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बॉर्डर पर 'घुसपैठ रोकने' की तैयारी, मुर्शिदाबाद से सुंदरबन तक BSF की फेन्सिंग, देखें ग्राउंड जीरो से पूरा सच

भारत-बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ और तस्करी रोकने के लिए सरकार ने नया 'स्मार्ट बॉर्डर ग्रिड' तैयार करना शुरू कर दिया है. पश्चिम बंगाल के नौ जिलों में 1024 एकड़ जमीन मिलने के बाद मुर्शिदाबाद से सुंदरबन तक 172.6 किलोमीटर सीमा पर 12 फीट ऊंची फेंसिंग और आधुनिक कैमरों का काम तेज हो गया है.

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बांग्लादेश बॉर्डर पर बीएसएफ की फेन्सिंग. (photo: ITG)
बांग्लादेश बॉर्डर पर बीएसएफ की फेन्सिंग. (photo: ITG)

मुर्शिदाबाद के जलंगी बॉर्डर पर सुबह का वक्त था. आसमान में हल्की धूप थी, लेकिन सीमा पर काम पूरे जोरों पर चल रहा था. जेसीबी मशीनें लगातार मिट्टी समतल कर रही थीं. लोहे के भारी-भरकम पोल एक-एक कर जमीन में गाड़े जा रहे थे. CPWD के इंजीनियर हर नट-बोल्ट को बेहद सावधानी से कस रहे थे, जबकि कुछ दूरी पर BSF के जवान पूरे इलाके पर पैनी नजर बनाए हुए थे.

पहली नजर में ये एक सामान्य निर्माण कार्य लग सकता था, लेकिन जैसे-जैसे हमने इस पूरे इलाके को करीब से देखा, ये साफ होता गया कि यहां सिर्फ तारबंदी नहीं हो रही, बल्कि भारत-बांग्लादेश सीमा की सुरक्षा का एक नया अध्याय लिखा जा रहा है.

यहीं से हमारी यात्रा शुरू हुई. अगले तीन दिनों में आजतक की टीम मुर्शिदाबाद से मालदा और फिर सुंदरबन के मैंग्रोव जंगलों तक पहुंची. हमने उन जगहों को देखा जहां दशकों से घुसपैठ, तस्करी और अवैध गतिविधियां सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती रही हैं. फ्लोटिंग बॉर्डर आउट पोस्ट पर जवानों के साथ समय बिताया, स्पीड बोट से क्रीक इलाकों में गश्त देखी, ड्रोन से सीमा की तस्वीर कैद की और उन इंजीनियरों से बात की जो भविष्य की 'स्मार्ट बॉर्डर' तैयार कर रहे हैं. 

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इस पूरी यात्रा के बाद एक बात बिल्कुल साफ हो गई- भारत-बांग्लादेश सीमा पर अब सिर्फ बाड़ नहीं लग रही, बल्कि तकनीक, इन्फ्रास्ट्रक्चर और रियल-टाइम निगरानी से लैस एक ऐसा सुरक्षा नेटवर्क तैयार किया जा रहा है, जिसका मकसद घुसपैठ, तस्करी और सीमा पार अपराधों पर निर्णायक रोक लगाना है.

अब क्यों बदल गई तस्वीर?

सीमा पर सबसे बड़ी समस्या न बजट की थी और न तकनीक की. असली बाधा थी जमीन. BSF लंबे वक्त से कहता रहा कि जिन इलाकों में फेंसिंग अधूरी है, वहां राज्य सरकार की ओर से जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण परियोजनाएं आगे नहीं बढ़ पा रही थीं.

नतीजा ये हुआ कि कई संवेदनशील सेक्टर खुले रह गए और इन्हीं रास्तों का इस्तेमाल घुसपैठिए, तस्कर और अपराधी करते रहे.

नई सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सीमा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए बड़ा फैसला लिया. रिकॉर्ड समय में 9 सीमावर्ती जिलों की 1,024.75 एकड़ जमीन BSF को हस्तांतरित कर दी गई, जिससे करीब 172.6 किलोमीटर लंबी सीमा पर नई फेंसिंग का रास्ता साफ हो गया. ये केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि वर्षों से लंबित एक सुरक्षा परियोजना को जमीन पर उतारने वाला कदम था.

आज इसकी तस्वीर मुर्शिदाबाद, मालदा, नॉर्थ 24 परगना, कूचबिहार और अन्य सीमावर्ती जिलों में साफ दिखाई देती है.

