बचपन में मुझे पौराणिक धारावाहिक इसलिए आकर्षित करते थे क्योंकि उनमें दिव्य लोकों की कल्पना थी, चमत्कारी अस्त्र-शस्त्र थे, आंखें चौंधिया देने वाली वेशभूषा थी, अद्भुत महल थे. हमारी पीढ़ी रामायण को सुनते, पढ़ते और देखते हुए जवान हुई है. स्कूल के प्ले में भी हर लड़की सीता का किरदार निभाने को आतुर रहती थी. कोई उर्मिला बनना नहीं चाहती थी. रामायण में उर्मिला की कहानी बहुत कम कही गई. उनके बारे में जितना भी लिखा गया, उससे कहीं ज्यादा उनके बारे में कहे जाने की गुंजाइश बची रह गई.
रामायण में सीता का वनवास बहुत कुछ अपने साथ लेकर चलता है. पति का साथ, जंगल की कठिनाइयां, प्रकृति का सान्निध्य और फिर रावण से युद्ध. इस पूरी कथा के केंद्र में सीता हैं. लक्ष्मण का समर्पण भाव भी अपने भाई के प्रति रहा. वह साए की तरह चौदह वर्षों तक उनके साथ रहे लेकिन उर्मिला के हिस्से सिर्फ इंतजार आया.
विवाह के बाद जिस स्त्री के जीवन की शुरुआत अपने पति के साथ होनी थी, उसी के जीवन में कुछ ही समय बाद पति-वियोग के चौदह वर्ष आ गए. वाल्मीकि रामायण में उर्मिला का जिक्र बेहद सीमित है. विवाह के प्रसंग में जनक अपनी बेटी उर्मिला का विवाह लक्ष्मण से करते हैं.
जब यह तय होता है कि राम को वन जाना ही होगा तो लक्ष्मण उनके साथ जाने का निश्चय करते हैं. सीता को तो साथ होना ही था पर इस बिछोह की तैयारियों में लक्ष्मण-उर्मिला के बीच कोई लंबा संवाद वाल्मीकि की कथा में नहीं मिलता, जिसमें उर्मिला अपने मन की बात कहती दिखाई दें. यही शायद उसके चरित्र की सबसे बड़ी विडंबना है कि जिस स्त्री ने सबसे लंबा इंतजार किया, उसकी आवाज सबसे कम सुनाई देती है. इसलिए शायद बाद की रामकथाओं ने इसी खाली जगह को भरने की कोशिश की और उर्मिला को एक अलग दृष्टि से देखने का अवसर दिया.
उर्मिला की तुलना अक्सर सीता से की जाती है. सीता ने पति के साथ वन जाने का निर्णय लिया और अपने हिस्से के कष्टों को राम के साथ बांटा. पर उर्मिला की राह अलग थी. या यूं कहें कि परिस्थितियों ने उसे ऐसा रास्ता दिया, जिसमें उसका त्याग दिखाई कम देता है. सीता के पास राम थे, लक्ष्मण के पास राम और सीता की सेवा का उद्देश्य था, लेकिन उर्मिला के सामने एक ऐसा जीवन था जिसमें उसका पति उसके साथ नहीं था और उसके त्याग को देखने वाला कोई युद्धक्षेत्र भी नहीं था. हमें यकीनन सीता का त्याग दिखाई देता है, पर हम उर्मिला के त्याग को महसूस भी कर सकते हैं.
यही अंतर उर्मिला के चरित्र को मार्मिक बनाता है. वन जाने वाले तीनों पात्रों के पास एक-दूसरे का साथ था. उर्मिला अयोध्या में रह गईं. इसका अर्थ केवल इतना नहीं था कि उन्होंने पति को चौदह वर्षों के लिए विदा कर दिया. इसका अर्थ था कि उन्होंने अपने वैवाहिक जीवन के उन शुरुआती वर्षों को भी अकेले स्वीकार किया, जिनमें एक नवविवाहिता अपने पति के साथ जीवन और भविष्य के सपने बनाती है. लक्ष्मण के लिए वनवास एक चुना हुआ कर्तव्य था. उर्मिला के लिए वही कर्तव्य विरह बन गया.
