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मैनपुरी में डिंपल यादव की जीत का 'पावरहाउस' कैसे बना शिवपाल यादव का जसवंतनगर?

मुलायम सिंह यादव के निधन से खाली हुई मैनपुरी लोकसभा सीट पर उपचुनाव में उनकी बहू डिंपल यादव की जीत हो गई है. डिंपल यादव ने बीजेपी के रघुराज शाक्य को लगभग तीन लाख वोटों के अंतर से हरा दिया है. लेकिन, डिंपल की इस जीत में चाचा ससुर शिवपाल यादव का बड़ा रोल है. उनकी जीत के पीछे शिवपाल यादव कैसे 'X' फैक्टर साबित हुए? समझें...

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मैनपुरी उपचुनाव की घोषणा के बाद अखिलेश-डिंपल ने सैफई जाकर शिवपाल यादव से मुलाकात की थी. (फाइल फोटो-PTI)
मैनपुरी उपचुनाव की घोषणा के बाद अखिलेश-डिंपल ने सैफई जाकर शिवपाल यादव से मुलाकात की थी. (फाइल फोटो-PTI)

मैनपुरी लोकसभा सीट पर समाजवादी पार्टी का दबदबा कायम रहा है. यहां से डिंपल यादव जीत गईं हैं. उन्होंने बीजेपी के रघुराज शाक्य को लगभग तीन लाख वोटों के अंतर से हरा दिया है. 

चुनाव आयोग के मुताबिक, डिंपल यादव को 6 लाख से ज्यादा यानी 64% वोट मिले हैं. वहीं, रघुराज शाक्य को 3 लाख 29 हजार 659 वोट मिले हैं. डिंपल यादव को कुल 6 लाख 18 हजार 120 वोट मिले हैं. यानी डिंपल ने बीजेपी उम्मीदवार को कुल 2 लाख 88 हजार 461 वोटों से हराया है.

डिंपल यादव अखिलेश यादव की पत्नी हैं और मुलायम सिंह यादव की बहू. समाजवादी पार्टी ने डिंपल को जिस सीट से चुनावी मैदान में उतारा था, उस पर ढाई दशकों तक यादव परिवार का ही कब्जा था. इस साल 10 अक्टूबर को मुलायम सिंह के निधन के बाद ये सीट खाली हो गई थी. इसलिए यहां उपचुनाव कराए गए.

डिंपल को चुनावी मैदान में उतारकर अखिलेश यादव ने एक बहुत बड़ा दांव खेला था. इसकी सबसे बड़ी वजह तो यही थी कि जिस सीट पर डिंपल यादव खड़ी हुई थीं, उससे मुलायम सिंह यादव सांसद हुआ करते थे. 

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और दूसरी वजह ये थी कि इसी साल बीजेपी ने आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा सीट उपचुनाव में समाजवादी पार्टी से छीन ली थी. आजमगढ़ में बीजेपी के दिनेश लाल यादव निरहुआ तो रामपुर में घनश्याम लोधी की जीत हुई थी. इसके बाद बीजेपी के टारगेट पर मैनपुरी सीट ही थी. 

पर मैनपुरी में डिंपल यादव की जीत शायद इतनी बड़ी न होती अगर शिवपाल यादव ने साथ न दिया होता.

शिवपाल के बिना जीत नहीं होती आसान

मैनपुरी लोकसभा सीट पर 1996 से पांच बार मुलायम सिंह यादव जीत दर्ज कर चुके हैं. इस लोकसभा में पांच विधानसभा सीट- मैनपुरी सदर, जसवंतनगर, करहल, किशनी और भोगांव.

इसी इलाके में यादव परिवार की दो विधानसभा सीट हैं. एक है- जसवंतनगर, जो शिवपाल यादव की सीट है. दूसरी है- करहल, जहां से अखिलेश यादव विधायक हैं.

अब तक जो नतीजे सामने आए हैं, उसके मुताबिक डिंपल यादव को सबसे ज्यादा बढ़त जसवंतनगर विधानसभा में मिली है. शिवपाल यादव ने भी इस पर ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने डिंपल यादव को आशीर्वाद देने के लिए जसवंतनगर की जनता को धन्यवाद दिया. 

