोई दूसरा व्यक्ति नजर नहीं आता. उन्होंने कहा कि वैश्विक और भारतीय अर्थव्यवस्था को सैद्धांतिक और व्यावहारिक, दोनों स्तरों पर समझने वाला आर्थिक विशेषज्ञ होना जरूरी है, उनके मुताबिक, ऐसी विशेषज्ञता के बिना आर्थिक चुनौतियों से निकलने का रास्ता आसान नहीं होगा.
सिर्फ तेज ग्रोथ से नहीं बनती मजबूत अर्थव्यवस्था
चिदंबरम ने कहा कि भारत के दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने पर गर्व किया जा सकता है, लेकिन सिर्फ GDP ग्रोथ अपने आप में पर्याप्त नहीं है. सवाल यह है कि इस ग्रोथ से कितने रोजगार पैदा हो रहे हैं, किस तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर बन रहा है और आम लोगों को इसका कितना फायदा मिल रहा है. उन्होंने कहा कि आर्थिक विकास का वास्तविक आकलन केवल विकास दर से नहीं, बल्कि रोजगार, निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर और लोगों के जीवन पर पड़ने वाले असर से होना चाहिए.
Make in India और आत्मनिर्भर भारत सही दिशा, लेकिन नतीजे जरूरी
चिदंबरम ने माना कि सरकार ने Make in India, आत्मनिर्भर भारत और सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग जैसी पहलों के जरिए मैन्युफैक्चरिंग को प्राथमिकता दी है. उन्होंने कहा कि सरकार इस दिशा में कई कदम उठा रही है, लेकिन असली सवाल इन पहलों के परिणाम का है, उन्होंने कहा कि केवल योजना शुरू करना पर्याप्त नहीं है. यह देखना होगा कि इन नीतियों से भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता कितनी बढ़ी और क्या देश वास्तव में एक मजबूत मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार कर पाया.
सेमीकंडक्टर पर सब्सिडी और इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर सवाल
चिदंबरम ने सेमीकंडक्टर प्लांट्स के लिए सरकार की ओर से दिए जा रहे प्रोत्साहनों पर भी सवाल उठाए, उन्होंने कहा कि इन परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर सार्वजनिक धन का इस्तेमाल हो रहा है. ऐसे में यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि इसके बदले देश को किस स्तर का औद्योगिक और आर्थिक लाभ मिल रहा है. उन्होंने इंफ्रास्ट्रक्चर की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार सड़क और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास की उपलब्धियां गिनाती है, लेकिन कई बार जमीनी स्तर पर उसकी गुणवत्ता को लेकर सवाल खड़े होते हैं.
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चिदंबरम के मुताबिक, भारत में निजी निवेश अभी भी सतर्क है और पूंजी निवेश कई तरह की बाधाओं से जूझ रहा है, उन्होंने कहा कि चुनौती केवल नई नीतियां घोषित करने की नहीं, बल्कि उनका प्रभावी क्रियान्वयन करने और घरेलू व विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ाने की है, उन्होंने कहा कि सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि हर आर्थिक पहल के पीछे स्पष्ट सोच, व्यावहारिक डिजाइन और बेहतर क्रियान्वयन हो.
‘आर्थिक सोच, प्लान और डिजाइन की कमी’
चिदंबरम ने भारतीय अर्थव्यवस्था में रेगुलेशन के बढ़ते बोझ को बड़ी समस्या बताया, उनके मुताबिक, अर्थव्यवस्था और पूंजी निवेश एक तरफ रेगुलेशन और दूसरी तरफ जांच एवं प्रवर्तन के बीच फंसे हुए हैं. इसके साथ ही उन्होंने क्रोनी कैपिटलिज्म और ब्यूरोक्रेटिक बाधाओं को भी निवेश के रास्ते में बड़ी रुकावट बताया. उन्होंने कहा कि कई मामलों में आज के नियम-कायदे 1991 के मुकाबले भी अधिक जटिल हैं. उन्होंने RBI के तत्कालीन गवर्नर के सामने भी ऐसे रेगुलेशन का मुद्दा उठाया था, जिनका स्पष्ट आर्थिक उद्देश्य नजर नहीं आता था.