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जलंगी... जहां से कभी सबसे ज्यादा घुसपैठ होती थी

मुर्शिदाबाद का जलंगी सेक्टर लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे संवेदनशील इलाकों में गिना जाता रहा है. सीमा के दोनों ओर घनी आबादी, नदी का बदलता बहाव और कई स्थानों पर खुला इलाका इसे चुनौतीपूर्ण बनाता है. जब हम यहां पहुंचे तो निर्माण कार्य युद्धस्तर पर चल रहा था. जेसीबी मशीनें मिट्टी काट रही थीं, भारी क्रेन पोल खड़े कर रही थीं और मजदूर लगातार फेंसिंग का ढांचा तैयार कर रहे थे. BSF के अधिकारी पूरे निर्माण क्षेत्र की निगरानी कर रहे थे.

CPWD के इंजीनियरों से बातचीत में पता चला कि ये सामान्य फेंसिंग नहीं है. लगभग 12 फीट ऊंची सिंगल लेयर स्मार्ट फेंसिंग इस तरह तैयार की जा रही है कि भविष्य में इसमें सेंसर, कैमरे और अन्य इलेक्ट्रॉनिक निगरानी प्रणालियां आसानी से जोड़ी जा सकें. 

एक इंजीनियर ने मुस्कुराते हुए कहा, "ये सिर्फ लोहे का ढांचा नहीं, बल्कि भविष्य की स्मार्ट सीमा का आधार है."

ग्रामीण क्या सोचते हैं?

हमने सीमा से लगे गांवों में भी लोगों से बात की. अधिकांश लोगों का कहना था कि मजबूत फेंसिंग बनने से अवैध आवाजाही कम होगी और इलाके में सुरक्षा बढ़ेगी. कई लोगों ने कहा कि रात के समय पहले सीमा पार से आने-जाने की खबरें सुनने को मिलती थीं, लेकिन अब उन्हें उम्मीद है कि हालात बदलेंगे.

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कहां कितनी बन रही है फेंसिंग?

राज्य सरकार द्वारा जमीन उपलब्ध कराने के बाद जिन इलाकों में तेजी से काम शुरू हुआ है, उनमें प्रमुख हैं-

  • मुर्शिदाबाद – 45.4KM
  • नॉर्थ 24 परगना – 42.07KM
  • कूचबिहार – 39.39KM
  • मालदा – 20.15KM
  • नदिया – 14.79KM
  • दक्षिण दिनाजपुर – 7.75KM
  • दार्जिलिंग – 1.45KM
  • उत्तर दिनाजपुर – 1.28KM
  • जलपाईगुड़ी – 0.31KM

कुल मिलाकर 172.6 किलोमीटर सीमा पर नई फेंसिंग का निर्माण होना है।आगे तेजी से काम जमीन देने का चल रहा है.

स्मार्ट बॉर्डर ग्रीड

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पिछले कुछ वर्षों से सीमा सुरक्षा की हर समीक्षा बैठक में "स्मर्ट बॉर्डर मैनेजमेंट" पर जोर देते रहे हैं. लक्ष्य केवल तारबंदी करना नहीं, बल्कि पूरी सीमा को तकनीक से जोड़ना है.

इस नई व्यवस्था में हाई-रिजॉल्यूशन CCTV, थर्मल इमेजर, नाइट विजन सिस्टम, ड्रोन, एंटी-ड्रोन तकनीक, सेंसर आधारित अलर्ट, रेडियो आधारित फेंस टैंपर डिटेक्शन सिस्टम और रियल टाइम कमांड एंड कंट्रोल सेंटर जैसी व्यवस्थाएं शामिल की जा रही हैं. यानी भविष्य में यदि कोई व्यक्ति फेंसिंग को छूने या काटने की कोशिश करेगा तो उसकी सूचना तुरंत कंट्रोल रूम तक पहुंचेगी और BSF की क्विक रिएक्शन टीम कुछ ही मिनटों में मौके पर पहुंच सकेगी.

घुसपैठ से डेमोग्राफिक बदलाव तक

गृह मंत्री अमित शाह कई बार सार्वजनिक मंचों पर कह चुके हैं कि अवैध घुसपैठ केवल सीमा सुरक्षा का विषय नहीं है. इसका असर राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक संतुलन और जनसांख्यिकीय बदलाव पर भी पड़ता है. इसी सोच के तहत गृह मंत्रालय ने सीमा फेंसिंग, तकनीकी निगरानी, BSF के आधुनिकीकरण और स्मार्ट बॉर्डर ग्रिड को प्राथमिकता दी है.

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पिछले कुछ सालों में उत्तर बंगाल और सीमावर्ती क्षेत्रों में BSF के लिए नई परियोजनाओं, आधुनिक बैरकों, सर्विलांस सिस्टम और संचार नेटवर्क को मंजूरी दी गई है. सीमा सुरक्षा को अब पारंपरिक गश्त से आगे बढ़ाकर तकनीक आधारित बनाया जा रहा है.

