कुछ फिल्में कहानी को धीरे-धीरे बुनती हैं, किरदारों को वक्त देती हैं और फिर कहानी को उसके मुकाम तक ले जाती हैं लेकिन 7 Dogs जैसे मानो सिर्फ एक ही नियम जानती है, रुकना नहीं है, बेधड़क रफ्तार में आगे बढ़ना है. फिल्म की शुरुआत ही एक शानदार एक्शन सीक्वेंस से होती है, जिसमें एक विमान कुछ सेकंड में क्रैश होने वाला है और दो लोग किसी तरह उसे बचाने में कामयाब हो जाते हैं. इनमें एक है इंटरपोल अधिकारी खालिद अल-अजाजी (अहमद एज) और दूसरा है गेली अबू दाऊद (करीम अब्देल अजीज), जो एक अपराधी होने के साथ कुख्यात Seven Dogs सिंडिकेट का अहम सदस्य है.
फिल्म का शुरुआती प्लेन वाला सीक्वेंस पूरी फिल्म के ट्रेलर जैसा है. भीषण एक्शन, अलग-अलग देशों की लोकेशन, बंदूकें, धमाके और इन सबके बीच सांस लेने की फुर्सत तक नहीं. खालिद अब फील्ड ऑपरेशन से किनारा करने की तैयारी में है. उसकी शादी होने वाली है और वह एक शांत जिंदगी चाहता है लेकिन उसकी यह योजना ज्यादा देर नहीं चलती.
सब पिंक लेडी के पीछे....
इंटरनेशनल क्राइम नेटवर्क में Pink Lady नाम की एक खतरनाक ड्रग तेजी से डिस्ट्रिब्यूट होने लगती है. खालिद को एक आखिरी मिशन के लिए फिर मैदान में उतरना पड़ता है. कहानी का दिलचस्प मोड़ यह है कि इस मिशन में उसका साथ वही अपराधी देता है, जिसे कभी खालिद ने गिरफ्तार किया था और जिसकी जान भी बचाई थी- गेली. पुलिस अधिकारी और क्रिमिन की यह साझेदारी सिनेमा में नई नहीं है. बॉलीवुड से हॉलीवुड तक इस फॉर्मूले के कई रूप देखने को मिल चुके हैं लेकिन 7 Dogs इस पुराने फॉर्मूले को एक विशाल अंतरराष्ट्रीय कैनवास पर ले जाती है.
सिंडिकेट के सातों सदस्य अलग-अलग देशों में फैले हुए हैं और उन्हें पकड़ने की कोशिश फिल्म को एक देश से दूसरे देश तक पहुंचाती रहती है. यही फिल्म की सबसे बड़ी ताकत भी है. हर नई लोकेशन एक अलग अंदाज का एक्शन लेकर आती है. चीन वाले हिस्से में फिल्म की रफ्तार को एक अलग लय मिलती है. यहां एक्शन को जिस अंदाज और भव्यता से फिल्माया गया है, वहां से 7 Dogs महज शोर-शराबे वाली एक्शन फिल्म नहीं रह जाती, बल्कि सही मायने में मनोरंजक लगने लगती है. इस पूरे सीक्वेंस में प्रिसिला चान का मशहूर कैंटोनीज गाना A Thousand Que Songs बजता है, जो जबरदस्त ऊर्जा पैदा करता है और इतने हिंसक एक्शन के बीच एक अजीब-सी चंचलता भी ले आता है.

निर्देशक आदिल अल अरबी और बिलाल फलाह, जो Bad Boys for Life और Bad Boys: Ride or Die जैसी फिल्में बना चुके हैं, जानते हैं कि एक्शन को सिर्फ लड़ाई और स्टंट न बनाकर मनोरंजक कैसे बनाया जाता है. इस मामले में अहमद एज फिल्म का काफी भार अपने कंधों पर उठाते हैं. उनकी स्क्रीन प्रेजेंस प्रभावशाली है. वह करिश्माई भी लगते हैं, शारीरिक रूप से अपने किरदार के लिए पूरी तरह विश्वसनीय भी और फिल्म की लगातार बढ़ती अजीबोगरीब एक्शन दुनिया में सहज भी.
फिल्म में एक हल्की-फुल्की कॉमेडी भी लगातार चलती रहती है. एक बेहद अफरातफरी भरे एक्शन सीक्वेंस के बीच खालिद को अपनी मंगेतर का फोन आता है. वह इस बात से ज्यादा परेशान है कि आखिर उनकी शादी कहां होनी चाहिए, जबकि खालिद उस वक्त लगभग अपनी जान बचाने के लिए लड़ रहा है. ऐसे छोटे-छोटे पल फिल्म की लगातार भागती रफ्तार के बीच दर्शकों को थोड़ी राहत देते हैं.
सलमान-संजय दत्त छा गए...
