scorecardresearch
 

बाहुबली अमरमणि त्रिपाठी के चुनाव मैदान में उतरने से क्या बदल जाएगा महाराजगंज का गणित?

अमरमणि त्रिपाठी और उनके बेटे अमनमणि के चुनाव लड़ने के ऐलान से महाराजगंज और गोरखपुर की राजनीति में नया मोड़ आ गया है. इस कदम से फरेंदा और नौतनवा विधानसभा सीटों पर चुनावी मुकाबला अब बेहद दिलचस्प और बहुकोणीय हो गया है.

Advertisement
X
अमर मणि त्रिपाठी ने चुनाव लड़ने का किया ऐलान (Photo-ITG)
अमर मणि त्रिपाठी ने चुनाव लड़ने का किया ऐलान (Photo-ITG)

कवयित्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में सजा काटने और अब रिहाई के बाद बाहुबली अमरमणि त्रिपाठी ने 2027 का विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए ताल ठोक दी है. नेपाल से सटे उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले की फरेंदा सीट से अमरमणि ने खुद और नौतनवा सीट से अपने बेटे अमनमणि के लड़ने का ऐलान किया. उन्होंने साथ ही चैलेंज करते हुए कहा, 'अगर कोई मुकाबले का हो तो बताओ?'

महाराजगंज की सियासत में लंबे समय तक तुरुप का इक्का रहे बाहुबली अमरमणि त्रिपाठी करीब 20 साल बाद सार्वजनिक जनसभा को संबोधित करते हुए नजर आए. वह रविवार शाम 4 बजे आनंदनगर स्थित कृष्णा मैरिज हॉल में आयोजित जनसंवाद कार्यक्रम में शामिल हुए थे. अमरमणि ने इसी कार्यक्रम में लोगों से मुलाकात की और चुनाव लड़ने का ऐलान किया.

अमरमणि त्रिपाठी के चुनावी मैदान में उतरने को महाराजगंज और पूर्वांचल की राजनीति में बड़ा सियासी मोड़ माना जा रहा है. पूर्वांचल की सियासत में हरिशंकर तिवारी के बाद अमरमणि दूसरे सबसे बड़े ब्राह्मण चेहरे माने जाते रहे हैं. मधुमिता शुक्ला हत्याकांड के बाद उनकी सियासी विरासत बेटे अमनमणि ने संभाली, लेकिन वे 2022 का चुनाव हार गए. अब अमरमणि ने जेल से रिहा होते ही चुनावी मैदान में उतरने का ऐलान कर महाराजगंज और गोरखपुर की सियासी तपिश बढ़ा दी है.

Advertisement

अमरमणि 20 साल के बाद चुनावी पिच पर उतरेंगे

पूर्वांचल की सियासत में अमरमणि त्रिपाठी एक समय बड़ा नाम हुआ करते थे, लेकिन मधुमिता शुक्ला हत्याकांड के चलते उनकी सियासत हाशिए पर चली गई. अमरमणि त्रिपाठी और उनकी पत्नी मधुमणि को उम्रकैद की सजा हुई थी. करीब 20 साल जेल में रहने के बाद साल 2023 में वे रिहा हुए थे और अब चुनाव मैदान में उतरने का ऐलान कर दिया है.

अमरमणि ने कहा, "हमारा परिवार लंबे समय से जनता के बीच रहकर राजनीति करता आया है. हमारा जनता से रिश्ता केवल चुनाव तक सीमित नहीं है. हम आगे भी लोगों के बीच रहेंगे और उनके सुख-दुख में साथ खड़े रहेंगे. उन्होंने फरेंदा विधानसभा क्षेत्र से अपने पुराने रिश्ते का भी जिक्र किया. इसके साथ ही अमरमणि ने अपने और बेटे के चुनाव लड़ने का सार्वजनिक ऐलान किया.

नौतनवा के पूर्व विधायक अमनमणि त्रिपाठी ने भी अपने पिता के लिए समर्थन मांगा. इसके साथ ही लोगों से अमरमणि को फरेंदा से विजयी बनाने की अपील की. अमनमणि ने कांग्रेस के मौजूदा विधायक वीरेंद्र चौधरी पर तंज कसा और कहा, "कई बार चुनाव लड़ने के बाद इस बार जनता की सहानुभूति से उन्हें जीत मिली. राजनीतिक लड़ाई में जनता को हमारे परिवार का साथ देना चाहिए.

हालांकि, अमरमणि त्रिपाठी ने किसी दल के टिकट से चुनाव लड़ने की कोई घोषणा नहीं की है. लेकिन, अमरमणि की वापसी के बाद से महाराजगंज की राजनीति में हलचल शुरू हो गई है. हाल ही में नौतनवा में एक प्राइवेट अस्पताल के उद्घाटन कार्यक्रम के दौरान उनके समर्थकों ने ‘अमरमणि त्रिपाठी जिंदाबाद’ के नारे लगाए थे और अब उन्होंने खुद चुनाव लड़ने का ऐलान कर सियासी माहौल गर्मा दिया है.

