झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की CGL परीक्षा में हुई धांधली और पेपर लीक मामले में हर दिन नए और सनसनीखेज खुलासे हो रहे हैं. इस पूरे फर्जीवाड़े के खिलाफ सबसे पहले कानूनी लड़ाई की शुरुआत करने वाले व्हिसलब्लोअर और अभ्यर्थी राजेश प्रसाद ने 'आजतक' से खास बातचीत में इस पूरे 'सेटिंग सिंडिकेट' की परतें उघेड़ कर रख दी हैं.
राजेश प्रसाद वही अभ्यर्थी हैं जिन्होंने JSSC CGL में हुई धांधली को उजागर करते हुए सबसे पहले थाने का दरवाजा खटखटाया था. उनका कहना है कि 2024 में जब पहली बार JSSC CGL परीक्षा आयोजित हुई थी, तब पेपर लीक के चलते उसे रद्द करना पड़ा था. इसके बाद सितंबर 2024 में दोबारा परीक्षा कराई गई, लेकिन इसमें भी भारी स्तर पर धांधली और सेटिंग की गई.
व्हिसलब्लोअर राजेश प्रसाद के मुख्य खुलासे
धांधली के सबूत जुटाकर जब वे रांची के सदर थाने में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने पहुंचे, तो पुलिस ने मामला दर्ज करने से साफ़ इनकार कर दिया. फिर पुलिस के रवैये से निराश होने के बजाय उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया और PIL (जनहित याचिका) दाखिल की. उच्च न्यायालय के सख्त आदेश के बाद पुलिस ने केस दर्ज किया और जांच CID को सौंपी गई.
राजेश का दावा है कि सीआईडी की शुरुआती जांच में ही अभ्यर्थियों के आरोप सच साबित हुए हैं और यह स्पष्ट हो गया है कि परीक्षा में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा हुआ था.
नेपाल, पटना से हजारीबाग तक रटवाए गए जवाब
एक्सक्लूसिव बातचीत में राजेश प्रसाद ने सिंडिकेट के काम करने के तरीके का भी पर्दाफाश किया. उन्होंने बताया कि यह धांधली केवल झारखंड की सीमाओं तक सीमित नहीं थी. आरोप है कि परीक्षा से ठीक पहले 'सेटिंग वाले' अभ्यर्थियों को नेपाल, पटना, नियामतपुर और हजारीबाग जैसी जगहों पर गुप्त ठिकानों में ले जाया गया. वहां अभ्यर्थियों को प्रश्न पत्र और उनके उत्तर रटवाए गए थे.
CID की जांच अधूरी, CBI ही कर सकती है पूरा इंसाफ
राजेश प्रसाद का कहना है कि CID अपनी जांच में सही दिशा में आगे तो बढ़ी है, लेकिन अंतर्राज्यीय और अंतरराष्ट्रीय (नेपाल) तारों को खंगालने में उसके हाथ बंधे हुए हैं. सीआईडी हर उस ठिकाने तक नहीं पहुंच पा रही है जहां इस धांधली की जड़ें फैली हुई हैं.
यही वजह है कि अभ्यर्थी और व्हिसलब्लोअर शुरू से ही इस पूरे मामले को सीबीआई (CBI) को सौंपने की मांग कर रहे हैं. छात्रों का स्पष्ट कहना है कि जब तक केंद्रीय जांच एजेंसी इस मामले को अपने हाथ में नहीं लेती, तब तक इसके पीछे छिपे बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक चेहरों के नाम सामने नहीं आ पाएंगे.