बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को अवैध हिरासत के मामले में 26 वर्षीय युवक को 2 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है. कोर्ट ने राज्य पुलिस के उस आदर्श वाक्य की भी याद दिलाई, जिसमें अच्छे लोगों की रक्षा और बुराई को दंडित करने की बात कही गई है.
हाईकोर्ट की नागपुर पीठ के जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस राज वाकोडे ने 31 अगस्त को दिए अपने फैसले में कहा कि अकोला पुलिस ने याचिकाकर्ता वैभव सूर्यवंशी को अवैध तरीके से हिरासत में लेकर उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया.
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जो लोग आपराधिक कानून का प्रशासन करने के लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि उनका कर्तव्य केवल उनके सामने मौजूद आरोपी व्यक्ति के प्रति ही नहीं, बल्कि राज्य और पूरे समाज के प्रति भी है.
हाईकोर्ट ने क्या कहा
हाईकोर्ट ने कहा कि यह याद दिलाना प्रासंगिक होगा कि महाराष्ट्र राज्य पुलिस का आदर्श वाक्य 'सद्रक्षणाय खलनिघ्रहणाय' यानी अच्छे लोगों की रक्षा करना और बुराई को दंडित करना है, जिसका सम्मान किया जाना चाहिए." कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को याचिकाकर्ता को 2 लाख रुपये का मुआवजा आठ सप्ताह के भीतर देने का आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि पुलिस से जुड़े ऐसे मामले आपराधिक न्याय व्यवस्था में लोगों के भरोसे को निजी व्यक्तियों से जुड़े मामलों की तुलना में कहीं ज्यादा कमजोर करते हैं.
याचिकाकर्ता ने दो अकोला पुलिस अधिकारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई की मांग की थी. उसने आरोप लगाया था कि पुलिस अधिकारियों ने उसे अवैध रूप से हिरासत में लिया और उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया. इसके साथ ही उसने अवैध हिरासत के लिए मुआवजे की भी मांग की थी.
कब का है मामला
याचिका के मुताबिक, मार्च 2024 में जब सूर्यवंशी अपने पिता और चाचा के स्वामित्व वाले होटल में मौजूद था, तब पुलिस ने उसे हिरासत में लिया था. याचिका में दावा किया गया कि दोनों पुलिसकर्मियों ने पहले उसके चाचा के बारे में पूछताछ की और हर महीने भुगतान की मांग की. सूर्यवंशी के इनकार करने पर पुलिसकर्मियों ने उसके साथ मौखिक दुर्व्यवहार किया और उसे हिरासत में ले लिया.
पुलिस ने दावा किया कि उसके खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था. सूर्यवंशी को अगले दिन घर जाने की अनुमति दे दी गई. हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पुलिस ने सूर्यवंशी को कानून के तहत जरूरी समन या गिरफ्तारी के आधार बताने वाला मेमो जारी नहीं किया. कोर्ट ने कहा, 'जब पुलिस ही उस कानून का उल्लंघन करती है, जिसकी रक्षा करना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है, तो ऐसे उल्लंघन की सजा इतनी कड़ी होनी चाहिए कि उसका प्रभावी निवारक असर हो और समाज में विश्वास कायम हो.'