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'फ्यूचर में हर लड़ाई ड्रोन वॉर होगी', पूर्व DRDO वैज्ञानिक ने सुनाया अमेरिका के F-16 का चौंकाने वाला किस्सा

पूर्व ब्रह्मोस प्रमुख डॉ. सुधीर मिश्रा और डीआरडीओ के डॉ. हरि बाबू श्रीवास्तव ने सुरक्षा सभा में कहा कि भविष्य का युद्ध ड्रोन आधारित होगा. आत्मनिर्भर भारत, तेजी से तकनीक अपनाने और निर्यात क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया.

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पूर्व ब्रह्मोस प्रमुख डॉ. सुधीर मिश्रा और डीआरडीओ के डॉ. हरि बाबू श्रीवास्तव. (Photo: ITG)
पूर्व ब्रह्मोस प्रमुख डॉ. सुधीर मिश्रा और डीआरडीओ के डॉ. हरि बाबू श्रीवास्तव. (Photo: ITG)

आजतक सुरक्षा सभा में ब्रह्मोस एयरोस्पेस के पूर्व एमडी और सीईओ डॉ. सुधीर मिश्रा तथा डीआरडीओ के पूर्व महानिदेशक (प्रौद्योगिकी प्रबंधन) डॉ. हरि बाबू श्रीवास्तव ने देश की रक्षा तैयारियों पर खुलकर बात की. उन्होंने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में भारत अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में घिरा हुआ दिखता है. 

एक तरफ अमेरिका से विमान इंजनों की आपूर्ति में देरी से तेजस लड़ाकू विमान परियोजना प्रभावित हो रही है. दूसरी तरफ रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण रूस से अत्याधुनिक हथियारों और स्पेयर्स में विलंब हो रहा है. तीसरी तरफ पाकिस्तान को तुर्की और चीन से एडवांस ड्रोन मिल रहे हैं. ऐसी स्थिति में आत्मनिर्भर भारत और मजबूत रक्षा अनुसंधान-विकास ही अर्जुन का गांडीव बन सकते हैं.  

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ऑपरेशन सिंदूर और मेड इन इंडिया हथियारों की सफलता

दोनों विशेषज्ञों ने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए बताया कि इसमें मेड इन इंडिया हथियारों ने जबरदस्त भूमिका निभाई. ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ने मुरीद, बहावलपुर और पाकिस्तानी एयरबेस जैसे ठिकानों को सटीक निशाना बनाया. एकीकृत वायु रक्षा प्रणाली भी प्रभावी साबित हुई. उन्होंने जोर दिया कि भारतीय हथियार अब विश्व स्तरीय हैं. 

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इसका सबसे बड़ा प्रमाण निर्यात है. 2013 में रक्षा निर्यात करीब 600 करोड़ रुपये था, जो अब लगभग 38 हजार करोड़ रुपये यानी करीब तीन अरब डॉलर तक पहुंच चुका है. सौ से ज्यादा देशों को रडार, रॉकेट, तोप और अन्य सिस्टम भेजे जा रहे हैं. यूरोपीय और पूर्वी एशियाई देशों की आपूर्ति श्रृंखला में भी भारत शामिल हो रहा है.  

मिसाइल कार्यक्रम की सफलता और कावेरी इंजन की चुनौतियां

Aaj Tak Suraksha Sabha

डॉ. मिश्रा ने एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम की सफलता का विस्तार से जिक्र किया. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नेतृत्व में शुरू हुए इस कार्यक्रम से अग्नि, पृथ्वी, आकाश, नाग, त्रिशूल, अस्त्र श्रृंखला और ब्रह्मोस जैसे सिस्टम निकले. 

अब कुशा और सुदर्शन चक्र जैसी व्यापक वायु रक्षा प्रणाली पर काम चल रहा है, जिसमें शॉर्ट रेंज से लेकर 400 किलोमीटर से अधिक रेंज की मिसाइलें और 600 किलोमीटर से अधिक रेंज के रडार शामिल हैं. इन रडारों का निर्यात भी हो रहा है.  

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इसके विपरीत कावेरी इंजन परियोजना सफल नहीं हो सकी. कारण कई थे- उस समय सीमित विनिर्माण क्षमता, विदेशी निर्भरता, नौकरशाही देरी, दूरदर्शी नेतृत्व की कमी और उपयोगकर्ता द्वारा बार-बार लक्ष्य बदलना. जब कोई परियोजना सफल होती है तो एक कारण होता है, असफल होने पर दर्जनों कारण सामने आते हैं.  

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भविष्य का युद्ध: ड्रोन, रोबोट और मानवरहित सिस्टम

डॉ. श्रीवास्तव ने साफ कहा कि भविष्य की हर लड़ाई ड्रोन युद्ध होगी. यूक्रेन युद्ध में 70 प्रतिशत से ज्यादा काइनेटिक हमले ड्रोन से हुए. अमेरिका ने अभ्यास में मानवरहित एफ-16 भी तैनात किया. चीन रोबोटिक ओलंपिक के जरिए मानव सदृश रोबोट दिखा रहा है, जो भविष्य में सैनिकों की जगह ले सकते हैं. 

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ऊंचाई वाले इलाकों में थकान और ऑक्सीजन की कमी से मुक्त रोबोट और ड्रोन कार्गो ले जा सकते हैं. अगले सात-दस साल तक ड्रोन आधारित युद्ध ही मुख्य रहेगा. इसलिए आज ही तकनीक का बीजारोपण करना होगा. लैब से युद्धक्षेत्र तक का समय हफ्तों में लाना होगा, जैसा यूक्रेन कर रहा है.  

नीतिगत बदलाव से रक्षा उत्पादन 40 हजार करोड़ से बढ़कर 1.1 लाख करोड़ रुपये हो चुका है. 2030 तक तीन लाख करोड़ और निर्यात 50 हजार करोड़ का लक्ष्य है. रक्षा गलियारे और निजी उद्योग भी लक्ष्य तय कर रहे हैं. विशेषज्ञों का सुझाव है कि DRDO को मजबूत किया जाए, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तेज हो, प्राइवेट सेक्टर और पीएसयू को उत्पादन सौंपा जाए तथा डारपा जैसी स्वतंत्र अनुसंधान संस्था बनाई जाए. 

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सिविल-मिलिट्री इंटीग्रेशन जरूरी है ताकि शांति काल में भी ड्रोन उद्योग जिंदा रहे- स्वास्थ्य, आपदा प्रबंधन और निर्यात में इस्तेमाल हो. रोज पांच हजार ड्रोन बनाने की क्षमता विकसित करनी होगी. प्रत्यक्ष ऊर्जा हथियार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस काउंटर-ड्रोन सिस्टम में अहम भूमिका निभाएंगे. 

आईएसआरओ की तकनीक निजी क्षेत्र को देने से संगठन कमजोर नहीं होगा, बल्कि उत्पादन बढ़ेगा. भारत विश्व के शीर्ष पांच रक्षा उत्पादक देशों में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन तकनीक अंतर को पाटने के लिए तेज निर्णय और समन्वय जरूरी है.  

दोनों वैज्ञानिकों के संवाद से साफ है कि मेड इन इंडिया रक्षा क्षमता न सिर्फ सुरक्षा बल्कि निर्यात और वैश्विक प्रभाव का आधार बनेगी. भविष्य की तैयारियां आज से शुरू करनी होंगी.  

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