आजतक की सुरक्षा सभा में 'ताकत वतन की' सेशन के दौरान अट्ठाईसवें थल सेना अध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे का स्वागत जोरदार तालियों के साथ किया गया. अति विशिष्ट सेवा मेडल, सेना मेडल और विशिष्ट सेवा मेडल से अलंकृत जनरल नरवणे ने गलवान घाटी की घटनाओं और उत्तरी सीमाओं पर भारत की संप्रभुता की रक्षा के लिए सेना का नेतृत्व किया.
चार दशकों के बेदाग सैन्य करियर वाले इस दूरदर्शी रणनीतिकार ने ऑपरेशन सिंदूर, बदलते युद्ध स्वरूप, पाकिस्तान-चीन चुनौतियों और भविष्य की तैयारियों पर खुलकर बात की. उनका संबोधन सिर्फ सैन्य विश्लेषण नहीं बल्कि राष्ट्र की एकता, रणनीतिक धैर्य और दीर्घकालिक दृष्टि का दस्तावेज बन गया.
ऑपरेशन सिंदूर: तीन पी का सिद्धांत और नई सैन्य नीति
जनरल नरवणे ने ऑपरेशन सिंदूर को पिछले अभियानों से अलग बताया. उड़ी और पुलवामा के बाद की कार्रवाइयां ज्यादातर नियंत्रण रेखा के आसपास सीमित थीं. इस बार भारतीय सेना ने न सिर्फ पाक अधिकृत कश्मीर बल्कि पाकिस्तान के अंदरूनी इलाकों में आतंकी ठिकानों पर हमला किया. रक्षा मंत्री के शब्दों में 'घुस-घुस कर मारेंगे' वाली नीति को अमल में लाया गया.
जनरल ने इसे तीन P का अभियान बताया- प्यूनिटिव यानी दंडात्मक, प्रिसाइज यानी सटीक और प्रपोर्शनेट यानी आनुपातिक. दंडात्मक इसलिए क्योंकि दुश्मन को सबक सिखाना था कि भारत चुपचाप नहीं बैठेगा. सटीक इसलिए क्योंकि सिर्फ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया, आम नागरिकों को नुकसान पहुंचाने वाली अंधाधुंध गोलाबारी नहीं की गई.
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आनुपातिक इसलिए क्योंकि जवाब इतना भारी नहीं था कि बड़ा बैकलैश झेलना पड़े. इस संयमित लेकिन प्रभावी कार्रवाई ने भारत की सैन्य नीति की परिपक्वता को दुनिया के सामने रखा.
समाज की एकता: सैन्य जीत से बड़ी असली जीत
पेलगाम आतंकी हमले का मकसद सिर्फ हिंसा नहीं बल्कि भारतीय समाज में दरार पैदा करना था. आतंकियों को उम्मीद थी कि दंगे भड़केंगे और देश जल उठेगा. लेकिन समाज एकजुट रहा. जनरल नरवणे ने इसे सैन्य सफलता से भी बड़ी जीत बताया. भारत भाषा, धर्म, रीति-रिवाज और खान-पान में विविधता वाला देश है.
दुश्मन बार-बार इस विविधता को विभाजन में बदलने की कोशिश करेंगे. लेकिन अनेकता में एकता की ताकत को याद रखना होगा. उन्होंने कविता की पंक्तियां दोहराईं कि यूनान, मिस्र, रोम मिट गए लेकिन भारत की हस्ती नहीं मिटती. सदियों से दुश्मन घेरते रहे फिर भी देश डटा रहा. यह सामाजिक एकजुटता भविष्य की चुनौतियों का सबसे बड़ा कवच बनेगी.
युद्ध का बदलता स्वरूप: शुरू करना आसान, खत्म करना कठिन
दुनिया भर में युद्ध का चरित्र बदल रहा है. रूस ने यूक्रेन युद्ध एक महीने में खत्म करने का दावा किया था लेकिन सालों से चल रहा है. अमेरिका-ईरान तनाव भी लंबे खिंचने के संकेत दे रहा है. जनरल नरवणे ने पुरानी कहावत दोहराई- अगर शांति चाहिए तो युद्ध की तैयारी करो.
सेना हमेशा तैयार रहती है लेकिन युद्ध अंतिम विकल्प होना चाहिए. विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री बार-बार संवाद से मतभेद दूर करने पर जोर देते हैं. शांति और विकास एक-दूसरे से जुड़े हैं. युद्ध शुरू करना आसान है लेकिन खत्म करना मुश्किल क्योंकि यह अपना अलग मोड़ ले लेता है. इसलिए एग्जिट रणनीति जरूरी है.
ऑपरेशन सिंदूर में जब राजनीतिक-सैन्य लक्ष्य हासिल हो गए तो कार्रवाई रोक दी गई. कई लोग पूछते हैं कि जब बढ़त थी तो आगे क्यों नहीं बढ़े. जनरल का जवाब साफ था- लक्ष्य पूरा होने के बाद रोकना ही समझदारी थी. इससे भारत का वैश्विक कद बढ़ा और कम समय में कम नुकसान के साथ ऑपरेशन पूरा करने की क्षमता साबित हुई.
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पाकिस्तान बनाम चीन: अल्पकालिक और दीर्घकालिक चुनौतियां
दोनों देशों के साथ भारत युद्ध लड़ चुका है और सीमा विवाद लंबित हैं. पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देता है इसलिए अल्पकाल में उस पर नजर रखनी होगी. लेकिन दीर्घकाल में चीन रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी होगा. वह तत्काल दुश्मन नहीं लेकिन सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर प्रतिस्पर्धी है.
चीन हर दूसरे दिन नई क्षमताएं दिखाता है—ड्रोन, साइबर, यूएवी. जनरल ने सलाह दी कि इन्हें थोड़े संदेह के साथ देखना चाहिए क्योंकि ये युद्ध-परीक्षित नहीं हैं. असली फैसला नेटवर्किंग करेगी.
नेटवर्क सेंट्रिक वारफेयर, सेंसर-टू-शूटर लूप और ओओडीए (ऑब्जर्व, ओरिएंट, डिसाइड, एक्ट) चक्र को कितना तेज किया जा सकता है, यही भविष्य तय करेगा. हथियार और प्लेटफॉर्म बनते रहेंगे. यह शरीर के केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की तरह है जो सभी अंगों को जोड़ता है.
भारत-चीन संबंध: 1962 से आगे की परिपक्वता
1962 की यादें पुरानी हो चुकी हैं. डोकलाम, गलवान और 1967 की घटनाओं ने दिखाया कि भारत की सैन्य क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति दोनों बदल चुकी हैं. सीमा समस्या का सैन्य समाधान संभव नहीं. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी यही बात कही जाती है.
समाधान बातचीत से ही निकलेगा और रिश्ते तीन पारस्परिक सिद्धांतों पर आधारित होने चाहिए. भारत अब इतना मजबूत है कि कोई सैन्य दुस्साहस आसानी से नहीं हो सकता. बातचीत की मेज पर मजबूती सैन्य क्षमता से ही आती है.
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फौजी से कहानीकार तक: नया अध्याय
रिटायरमेंट के बाद जनरल नरवणे ने खुद को चुनौती दी और आधुनिक रहस्य उपन्यास लिखा. “द कैंटोनमेंट कॉन्सपिरेसी” सेना छावनी में सेट है जिसमें ड्यूटी, ऑनर और डिसिप्लिन के बीच टकराव दिखाया गया है. कई बार इज्जत के नाम पर गलत कदम उठाए जाते हैं.
किताब ढाई महीने में पूरी हुई क्योंकि कहानी सालों से दिमाग में थी. फौज से रिटायर होते हैं लेकिन जीवन से नहीं. नई चीजें सीखना और खुद को चुनौती देना जरूरी है. जनरल एमएम नरवणे के विचार भारतीय सैन्य चिंतन की परिपक्वता को दर्शाते हैं. ऑपरेशन सिंदूर ने संयम और शक्ति का संतुलन दिखाया.
समाज की एकता असली ताकत है. चीन के साथ दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा के लिए नेटवर्क और तकनीक पर ध्यान देना होगा. युद्ध अंतिम विकल्प रहे और संवाद को प्राथमिकता दी जाए. यह संदेश न सिर्फ सुरक्षा विशेषज्ञों बल्कि हर नागरिक के लिए महत्वपूर्ण है. वतन की ताकत सिर्फ हथियारों में नहीं बल्कि एकजुट समाज और दूरदर्शी रणनीति में बसती है.