Advertisement

फरेंदा और नौतनवा सीटों पर सीधा असर

फरेंदा सीट पर फिलहाल कांग्रेस का कब्जा है और कांग्रेस के वीरेंद्र चौधरी विधायक हैं. अमरमणि के चुनाव में उतरने से यहां का मुकाबला अब तक के दोतरफा (सपा/कांग्रेस बनाम भाजपा) से बदलकर बहुकोणीय हो जाएगा. पुराने रसूख और स्थानीय कैडर के बल पर वे बड़े राजनीतिक दलों (भाजपा और सपा) के गणित को बिगाड़ सकते हैं.

नौतनवा विधानसभा सीट त्रिपाठी परिवार का पारंपरिक गढ़ रही है. 1989 में अमरमणि त्रिपाठी पहली बार विधायक बने, लेकिन साल 1991 के चुनाव में हार गए, उसके बाद लगातार तीन चुनावों 1996, 2002 और 2007 में अमरमणि कांग्रेस, बसपा व सपा के टिकट पर चुनाव लड़े और जीत की हैट्रिक लगाई. इसके बाद उनके बेटे अमनमणि चुनाव जीते, लेकिन 2022 में हार गए.

अमरमणि त्रिपाठी के सक्रिय होने से उनके बेटे अमनमणि त्रिपाठी को राजनीतिक ताकत मिलेगी, जिससे भाजपा-निषाद पार्टी गठबंधन और सपा के प्रत्याशियों के लिए चुनौती बढ़ जाएगी. 2022 में निषाद पार्टी के ऋषि त्रिपाठी बीजेपी के समर्थन से जीते थे, लेकिन अब सियासी हालात बदल चुके हैं. ऐसे में फरेंदा और नौतनवा सीट पर मुकाबला रोचक हो सकता है.

'बाहुबल और ब्राह्मण राजनीति' की वापसी

पूर्वांचल में ब्राह्मण राजनीति का एक बड़ा दौर अमरमणि त्रिपाठी और हरिशंकर तिवारी के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है. अमरमणि त्रिपाठी का खुद चुनावी मैदान में आना पूर्वांचल के महाराजगंज क्षेत्र में परंपरागत 'ब्राह्मण बनाम ठाकुर' या जातीय ध्रुवीकरण के समीकरण को फिर से हवा दे सकता है. महाराजगंज और गोरखपुर बेल्ट के ब्राह्मण मतदाता अमरमणि के पारिवारिक राजनीतिक रसूख से सीधे प्रभावित होते रहे हैं.

Advertisement

80 के दशक में नौतनवा विधानसभा की पहचान लक्ष्मीपुर विधानसभा के रूप में थी. छात्र राजनीति से उभरे बाहुबली नेता वीरेंद्र प्रताप शाही ने लक्ष्मीपुर से चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया और 1985 में विधानसभा की सियासत में कदम रखा/ उनको अखिलेश सिंह का साथ मिला. 

निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में वीरेंद्र प्रताप शाही पहली बार अमरमणि को शिकस्त देकर विधायक बने थे. बाद में रेलवे के ठेकों को लेकर शिव प्रकाश शुक्ला ने वीरेंद्र प्रताप शाही की हत्या कर दी/ उसके बाद 1989 में अमरमणि लक्ष्मीपुर से विधानसभा चुनाव में उतरे और विधायक बने.

पूर्वांचल की राजनीति में, खासकर महाराजगंज और गोरखपुर बेल्ट में ब्राह्मण मतदाता बड़ी संख्या में हैं. अमरमणि अपने संवाद कार्यक्रमों में विकास, पुरानी स्मृतियों और युवा बेरोजगारी जैसे मुद्दों का सहारा ले रहे हैं. हालांकि, उनकी आपराधिक छवि और पुराना विवाद (मधुमिता हत्याकांड) नए दौर के शहरी व युवा मतदाताओं के बीच एक बड़ा नकारात्मक पहलू भी है.

अमरमणि त्रिपाठी की सक्रियता से महाराजगंज जिला एक बार फिर हाई-प्रोफाइल चुनावी अखाड़ा बन गया है, जिससे क्षेत्र में राजनीतिक असर वाले नेताओं की भूमिका बेहद निर्णायक हो जाएगी. महाराजगंज जिले में पांच विधानसभा सीटें आती हैं. महाराजगंज जिले की नौतनवा और फरेंदा विधानसभा सीटों पर मुकाबला रोचक हो सकता है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement