
विदेशों में छिपकर भारत के खिलाफ अपराध करने पर सरकार का शिकंजा लगातार कसता जा रहा है. इसी कड़ी में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) को एक बड़ी सफलता मिली है. संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से फरार ड्रग तस्कर वीरेंद्र सिंह बसोया को भारत वापस लाया गया.
गृह मंत्री अमित शाह ने इस कार्रवाई को नशे के खिलाफ केंद्र सरकार की 'जीरो टॉलरेंस' नीति की बड़ी उपलब्धि बताया. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार में विदेशों में छिपे ड्रग तस्करों और उनके पूरे नेटवर्क को खत्म करने के लिए लगातार अभियान चलाया जा रहा है. उनका साफ संदेश था कि दुनिया के किसी भी कोने में छिपा अपराधी भारतीय कानून की पहुंच से बाहर नहीं है.

'टॉप-टू-बॉटम' और 'बॉटम-टू-टॉप' रणनीति से मिली सफलता
वीरेंद्र बसोया की गिरफ्तारी और भारत वापसी की कार्रवाई सामान्य नहीं थी. जांच एजेंसियों ने इस मामले में दोहरी रणनीति अपनाई. एक और ड्रग्स नेटवर्क के शीर्ष स्तर पर बैठे मास्टरमाइंड की पहचान की गई, वहीं दूसरी निचले स्तर पर काम कर रहे सहयोगियों, लॉजिस्टिक्स ऑपरेटरों और सप्लाई चेन की कड़ियों को जोड़ते हुए पूरे नेटवर्क का खुलासा किया गया. इसी 'टॉप-टू-बॉटम' और 'बॉटम-टू-टॉप' जांच मॉडल के जरिए बसोया को भारत लाने में कामयाबी मिली.
970 किलो मेफेड्रोन की खेप ने खोली पूरे नेटवर्क की परतें
NCB और जांच एजेंसियों के दस्तावेजों के मुताबिक, वीरेंद्र बसोया का नाम उस बड़े ड्रग सिंडिकेट में सामने आया, जो भारत से बड़ी मात्रा में मेफेड्रोन (Mephedrone) विदेश भेजने की साजिश में शामिल था. पुणे पुलिस ने 21 फरवरी 2024 को दिल्ली में बड़ी कार्रवाई करते हुए दिवेश चरंजीत भूतानी और संदीप कुमार राजपाल बसोया को गिरफ्तार किया था, और 970 किलोग्राम मेफेड्रोन बरामद किया. बता दें कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस खेप की कीमत हजारों करोड़ रुपये आंकी गई है.
इस जांच में सामने आया कि इस अंतरराष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क में केवल तस्कर ही नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक्स कंपनियों का भी कथित तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा था. इसी मामले में डेल्टा लॉजिस्टिक्स के मालिक संदीप हनुमानसिंह यादव और कंपनी के मैनेजर देवेंद्र रामफुल यादव को भी 21 फरवरी 2024 को गिरफ्तार किया गया था. जांच एजेंसियों का दावा है कि ड्रग्स की बड़ी खेप को सामान्य कंसाइनमेंट के रूप में विदेश भेजने की योजना बनाई गई थी ताकि सुरक्षा एजेंसियों की निगाह से बचा जा सके.
जांच में यह भी पता चला है कि गिरफ्तार आरोपी दिवेश चरंजीत भूतानी और संदीप कुमार राजपाल बसोया, वीरेंद्र सिंह बसोया के निर्देश पर काम कर रहे थे, और बसोया इस पूरे को मुख्य रूप से चला रहा था. इसके साथ ही वीरेंद्र बसोया का नाम केवल पुणे पुलिस के मामले तक सीमित नहीं है. दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल द्वारा पकड़ी गई करीब 13 हजार करोड़ रुपये की ड्रग्स के मामले में भी वह वांटेड है.
इस केस में उसका बेटा ऋषभ बसोया भी जांच एजेंसियों के रडार पर है. ऋषभ के खिलाफ इंटरपोल का रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया जा चुका है और उसके विदेश में छिपे होने की जानकारी है. बसोया की गिरफ्तारी के बाद अब एजेंसियों का पूरा ध्यान ऋषभ बसोया की तलाश और उसकी भारत वापसी पर केंद्रित है.
सरकार के मुताबिक पिछले तीन साल में 401 भगोड़े अपराधियों के खिलाफ इंटरपोल के रेड कॉर्नर नोटिस जारी कराए गए. बता दें कि रेड कॉर्नर नोटिस किसी भी देश की पुलिस को संबंधित आरोपी की पहचान, गिरफ्तारी और प्रत्यर्पण प्रक्रिया शुरू करने में मदद करता है. इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपराधियों की आवाजाही सीमित होती है.
सरकार ने हाल ही में भारत पोलनाम का एक प्लेटफॉर्म की शुरुआत की है. इसके जरिए देश की 1,400 से ज्यादा एजेंसियों को इंटरपोल नेटवर्क से जोड़ा गया है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि पहले जहां किसी विदेशी एजेंसी से सूचना प्राप्त करने में कई सप्ताह लग जाते थे, वहीं अब सूचना साझा करने का समय घटकर 3 से 10 दिन रह गया है. जिससे अंतरराष्ट्रीय अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई में तेजी आई है.
वीरेंद्र सिंह बसोया की भारत वापसी को एजेंसियां बड़ी उपलब्धि मान रही हैं, लेकिन जांच यहीं खत्म नहीं होती. उसका बेटा ऋषभ बसोया सहित नेटवर्क से जुड़े अन्य आरोपियों की तलाश जारी है.
एजेंसियों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट को पूरी तरह खत्म करने के लिए विदेशी एजेंसियों के साथ सहयोग और तेज किया जाएगा. वीरेंद्र सिंह बसोया की गिरफ्तारी केवल एक आरोपी की वापसी नहीं, बल्कि भारत की उस बदलती रणनीति का संकेत है जिसमें विदेश भाग जाना अब अपराधियों के लिए सुरक्षित विकल्प नहीं रह गया है.
ड्रग्स, आतंकवाद, आर्थिक अपराध और संगठित अपराध के खिलाफ सरकार की नीति अब केवल देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर सक्रिय है.
36 देशों से 274 भगोड़ों की वापसी, सैकड़ों रेड कॉर्नर नोटिस, हजारों करोड़ की संपत्ति जब्त करने की कार्रवाई और आधुनिक तकनीक आधारित ऑपरेशन यह संकेत देते हैं कि आने वाले समय में विदेशों में छिपे अपराधियों के लिए बच निकलना अब मुश्किल है.