भारत और ईरान के बीच ऐतिहासिक रिश्ता रहा है. आज भी ईरान में बिरयानी भारतीय चावल से पकती है. ईरान सबसे ज्यादा भारत से चावल आयात करता है. ईरान औसतन 8 लाख से 10 लाख मीट्रिक टन बासमती चावल हर साल भारत से लेता है. मूल्य के आधार पर यह व्यापार 9,000 करोड़ रुपये का होता है.
दरअसल, मिडिल ईस्ट में तनाव और सप्लाई बाधित होने के बावजूद भारत ईरान के लिए चावल आपूर्ति का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है. ईरान की कुल चावल खपत का एक बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर करता है, और इस इसमें भारतीय बासमती चावल की भूमिका सबसे अहम है. हालांकि हालिया समुद्री सुरक्षा चुनौतियों, बढ़ते माल भाड़े और भुगतान संबंधी समस्याओं के कारण दोनों देशों के बीच व्यापारिक गति में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है.
पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े (अनुमानित):
2021–22: लगभग 9.9 लाख मीट्रिक टन
2022–23: लगभग 8.6 लाख मीट्रिक टन
2023–24: लगभग 7.5 लाख मीट्रिक टन
2024–25: लगभग 8.0 लाख मीट्रिक टन
क्या ईरान में सबसे ज्यादा बिरयानी भारतीय चावल से बनती है? ईरान में बनने वाले चावल के अधिकांश फूड्स में भारतीय बासमती चावल का ही उपयोग होता है. भारतीय/दक्षिण एशियाई बिरयानी की तुलना में ईरानी व्यंजन तहचीन (Tahchin), चेलो (Chelow), पोलो (Polo) और बिरयानी (Biryani) काफी अलग होते हैं.
भारतीय बासमती का दबदबा
हालांकि ईरान अपने यहां भी चावल का उत्पादन करता है. लेकिन घरेलू उत्पादन कम और काफी महंगा होने के कारण बड़े पैमाने पर दावतों, रेस्टोरेंट और ईरानी रसोई में भारतीय 1121 बासमती चावल का उपयोग किया जाता है. भारतीय बासमती चावल का लंबा दाना, सुगंध और पकने के बाद न चिपकना ईरानी कुजीन के लिए आदर्श माना जाता है.
व्यापारिक आंकड़ों के अनुसार ईरान हर साल लाखों टन चावल आयात करता है, जिसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी भारत की होती है. भारत के अलावा पाकिस्तान, थाईलैंड और वियतनाम भी ईरान को चावल निर्यात करते हैं. लेकिन गुणवत्ता और वरीयता के मामले में भारतीय चावल सबसे आगे है. हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े सैन्य तनाव और लाल सागर और होर्मुज में जहाजों की आवाजाही पर पड़े प्रभाव ने इस व्यापार को प्रभावित किया है.
शिपिंग लागत में उछाल
व्यापारिक मार्गों पर जोखिम बढ़ने के कारण शिपिंग कंपनियों ने वॉर सरचार्ज और बीमा प्रीमियम बढ़ा दिया है, जिससे चावल निर्यात महंगा हो गया है. इसके अलावा ईरान पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और उसकी घरेलू मुद्रा रियाल में उतार-चढ़ाव के कारण भारतीय निर्यातकों को भुगतान प्राप्त करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. बंदरगाहों पर कंटेनर फंसने और शिपमेंट रुकने से भारत के कुल चावल निर्यात पर मामूली दबाव देखने को मिला है.
ईरान में आयात की रफ्तार थोड़ी धीमी होने और वहां की घरेलू आर्थिक चुनौतियों के चलते भारतीय निर्यातक अब दूसरे देशों के बड़े बाजारों को देख रहे हैं, हालिया आंकड़ों के अनुसार सऊदी अरब और इराक जैसे अन्य खाड़ी देश भी भारतीय बासमती के बड़े खरीदार बनकर उभरे हैं. वहीं दूसरी ओर भारतीय निर्यातक अफ्रीका और यूरोपीय देशों में गैर-बासमती और अन्य चावल किस्मों की नई संभावनाएं तलाश रहे हैं.
कमोडिटी एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान के चावल बाजार में भारत की स्थिति निकट भविष्य में भी मजबूत बनी रहेगी. दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों जैसे कि रुपया-रियाल में लेन-देन की व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी व सुगम बनाने की आवश्यकता है.