बिजली क्षेत्र का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग रेगुलेटरी व्यवस्थाएं निवेश और परियोजनाओं के लिए मुश्किलें पैदा करती हैं. उनका कहना है कि अलग-अलग सेक्टर को देखें तो एक समान समस्या दिखाई देती है—“न आर्थिक सोच है, न आर्थिक योजना और न ही आर्थिक डिजाइन.
‘लाइसेंस राज’ नहीं, अब ‘रूल्स एंड रेगुलेशन राज’
यह पूछे जाने पर कि क्या 1991 से पहले वाला ‘लाइसेंस राज’ या ‘कंट्रोल राज’ वापस आ गया है, चिदंबरम ने कहा कि मौजूदा स्थिति को सीधे ‘लाइसेंस और कंट्रोल राज’ कहना सही नहीं होगा, उनके मुताबिक, नाम और स्वरूप जरूर बदल गए हैं, लेकिन अब ‘रूल्स एंड रेगुलेशन राज’ दिखाई देता है. उन्होंने कहा कि कारोबार और निवेश से जुड़े अत्यधिक नियम और प्रक्रियाएं आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर रही हैं. अगर भारत को प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था बनना है, तो अनावश्यक रेगुलेशन और नौकरशाही बाधाओं को कम करना होगा.
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FTA को लेकर भी चिदंबरम ने उठाए सवाल
भारत के Free Trade Agreements (FTA) को लेकर चिदंबरम ने कहा कि सरकार कई व्यापार समझौतों को उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है, लेकिन भारत के कई प्रमुख ट्रेडिंग पार्टनर्स के साथ अभी महत्वपूर्ण समझौते नहीं हुए हैं, उन्होंने यूरोपीय देशों के साथ व्यापार समझौते और उससे आने वाले संभावित निवेश का जिक्र करते हुए कहा कि केवल निवेश का वादा पर्याप्त नहीं है. भारत को यह देखना होगा कि इन समझौतों से वास्तव में कितना व्यापार, निवेश और आर्थिक लाभ हासिल होता है.
उन्होंने अमेरिका और चीन के साथ व्यापार समझौतों की जटिलताओं का भी जिक्र किया और कहा कि भारत को केवल FTA की संख्या बढ़ाने के बजाय समझौतों की गुणवत्ता और उनके वास्तविक आर्थिक प्रभाव पर ध्यान देना चाहिए.
चीन के साथ रणनीति: आयात के बजाय घरेलू क्षमता बढ़ाने पर जोर
चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे को लेकर चिदंबरम ने कहा कि भारत को चीन से पूरी तरह अलग होने के बजाय अपनी घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को मजबूत करना चाहिए, उनके मुताबिक, भारत चीन से कच्चा माल, कैपिटल गुड्स और जरूरी कंपोनेंट्स आयात कर सकता है, लेकिन लंबे समय में ऐसे उत्पादों की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करनी होगी, ताकि आयात पर निर्भरता कम हो.
उन्होंने रेयर अर्थ जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों का उदाहरण देते हुए कहा कि जहां जरूरी हो, वहां आयात किया जा सकता है, लेकिन साथ-साथ घरेलू उत्पादन और वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखला विकसित करना भी जरूरी है,
चिदंबरम ने भारत में घटती प्रतिस्पर्धा को लेकर भी चिंता जताई, उन्होंने कहा कि कई सेक्टर मोनोपॉली या ओलिगोपॉली की ओर बढ़ रहे हैं, उन्होंने टेलीकॉम, पेट्रोलियम, एयरपोर्ट, पोर्ट, सीमेंट और स्टील जैसे क्षेत्रों का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि इन क्षेत्रों में वास्तविक और व्यापक प्रतिस्पर्धा कितनी बची है.