पहाड़ पर ग्लेशियर, नीचे उफनती नदियां... नेपाल में बार-बार क्यों मच रही तबाही?

नेपाल में तबाही की वजह सिर्फ भारी बारिश नहीं है. तेजी से पिघलते ग्लेशियर, खतरनाक झीलें, खिसकते पहाड़ और उफनती नदियां मिलकर खतरा बढ़ा रहे हैं. आखिर कैसे पहाड़ों पर जमा बर्फ नीचे रहने वालों के लिए मुसीबत बन रही है?

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नेपाल के नुवाकोट जिले के बिदुर में नई जिपलाइन से लोगों को त्रिशुली नदी पार कराते लोग. (File Photo: AP) नेपाल के नुवाकोट जिले के बिदुर में नई जिपलाइन से लोगों को त्रिशुली नदी पार कराते लोग. (File Photo: AP)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 13 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 2:23 PM IST

नेपाल में बार-बार बाढ़, लैंडस्लाइड और अचानक आने वाली बाढ़ से जान-माल का नुकसान हो रहा है. 11 अक्टूबर 2026 को नेपाल के गोरखा जिले में लैंडस्लाइड के कारण बुधी गंडकी नदी का रास्ता रुक गया. इसके बाद पानी का बहाव बढ़ने से कई घरों, पुलों और बिजली से जुड़े ढांचे को नुकसान पहुंचा. शुरुआती रिपोर्टों में पांच लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई. इससे पहले अगस्त 2026 में इसी नदी तंत्र के पास आई बाढ़ में बड़े पैमाने पर तबाही की खबरें आई थीं.

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नेपाल में ऐसी घटनाओं की वजह सिर्फ तेज बारिश नहीं है. यहां ऊंचे पहाड़, तेजी से बदलता मौसम, ग्लेशियरों का पिघलना और नदियों के आसपास बसी आबादी, सभी मिलकर खतरा बढ़ाते हैं. जलवायु परिवर्तन भी इन जोखिमों को बढ़ा रहा है. लेकिन हर बाढ़ का कारण ग्लेशियर पिघलना नहीं होता. कई बार पहाड़ से गिरने वाली चट्टानें नदी का रास्ता रोक देती हैं और कुछ समय बाद पानी अचानक बांध तोड़कर नीचे की ओर बहने लगता है.

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ग्लेशियर तेजी से क्यों पिघल रहे हैं?

नेपाल के पहाड़ हिंदू कुश हिमालय का हिस्सा हैं. इस पूरे इलाके में बड़ी संख्या में ग्लेशियर हैं. ग्लेशियर बर्फ के ऐसे बड़े भंडार होते हैं, जो लंबे समय में धीरे-धीरे नीचे की ओर खिसकते हैं. गर्मी बढ़ने पर इनकी बर्फ पिघलती है और पानी नदियों तक पहुंचता है.

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इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की मार्च 2026 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदू कुश हिमालय के ग्लेशियरों ने 1990 से 2020 के बीच अपने कुल क्षेत्रफल का करीब 12 फीसदी हिस्सा खो दिया. इस दौरान उनके बर्फ के भंडार में भी करीब 9 फीसदी की कमी आई. रिपोर्ट के अनुसार, साल 2000 के बाद ग्लेशियरों से बर्फ के नुकसान की रफ्तार बढ़ी है.

इसका मतलब है कि पहाड़ों पर जमी बर्फ का बड़ा हिस्सा तेजी से कम हो रहा है. ग्लेशियर पिघलने से शुरुआत में नदियों में पानी बढ़ सकता है. लेकिन इसके साथ एक और खतरा पैदा होता है. ग्लेशियर के पास जमा पानी से बड़ी झीलें बन सकती हैं. 

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अगर इन झीलों की प्राकृतिक दीवार टूट जाए, तो बहुत कम समय में भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर बह सकता है. हालांकि, हर ग्लेशियर के पिघलने से बाढ़ नहीं आती. खतरा इस बात पर निर्भर करता है कि झील कितनी बड़ी है, पानी रोकने वाली दीवार कितनी मजबूत है और उसके आसपास की जमीन कितनी स्थिर है.