दूसरी बात ये कि जो बीजेपी के रघुराज शाक्य डिंपल के सामने हैं, उन्हें शिवपाल यादव का करीबी भी माना जाता है. सिर्फ शिवपाल ही नहीं, बल्कि मुलायम सिंह यादव के खासमखास माने जाते थे. वो इसलिए क्योंकि रघुराज समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक है. 

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2017 के विधानसभा चुनाव से पहले चाचा शिवपाल और भतीजे अखिलेश के बीच तनातनी होने लगी. शिवपाल अलग हो गए और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी बना ली. अखिलेश के फ्रंट में आने के बाद रघुराज का टिकट भी कट गया और वो इससे नाराज होकर शिवपाल की पार्टी में शामिल हो गए.

लेकिन बाद में समाजवादी पार्टी और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का गठबंधन हो गया. फिर भी रघुराज को टिकट नहीं मिला और वो शिवपाल का साथ छोड़कर बीजेपी में आ गए. 

'तल्खी' से लेकर 'हम साथ-साथ हैं' का सफर

इस साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए. समाजवादी पार्टी 112 सीट ही जीत सकी. चुनाव में समाजवादी पार्टी और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का गठबंधन था. 

चुनाव में हार के बाद शिवपाल यादव और अखिलेश के रिश्तों में 'तल्खी' आ गई. 23 जुलाई को सपा ने एक चिट्ठी जारी कर कहा, 'अगर आपको लगता है कि कहीं आपको ज्यादा सम्मान मिलेगा तो वहां जाने के लिए आप स्वतंत्र हैं.' इस पर शिवपाल ने भी जवाब दिया और लिखा, 'औपचारिक स्वतंत्रता के लिए धन्यवाद. राजनीतिक यात्रा में सिद्धांतों और सम्मान से समझौता अस्वीकार्य है.'

हालांकि, चार महीने बाद ही अखिलेश के रिश्ते 'तल्खी' से लेकर 'हम साथ-साथ हैं' में बदल गए. मैनपुरी उपचुनाव की घोषणा के बाद अखिलेश और डिंपल सैफई पहुंचे और शिवपाल से मुलाकात की. इसके बाद शिवपाल ने डिंपल को समर्थन का ऐलान कर दिया. उन्होंने बहू को वोट देने की अपील की.

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मैनपुरी में शिवपाल ही क्यों हैं 'जीत की चाबी'?

मैनपुरी लोकसभा सीट में आने वाली जसवंतनगर विधानसभा सीट पर शिवपाल ही 'जीत की चाबी' हैं. वो कैसे? इसे 2019 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों से समझिए.

2019 में मैनपुरी में लड़ाई सपा के मुलायम सिंह यादव और बीजेपी के प्रेम सिंह शाक्य के बीच थी. मैनपुरी, भोंगांव, किशनी और करहल विधानसभा में मुलायम और प्रेम सिंह के बीच जीत-हार में ज्यादा बड़ा अंतर नहीं था. 

भोंगांव में मुलायम सिंह यादव साढ़े 6 हजार, किशनी में लगभग 13 हजार और करहल में 38 हजार वोटों से आगे रहे थे. जबकि, भोंगांव में बीजेपी के प्रेम सिंह साढ़े 25 हजार से ज्यादा वोटों से आगे थे. लेकिन जसवंतनगर में मुलायम सिंह यादव 62 हजार से ज्यादा वोटों से आगे रही. इससे समझा जा सकता है कि भाई शिवपाल के ही इलाके से मुलायम सिंह को सबसे बड़ी जीत मिली. 

अब एक बार फिर जब मैनपुरी में मुलायम की जगह डिंपल यादव खड़ी हैं तो उन्हें भी अपने चाचा ससुर शिवपाल यादव के इलाके में ही सबसे ज्यादा लीड मिली है. इन आंकड़ों से ये कहा जा सकता है कि मैनपुरी से लोकसभा जाने की 'चाबी' चाचा शिवपाल की विधानसभा से होकर जाती है.

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