ऐसे में उर्मिला निद्रा का जिक्र करना जरूरी हो जाता है. रामायण की बाद की लोककथाओं और क्षेत्रीय रामकथा परंपराओं में मिलने वाला एक प्रसिद्ध प्रसंग है. इसके मुताबिक, जब राम वनवास के लिए गए तो लक्ष्मण ने तय किया कि वे 14 वर्षों तक जागकर राम और सीता की सेवा और रक्षा करेंगे. उन्हें डर था कि अगर वे सो गए तो उनकी सेवा में बाधा आएगी. तब निद्रा देवी लक्ष्मण के पास आईं. लक्ष्मण ने उनसे आग्रह किया कि वे उनकी नींद किसी और को दे दें. इस लोककथा में आगे बताया गया है कि लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला ने लक्ष्मण की नींद खुद स्वीकार ली. इसके बाद उर्मिला चौदह वर्षों तक सोती रहीं और लक्ष्मण जागते रहे. राम, सीता और लक्ष्मण के अयोध्या लौटने पर उर्मिला की निद्रा समाप्त हुई.
तेलुगू लोक परंपरा में उर्मिला की नींद पर केंद्रित गीतों ने इसी मौन पीड़ा को विस्तार दिया. उर्मिला को केवल त्याग की प्रतिमा मान लेना भी उनके साथ न्याय नहीं होगा. आधुनिक लेखकों ने उन्हें इच्छाओं और असहमति दर्ज करने वाली स्त्री के रूप में फिर से देखने की कोशिश की है. इसका सबसे चर्चित उदाहरण कवयित्री और लेखिका कविता काने के उपन्यास Sita's Sister में मिलता है.
काने ने उर्मिला को कथा के हाशिये से उठाकर उसके केंद्र में रखा. उनके उपन्यास में उर्मिला में केवल पत्नी का समर्पण नहीं है. वह प्रेम करने वाली स्त्री है, अपनी इच्छाएं रखने वाली स्त्री है और अपने जीवन को लेकर सवाल करने वाली स्त्री है. साहित्यिक अध्ययनों ने भी काने की उर्मिला को ऐसी स्त्री के रूप में गढ़ा है जो पारंपरिक कथा में मौन कर दी गई आवाज को वापस हासिल करती है.
कविता काने अपनी लेखनी में उर्मिला को लक्ष्मण की पत्नी से कई कदम आगे ले जाती है. पारंपरिक कथाओं में जिन स्त्रियों को अक्सर किसी पुरुष पात्र से उनके संबंध के आधार पर पहचाना जाता है, काने की उर्मिला अपनी अलग पहचान मांगती है और शायद यही वह जगह है जहां उर्मिला आज की स्त्री के बहुत करीब आ जाती है. हर त्याग जंगल जाकर नहीं किया जाता. कुछ स्त्रियां घर के भीतर रहकर भी जंग लड़ती हैं. किसी का त्याग तलवार और धनुष के साथ दिखाई देता है, किसी का त्याग प्रतीक्षा, जिम्मेदारियों और अकेलेपन में छिपा रहता है. उर्मिला की कथा को आधुनिक नजर से पढ़ने वाले लेखक इसी मौन त्याग को बयान करते हैं.
उर्मिला के व्यक्तित्व का एक और पहलू उसका कर्तव्यबोध है. वह जनक की बेटी है. उस घर की जहां सीता का पालन-पोषण हुआ और जहां जीवन को केवल राजमहल की सुविधा के रूप में नहीं, बल्कि धर्म और विवेक के प्रश्नों के साथ देखा जाता है. यही कारण है कि बाद की रामकथाओं में उर्मिला को अक्सर ऐसी स्त्री के रूप में गढ़ा गया जो लक्ष्मण के धर्म को समझती है.
लेकिन उर्मिला के त्याग की खूबसूरती इसी में है कि उसे सिर्फ आदर्श पत्नी कह देना उसकी कहानी को छोटा कर देता है. आखिर वह भी एक स्त्री थी. वह भी अपने पति के साथ रहना चाहती होगी. वह भी शायद यह पूछ सकती थी कि अगर सीता अपने पति के साथ जा सकती हैं तो वह अपने पति के साथ क्यों नहीं? वह भी भयभीत हो सकती थी कि चौदह साल बाद क्या होगा. वह भी अपने विवाह के टूट जाने, पति के बदल जाने या जीवन के उन वर्षों के वापस न लौटने की आशंका से गुजर सकती थी. रामायण उसके इन मनोभावों का विस्तार नहीं करती.
