'माय नेम इज नीलम...' सवाल हुआ- कहां की रहने वाली हो? जवाब आया- जम्मू-कश्मीर की हूं. इतना कहकर नीलम कुछ पल के लिए चुप हो जाती हैं. फिर उनकी कहानी धीरे-धीरे सामने आती है. बच्चे हैं. एक बेटा है, तीन बेटियां हैं. बेटा मां को बुलाता भी है. कभी-कभी मिलने भी आता है. फिर नीलम वृद्धाश्रम में क्यों हैं? जवाब है- बहू से झगड़ा.
घर में बात बिगड़ी तो नीलम अपने बीमार पति को लेकर वृद्धाश्रम पहुंच गईं. पति को करीब 8-9 साल पहले लकवा मार गया था. तब से उनकी देखभाल नीलम ही कर रही हैं. आज भी पति उनके साथ हैं. और नीलम? वो अपने बेटे के बुलाने के बावजूद वापस घर जाने से डरती हैं. डर इस बात का कि कहीं फिर वही झगड़ा न शुरू हो जाए.
यही वो दर्द है जो नीलम की कहानी को बाकी कहानियों से अलग बनाता है. यहां कोई ऐसा नहीं है कि बेटा मां से पूरी तरह रिश्ता तोड़ चुका हो. बेटा बुलाता है. मां भी बेटे को चाहती हैं. लेकिन रिश्तों के बीच कहीं ऐसी गांठ पड़ चुकी है कि घर का दरवाजा सामने होते हुए भी नीलम वहां लौटना नहीं चाहतीं.

नीलम से जब पूछा गया कि वृद्धाश्रम तक कैसे पहुंचीं, तो उन्होंने बहुत साधारण तरीके से अपनी बात कही. बहू से झगड़ा हो गया था थोड़ा... नीलम के पति लंबे समय से बीमार हैं. करीब 8-9 साल पहले उन्हें लकवा मार गया था. बीमारी के बाद जिंदगी पहले जैसी नहीं रही. घर, बीमारी और पति की देखभाल- इन सबके बीच नीलम की अपनी जिंदगी भी चलती रही. उनके तीन बेटियां और एक बेटा है.
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नीलम बताती हैं कि बेटा बुलाता है. कभी-कभी मिलने आता है. लेकिन साथ रहने की बात आते ही नीलम के मन में डर बैठ जाता है कि फिर लड़ाई-झगड़ा हो जाएगा. शायद यही वजह है कि घर वापस जाने का रास्ता होते हुए भी वो फिलहाल वृद्धाश्रम में रहना बेहतर समझती हैं.
नीलम के मुताबिक, बेटा कहता है कि घर चलकर बात करेंगे, समझाएंगे. लेकिन नीलम अभी तैयार नहीं हैं. वो कहती हैं कि अगर वापस गईं और फिर विवाद हुआ तो क्या होगा? फिर वही तनाव. फिर वही झगड़ा. और फिर शायद वही स्थिति. इसलिए वृद्धाश्रम में रहने का फैसला किया है. बेटा है. बेटी हैं. घर भी है. लेकिन घर लौटने का मन नहीं है.

नीलम अकेली वृद्धाश्रम नहीं पहुंचीं. उनके साथ उनके पति भी हैं. वो लंबे समय से बीमार हैं और चलने-फिरने में असमर्थ हैं. नीलम ही उनकी देखभाल करती हैं. आश्रम में रहने के दौरान भी उनका सबसे बड़ा काम यही है- पति की सेवा. नीलम बताती हैं कि भगवान ने उन्हें यहां रखा है और यहां उनकी सेवा हो रही है. आश्रम में खाना-पीना और रहने की व्यवस्था है. नीलम की बातों में परिस्थितियों का दर्द ज्यादा दिखाई देता है.
घर जाने के नाम पर मन डगमगाता क्यों है?
नीलम मूल रूप से जम्मू-कश्मीर की रहने वाली हैं. लेकिन अब जिंदगी सोनीपत के एक वृद्धाश्रम में बीत रही है. ये दूरी सिर्फ जम्मू-कश्मीर से हरियाणा तक की नहीं है. ये उस घर से दूरी भी है, जहां उन्होंने परिवार के साथ जिंदगी बिताई. जहां बेटा बड़ा हुआ. जहां बेटियां बड़ी हुईं. जहां पति के साथ इतने साल गुजरे. आज वही परिवार है, लेकिन नीलम घर से दूर हैं. उनके पास शिकायतें हैं, लेकिन बच्चों के लिए अपनापन भी है. बेटा बुलाता है, तो मन डगमगाता है. घर जाने का मन भी करता होगा. फिर वही पुराना डर सामने खड़ा हो जाता है. अगर फिर लड़ाई हुई तो? और यही सवाल उन्हें वापस वृद्धाश्रम की चारदीवारी में रोक देता है.