ग्लेशियरों के पास बनी झीलें कैसे बनती हैं खतरा?

जब ग्लेशियर पिघलता है, तो उसके पास पानी जमा होने लगता है. कई जगह यह पानी मिट्टी, पत्थरों और ग्लेशियर से आए मलबे की प्राकृतिक दीवार के पीछे रुक जाता है. इस तरह बनी झील को ग्लेशियल लेक कहा जाता है. ऐसी झीलों में पानी का स्तर बढ़ने, लैंडस्लाइड से चट्टानें गिरने या बर्फ का बड़ा हिस्सा झील में टूटकर गिरने से पानी में तेज लहर पैदा हो सकती है. इससे झील की दीवार टूट सकती है. फिर पानी और मलबा तेजी से नीचे की ओर बहता है. इस घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है.

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ICIMOD और UNDP की 2020 की रिपोर्ट में नेपाल, चीन के तिब्बत क्षेत्र और भारत के कोशी, गंडकी और करनाली नदी बेसिन में कुल 3,624 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई थी. इनमें से 2,070 झीलें नेपाल में थीं. रिपोर्ट में 47 झीलों को संभावित रूप से खतरनाक बताया गया था. इनमें 21 नेपाल में, 25 चीन के तिब्बत क्षेत्र में और एक भारत में थी. ये आंकड़े 2020 में किए गए आकलन पर आधारित हैं. इन्हें आज की सभी ग्लेशियल झीलों की कुल संख्या नहीं समझना चाहिए. झीलों का आकार और उनकी स्थिति समय के साथ बदल सकती है.

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नेपाल में 1977 से अब तक 26 GLOF घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिनमें से 11 का असर एक से अधिक देशों तक पहुंचा था. इससे पता चलता है कि ग्लेशियरों से जुड़ी बाढ़ नेपाल के लिए नया खतरा नहीं है. लेकिन ग्लेशियरों के तेजी से बदलने से इस खतरे पर लगातार नजर रखना जरूरी हो गया है.

नेपाल में बारिश भी बन रही बड़ी वजह

नेपाल में हर साल जून से सितंबर के बीच मॉनसून सक्रिय रहता है. इस दौरान होने वाली बारिश खेती और नदियों के लिए जरूरी है. लेकिन जब बहुत कम समय में जरूरत से ज्यादा बारिश होती है, तो यही पानी बाढ़ और लैंडस्लाइड की वजह बन सकता है. 

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नेपाल के मौसम विभाग की 8 अक्टूबर 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, 27 से 29 सितंबर 2024 के बीच हुई भारी बारिश ने कई इलाकों में बाढ़ और लैंडस्लाइड का खतरा बढ़ा दिया था. 28 सितंबर को 14 जिलों के 25 मौसम केंद्रों पर 24 घंटे की बारिश का नया रिकॉर्ड दर्ज हुआ. दमन में तीन दिनों के दौरान कुल 517 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई.

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पहाड़ों पर बारिश का पानी तेजी से ढलान से नीचे उतरता है. अगर जमीन पहले से पानी से भरी हो, तो मिट्टी और चट्टानों के खिसकने का खतरा बढ़ जाता है. कई बार भारी बारिश से नदी में पानी अचानक बढ़ जाता है. इसे फ्लैश फ्लड यानी अचानक आने वाली बाढ़ कहते हैं.

जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के पैटर्न में बदलाव भी चिंता का विषय है. हालांकि, किसी एक बाढ़ को सिर्फ जलवायु परिवर्तन का नतीजा बताने के लिए वैज्ञानिक जांच जरूरी है. बारिश की मात्रा, पहाड़ों की स्थिति और नदी के बहाव जैसे कई कारणों को एक साथ देखना पड़ता है.