यही वह खाली जगह है जिसे आधुनिक साहित्य भरता है. काने की उर्मिला इसी मानवीय द्वंद्व से गुजरती है. वह प्रेम करती है, लेकिन केवल प्रेम में विलीन नहीं हो जाती. वह पति के धर्म को समझती है, लेकिन अपनी पीड़ा से इनकार भी नहीं करती. साहित्यिक आलोचकों ने इसी वजह से उनके उर्मिला को आधुनिक भारतीय स्त्री के अनुभवों से जोड़कर देखा है.
उर्मिला की कहानी का सबसे बड़ा दुख शायद यह नहीं है कि उसका पति चौदह साल दूर रहा. सबसे बड़ा दुख यह है कि उसकी प्रतीक्षा की कोई कथा नहीं लिखी गई. राम वन में थे तो उनके सामने राक्षस, ऋषि, युद्ध और वन का संसार था. सीता के सामने हरण, अशोक वाटिका और अग्निपरीक्षा जैसी घटनाएं थीं. लक्ष्मण के सामने सेवा और युद्ध था. भरत के सामने बाट जोहता राजसिंहासन और राम की प्रतीक्षा थी लेकिन उर्मिला? उसके सामने रोजमर्रा का जीवन था. वह जीवन जिसमें हर दिन अपने भीतर एक छोटी सी जंग है.
और शायद इसी वजह से उर्मिला का त्याग हमें आज ज्यादा दिखाई देने लगा है क्योंकि आधुनिक जीवन में भी बहुत से रिश्तों में एक व्यक्ति बाहर की दुनिया में अपने लक्ष्य, नौकरी, संघर्ष या जिम्मेदारियों के लिए चला जाता है और दूसरा व्यक्ति पीछे रहकर उस जीवन की कीमत चुकाता है. इतिहास अक्सर उस व्यक्ति का नाम लिखता है जो सामने दिखाई देता है; उर्मिला हमें उस व्यक्ति की याद दिलाती है जो पीछे रहकर भी उस कहानी का हिस्सा होता है.
इसलिए उर्मिला को सीता से कमतर या अधिक त्याग करने वाली स्त्री साबित करने की जरूरत नहीं है. दोनों की यात्राएं अलग थीं. सीता का त्याग साथ चलने में था, उर्मिला का त्याग पीछे रह जाने में. सीता ने जंगल की धूल छानी. उर्मिला ने महल की दीवारों के भीतर विरह सहा. सीता ने राम के साथ वन का जीवन देखा. उर्मिला ने उस जीवन को केवल कल्पना में जिया. एक की पीड़ा दिखाई दी, दूसरी की पीड़ा कथा के बाहर रह गई.
और शायद रामायण की इस अनकही स्त्री को समझने का सबसे खूबसूरत तरीका यही है कि हम उसे लक्ष्मण की पत्नी कहकर कहानी समाप्त न करें. वह जनक की बेटी थी, सीता की बहन थी, लक्ष्मण की पत्नी थी लेकिन इन रिश्तों से आगे वह अपनी इच्छा, अपनी पीड़ा और अपने धैर्य वाली एक स्वतंत्र स्त्री भी थी. वाल्मीकि की कथा ने उसे बहुत कम शब्द दिए, लोककथाओं ने उसकी नींद को कथा बना दिया और आधुनिक लेखकों ने उसके मौन को आवाज दी. यही उर्मिला की सबसे बड़ी साहित्यिक यात्रा है. एक ऐसी स्त्री की यात्रा, जो रामायण में मौजूद थी, लेकिन जिसकी कहानी रामायण के शोर में कहीं दब गई.
शायद इसीलिए उर्मिला का नाम लेते हुए सबसे जरूरी सवाल यह नहीं होना चाहिए कि वह चौदह साल तक क्या करती रही? बल्कि यह होना चाहिए कि जब राम, सीता और लक्ष्मण अपनी-अपनी नियति की ओर जा रहे थे, तब पीछे छूट गई उर्मिला के भीतर क्या चल रहा था? रामायण उस सवाल का पूरा उत्तर नहीं देती लेकिन सदियों बाद लिखी जा रही उर्मिला की कहानियां इसी अधूरे उत्तर को तलाश रही हैं और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है. वह पात्र जितना कम कहा गया, उतना ही ज्यादा कहे जाने की गुंजाइश छोड़ गया.