भारतीय दर्शकों के लिए फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण जाहिर तौर पर सलमान खान और संजय दत्त हैं. दोनों की मौजूदगी को लेकर जितनी उत्सुकता थी, उसके मुकाबले उनका स्क्रीन टाइम निराश करता है. फिर भी, दोनों सितारे जितनी देर पर्दे पर आते हैं, अपनी छाप छोड़ जाते हैं. सलमान फिल्म में जोहर के किरदार में हैं, जो खालिद का करीबी सहयोगी है. उन्हें अपना हिस्सा का स्वैग, एक्शन और यहां तक कि एक मजेदार ऑटो-रिक्शा राइड भी मिलती है.
संजय दत्त रणजीत का किरदार निभाते हैं, जो भारत वाले चैप्टर में शामिल अपराधियों में से एक है. उनका किरदार उन्हें ज्यादा एक्शन करने का मौका देता है. सलमान और संजय का साथ वाला सीक्वेंस फिल्म के सबसे मजेदार हिस्सों में से एक है, खासकर इसलिए क्योंकि दोनों को पारंपरिक हिंदी फिल्मों के हीरो की तरह पेश नहीं किया गया है. एक एक्शन सीन में तो दोनों हाथ में सेल्फी स्टिक और कैमरा लेकर लड़ते नजर आते हैं, जैसे लड़ाई के बीच व्लॉगर बन गए हों. यह अजीब है, थोड़ा हास्यास्पद है, लेकिन याद रह जाने वाला भी है.

इसके बाद फिल्म लास वेगस और उसके रेगिस्तानी इलाकों से गुजरते हुए जूलिया तक पहुंचती है, जिसका किरदार मोनिका बेलुची ने निभाया है. बेलुची 7 Dogs के सबसे मजबूत हिस्सों में से एक हैं. वह ऐसी फिल्म में भी एक खास तरह की शालीनता और खतरे का एहसास लेकर आती हैं, जो ज्यादातर समय मर्दाना एक्शन से भरी रहती है. खास बात यह है कि फिल्म महिलाओं को सिर्फ सजावट या पुरुष किरदारों के भावनात्मक सहारे तक सीमित नहीं करती. खालिद की महिला सहयोगियों को भी एक्शन में अपनी जगह मिलती है. एक्शन फिल्मों की उस परंपरा के बीच, जहां महिलाएं अक्सर या तो ग्लैमर के लिए होती हैं या फिर नायक के इमोशनल एंकर के तौर पर, यह बदलाव अच्छा लगता है.
हालांकि 7 Dogs सिर्फ ताकत और गोलियों की कहानी नहीं है. खालिद के अतीत और उसके पिता की मौत को भी कहानी में जगह दी गई है. दूसरी तरफ गली की पत्नी और बच्चा उसके भावनात्मक सफर का हिस्सा बनते हैं. खालिद की होने वाली शादी भी कहानी में एक निजी दांव जोड़ती है. समस्या यह है कि इनमें से किसी भी पहलू को पर्याप्त गहराई नहीं मिलती. रिश्ते हैं, परिवार की कहानियां हैं, भावनात्मक दांव हैं, लेकिन जज्बात बहुत कम हैं. फिल्म चाहती है कि दर्शक इन किरदारों की परवाह करें, लेकिन उन्हें परवाह करने का वक्त ही नहीं देती.
और शायद यही वह समझौता है जो 7 Dogs करती है. गहराई के बदले रफ्तार. फिल्म में एक्शन है, फिर एक्शन है और उसके बाद भी एक्शन है. कई जगह यह जरूरत से ज्यादा भी हो जाता है लेकिन फिल्म इतनी तेजी से आगे बढ़ती है कि बोरियत को जमने का मौका ही नहीं मिलता. इतने सारे किरदार, कई सबप्लॉट और फैला हुआ अंतरराष्ट्रीय क्राइम नेटवर्क होने के बावजूद कहानी उलझती नहीं है. इतनी बड़ी और बिखरी हुई कहानी को बिना दर्शक का साथ छोड़े लगातार आगे बढ़ाते रहना फिल्मकारों की बड़ी उपलब्धि है.
क्लाइमेक्स रेगिस्तान में होता है और यहां फिल्म पूरी तरह अपने सबसे बड़े तमाशे में बदल जाती है. धूल भरी आंधियां, गोलियां, आग और धमाके सब मिलकर एक विशाल एक्शन कैनवास तैयार करते हैं. 7 Dogs ऐसी फिल्म नहीं है जिसे देखने के बाद आप लंबे समय तक उसके किरदारों या कहानी के बारे में सोचते रहें लेकिन इसे देखते हुए मनोरंजन की कमी भी महसूस नहीं होती. आप जरूर चाहेंगे कि किरदारों को थोड़ा और वक्त मिलता, उनकी कहानियां ज्यादा गहराई से सामने आतीं और सलमान खान-संजय दत्त को थोड़ा ज्यादा स्क्रीन टाइम मिलता.