जब पहाड़ ही रोक देते हैं नदी का रास्ता

नेपाल में बाढ़ का एक खतरनाक कारण लैंडस्लाइड भी है. पहाड़ से बड़ी मात्रा में मिट्टी, पत्थर और चट्टानें गिरने पर नदी का रास्ता कुछ समय के लिए बंद हो सकता है. इससे पानी पीछे जमा होने लगता है. अगर यह प्राकृतिक बांध टूट जाए, तो जमा पानी एक साथ नीचे की ओर बहता है और अचानक बाढ़ आ सकती है.

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11 अक्टूबर 2026 को गोरखा जिले में बुधी गंडकी नदी के आसपास हुई घटना में भी लैंडस्लाइड के कारण नदी का बहाव प्रभावित हुआ. इससे नीचे के इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित जगहों पर जाने की चेतावनी दी गई. यह घटना दिखाती है कि बाढ़ का खतरा सिर्फ ग्लेशियरों से नहीं, बल्कि पहाड़ों के खिसकने से भी पैदा हो सकता है.

26 अगस्त 2026 को नेपाल-चीन सीमा के पास रसुवागढ़ी क्षेत्र में ग्लेशियर से जुड़ी एक घटना के बाद भीषण फ्लैश फ्लड और मलबे का बहाव हुआ था. विश्व बैंक के मुताबिक, इसका असर भोटे कोशी और त्रिशूली नदी तंत्र तक पहुंचा और नुकसान 150 किलोमीटर से ज्यादा लंबे इलाके में देखा गया. नदी के किनारों का कटाव बढ़ा और कई जगह जमीन अस्थिर हो गई.

क्या जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहा है खतरा?

ICIMOD के मुताबिक, हिंदू कुश हिमालय का तापमान औसतन हर दशक में करीब 0.28 डिग्री सेल्सियस बढ़ रहा है. इस क्षेत्र में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और नई झीलों का बनना बाढ़ के खतरे को बढ़ा रहा है. लेकिन जलवायु परिवर्तन ही हर आपदा की अकेली वजह नहीं है. 

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पहाड़ों पर सड़क निर्माण, अस्थिर ढलानों पर इमारतें बनाना, नदियों के बहुत करीब बस्तियां बसाना और कमजोर चेतावनी व्यवस्था भी नुकसान बढ़ा सकती है. जब प्राकृतिक खतरे के बीच लोग और जरूरी ढांचे मौजूद होते हैं, तो घटना का असर बहुत बड़ा हो सकता है.

खतरा कम करने के लिए क्या करना जरूरी है?

वैज्ञानिकों के मुताबिक, ग्लेशियरों और उनसे बनी झीलों की लगातार निगरानी जरूरी है. सैटेलाइट तस्वीरों, मौसम केंद्रों और नदी के जलस्तर से खतरे का पहले पता लगाने में मदद मिल सकती है. संवेदनशील इलाकों में समय पर चेतावनी पहुंचाना और लोगों को सुरक्षित जगहों पर ले जाने की व्यवस्था भी जरूरी है.

नेपाल जैसे पहाड़ी देश में सड़कों, पुलों और बिजली परियोजनाओं का निर्माण करते समय बाढ़ और लैंडस्लाइड के खतरे का आकलन करना चाहिए. जहां जोखिम ज्यादा हो, वहां नई बस्तियां बसाने और जरूरी ढांचे बनाने से पहले वैज्ञानिक जांच जरूरी है. सीमा पार बहने वाली नदियों के मामले में पड़ोसी देशों के बीच मौसम और जलस्तर की जानकारी साझा करना भी अहम है.

नेपाल में बार-बार आ रही तबाही के पीछे ग्लेशियरों का पिघलना, भारी बारिश, लैंडस्लाइड और नदियों का अचानक उफान पर आना जैसे कई कारण हैं. जलवायु परिवर्तन इन खतरों को और गंभीर बना सकता है. ऐसे में नुकसान कम करने का सबसे असरदार तरीका है समय पर चेतावनी, वैज्ञानिक निगरानी और खतरे वाले इलाकों में निर्माण को लेकर सावधानी. रिपोर्टः साक्षी प्रजापति

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