जिस आश्रम में नीलम रह रही हैं, वहां सिर्फ उनकी कहानी नहीं है. किसी बुजुर्ग को बेटे ने छोड़ा है. किसी का बहू से विवाद हुआ. कोई पति की मौत के बाद अकेला पड़ गया. किसी के बच्चे हैं, लेकिन मिलने का वक्त नहीं. आश्रम के संचालक आनंद सिंह कहते हैं कि अगर परिवार बुजुर्गों को ठीक से रखता है तो वे यहां क्यों आएंगे. उनके मुताबिक, ज्यादातर बुजुर्ग किसी न किसी पारिवारिक वजह से यहां पहुंचते हैं. किसी के पति या पत्नी की मौत के बाद परिवार में उनकी अहमियत कम हो जाती है, तो किसी के बच्चों के साथ विचार नहीं मिलते.
शिवचरण की मौत पर भी नहीं आईं थीं बेटियां
सोनीपत के इसी वृद्धाश्रम में शिवचरण की मौत हुई. उनकी तीन बेटियां हैं, लेकिन कोई भी पिता के अंतिम दर्शन को नहीं आई. शिवचरण अपनी बेटियों से बेहद प्यार करते थे. बेटियों से दिन में कई-कई बार वीडियो कॉल पर बात करते थे और उम्मीद लगाए बैठे थे कि शायद एक दिन बेटियां उनका सहारा बनेंगी.
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पत्नी की मौत के वक्त भी बेटियां नहीं पहुंचीं और जब शिवचरण खुद जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर पहुंचे, तब भी बेटियों से मुलाकात नहीं हो सकी. आखिरकार जिस आश्रम ने उनकी जिंदगी के मुश्किल वक्त में साथ दिया, उसी ने उनके जाने के बाद बेटे का फर्ज निभाते हुए अंतिम संस्कार किया.
हर चेहरे के पीछे एक अलग कहानी
शिवचरण के बाद जब वृद्धाश्रम में रहने वाले दूसरे बुजुर्गों से बात हुई तो पता चला कि हर चेहरे के पीछे एक अलग कहानी है, लेकिन दर्द कहीं न कहीं एक जैसा है. कोई अपने बेटों से दूर है, किसी का बहू से विवाद हुआ तो घर छूट गया और कोई ऐसा है जिसके पास लाखों रुपये की जमा पूंजी है, फिर भी परिवार का साथ नहीं है. गोहाना के गांव बोहला की पूर्व सरपंच भी इसी आश्रम में रह रही हैं. कभी वह गांव की मुखिया बनकर लोगों के विवाद सुलझाती थीं, पंचायत के फैसले करती थीं, लेकिन उनका आरोप है कि बेटों ने उनके साथ मारपीट की, जिसके बाद उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा.
खाते में 40 लाख, फिर भी घर में जगह नहीं
इसी आश्रम में रह रही एक दूसरी बुजुर्ग महिला की कहानी भी रिश्तों का एक अलग पहलू दिखाती है. उनका कहना है कि उनकी दो शादियां हुईं और दोनों पतियों की मौत हो चुकी है. उनके पास करीब 40 लाख रुपये की जमा पूंजी है, लेकिन आरोप है कि बेटा उन्हें अपने साथ रखने को तैयार नहीं था. इसके बावजूद मां के मन में बेटे के लिए मोह कम नहीं हुआ. वह कहती हैं कि उनके जाने के बाद उनकी पूरी संपत्ति बेटे की ही होगी. यानी किसी के पास दौलत है, किसी के पास परिवार का नाम, किसी के पास रिश्तों की यादें, लेकिन वृद्धाश्रम में पहुंचने के बाद सबसे ज्यादा कमी जिस चीज की महसूस होती है, वो है अपनों का साथ.