अब सुंदरबन... जहां सीमा की असली चुनौती शुरू होती है

अगर मुर्शिदाबाद चुनौती है तो सुंदरबन परीक्षा है. ये दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन क्षेत्र है. यहां सीमा खेतों से नहीं, बल्कि नदियों, दलदली जमीन, क्रीक और घने जंगलों से गुजरती है. ज्वार आने पर कई इलाके पानी में डूब जाते हैं और भाटा के बाद फिर जमीन दिखाई देती है. यही कारण है कि सालों से ये क्षेत्र घुसपैठ और तस्करी के लिए संवेदनशील माना जाता रहा है. जब हमारी टीम स्पीड बोट से इस इलाके में पहुंची, तो चारों तरफ सिर्फ मैंग्रोव, पानी और संकरी जलधाराएं दिखाई दे रही थीं. पहली नजर में समझ ही नहीं आता कि सीमा कहां है.

90 किलोमीटर की सबसे बड़ी तैयारी

यही वह इलाका है, जहां अब करीब 90 किलोमीटर लंबी स्मार्ट फेंसिंग की तैयारी की जा रही है. शमशेरनगर से आगे तक फैले इस क्षेत्र में ऐसी सुरक्षा व्यवस्था विकसित की जाएगी, जो पानी और जमीन- दोनों परिस्थितियों के अनुरूप होगी.

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BSF के अधिकारियों का कहना है कि इस परियोजना का उद्देश्य केवल बाड़ लगाना नहीं, बल्कि पूरे इलाके को एकीकृत तकनीकी निगरानी नेटवर्क से जोड़ना है.

स्पीड बोट पर गश्त और अचानक दिखी संदिग्ध नाव

BSF की स्पीड बोट पर गश्त के दौरान अचानक एक छोटी नाव दिखाई दी. जवान तुरंत सतर्क हो गए. बोट ने दिशा बदली और कुछ ही मिनटों में उस नाव तक पहुंच गई. पूछताछ और जांच के बाद पता चला कि वह स्थानीय लोगों की नाव थी, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने ये जरूर दिखा दिया कि BSF किसी भी संदिग्ध गतिविधि को नजरअंदाज नहीं करती.

पानी पर तैरती चौकियां

सुंदरबन में BSF की सबसे अनोखी व्यवस्था हैं, 8 फ्लोटिंग बॉर्डर आउट पोस्ट (Floating BOP). ये पानी पर तैरती चौकियां हैं, जहां से चौबीसों घंटे निगरानी की जाती है.

आजतक की टीम इन फ्लोटिंग BOP तक पहुंची. यहां जवानों की ड्यूटी, संचार व्यवस्था, निगरानी उपकरण और गश्त की पूरी प्रणाली को करीब से देखा। इन्हीं चौकियों से स्पीड बोट निकलती हैं और मैंग्रोव के बीच हर संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखी जाती है.

ड्रोन से दिखी बदलती सीमा

ड्रोन कैमरे से जब पूरा इलाका रिकॉर्ड किया गया तो ऊपर से साफ दिखाई दिया कि सीमा सुरक्षा की चुनौती कितनी बड़ी है. कहीं नदी, कहीं दलदल, कहीं घना जंगल और कहीं बेहद संकरी क्रीक. ऐसे इलाके में पारंपरिक सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं हो सकती. यही वजह है कि अब तकनीक को सबसे बड़ा हथियार बनाया जा रहा है.

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मुर्शिदाबाद के जलंगी में बनती 12 फीट ऊंची स्मार्ट फेंसिंग से लेकर सुंदरबन के मैंग्रोव के बीच तैरती फ्लोटिंग BOP तक, तीन दिनों की इस यात्रा ने एक बदलती हुई सीमा की तस्वीर दिखाई. ये तस्वीर केवल निर्माण कार्य की नहीं, बल्कि उस रणनीति की है जिसके जरिए भारत-बांग्लादेश सीमा को भविष्य की स्मार्ट सीमा में बदला जा रहा है.

क्या इससे घुसपैठ पूरी तरह रुक जाएगी? इसका जवाब समय देगा, लेकिन इतना जरूर है कि जमीन उपलब्ध होने के बाद जिस रफ्तार से फेंसिंग, आधुनिक निगरानी प्रणाली और BSF का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार हो रहा है, उससे ये स्पष्ट है कि सीमा सुरक्षा अब केवल जवानों की चौकसी तक सीमित नहीं रहेगी. तकनीक, इन्फ्रास्ट्रक्चर, रियल-टाइम इंटेलिजेंस और तेज प्रतिक्रिया- इन चार स्तंभों पर नई सुरक्षा व्यवस्था खड़ी की जा रही है.

मुर्शिदाबाद से सुंदरबन तक की इस यात्रा के बाद ये महसूस होता है कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर एक नया दौर शुरू हो चुका है. आने वाले सालों में यही मॉडल देश की अन्य संवेदनशील सीमाओं पर भी दिखाई दे सकता है.

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