
दिल्ली-मुंबई जैसे भीड़-भाड़ वाले शहरों में सुबह से शाम तक हॉर्न का शोर और भागमभाग वाली जिंदगी... जहां हवा में ऑक्सीजन कम और कार्बन के साथ 'तनाव' ज्यादा हो... लेकिन सोचिए अगर आप किसी ऐसी जगह हों जहां आप सुबह सोकर उठें और खिड़की खोलें तो आपको हॉर्न के शोर की जगह बत्तखों की 'क्वैक-क्वैक' और पानी की धीमी कल-कल सुनाई देती हो. आप ऑफिस जाने के लिए बाहर निकलते हैं, लेकिन गैरेज में कार नहीं, एक छोटी सी इलेक्ट्रिक बोट खड़ी है.
यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि नीदरलैंड के गिएथूर्न इलाके की हकीकत वाली जिंदगी है. यहां की लाइफस्टाइल इतनी कूल है कि इसे नॉर्थ का वेनिस कहा जाता है. आज की दुनिया में दो बड़ी समस्याएं हैं- ग्लोबल वॉर्मिंग और मानसिक तनाव. गिएथूर्न की सुकून वाली जिंदगी इन दोनों का समाधान खुद में समेटे हुए है.
सड़कों का अभाव...
जब हम किसी शहर के बारे में सोचते हैं, तो दिमाग में फ्लाईओवर, ट्रैफिक सिग्नल और प्रदूषण की धुंध आती है. लेकिन गिएथूर्न ने दुनिया को दिखाया है कि बिना सड़कों के भी जिंदगी शानदार हो सकती है. इस पूरे गांव के मुख्य हिस्से में एक भी सड़क नहीं है. यहां एक घर से दूसरे घर तक जाने के लिए या तो आपको नाव का सहारा लेना होगा, या फिर उन 170 से ज्यादा लकड़ी के छोटे-छोटे पुलों पर पैदल चलना होगा जो नहरों के ऊपर बने हैं. यहां के लोग अपनी ग्रॉसरी से लेकर फर्नीचर तक सब कुछ नावों के जरिए ही इधर-उधर ले जाते हैं.

यहां की शांति किसी थेरेपी से कम नहीं. यहां की सरकार ने सड़कों के प्रस्ताव को ठुकरा दिया ताकि उनकी शांति भंग न हो. यहां जो नावें चलती हैं, उन्हें विस्पर बोट्स कहा जाता है. इनमें इलेक्ट्रिक मोटर लगी होती है जो बिल्कुल आवाज नहीं करतीं और न ही धुआं छोड़ती हैं. यहां की हवा इतनी शुद्ध है कि शहर से आने वाले इंसान को अपनी सांसें भारी लगने लगती हैं. गिएथूर्न में सबसे तेज आवाज जो आप सुन सकते हैं, वह शायद किसी पक्षी की चहचहाहट या किसी के चप्पू के पानी से टकराने की होगी.
यहां लोग पैदल चलना, साइकिल और नावों की सवारी करना पसंद करते हैं. कई लोगों ने दफ्तर पहुंचने के लिए अपनी पर्सनल विस्पर बोट रखी हुई है और उन्हें दफ्तर तक पहुंचने में 10 मिनट से ज्यादा समय नहीं लगता क्यों यहां कोई ट्रैफिक जाम ही नहीं होता. लेकिन इमरजेंसी के लिए यहां वॉटर एम्बुलेंस जरूर हैं.
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नाव में बैठकर सुकून
इस जगह ने अपनी जड़ों और प्रकृति को बचाकर रखा, इसीलिए आज जब दुनिया हीटवेव और डिप्रेशन से जूझ रही है, यहां के लोग अपनी नाव में बैठकर सुकून की लहरों पर तैर रहे हैं. यहां के लोगों को AC की जरूरत नहीं पड़ती, वे अपनी नहरों के ठंडे पानी और पेड़ की छांव में बिना किसी मशीन के मस्त रहते हैं. इस जगह की 'जलसड़कें' ही नहीं घर भी खास हैं. हर घर की छत घास-फूस से बनी है, जो 18वीं सदी की याद दिलाती है. हर घर के सामने सुंदर बगीचे हैं जो सीधे नहर के पानी से मिलते हैं.

हालांकि, यहां की जिंदगी में एक विरोधाभास भी है. यहां की आबादी केवल 2800 लोगों की है और वे सुकून से रहना चाहते हैं लेकिन दुनिया के सबसे खूबसूरत इलाके का टैग यहां दुनियाभर से लोगों को खींच लाता है. इस छोटे से जगह हर साल दुनिया भर से 10 लाख से ज्यादा पर्यटक पहुंच जाते हैं. अपने बगीचे में सुकून से कॉफी पी रहे यहां के लोगों को सामने से गुजरती नाव में बैठे 50 पर्यटकों की भीड़ किसी अजूबे से कम नहीं लगती.
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यहां के लोगों ने इस भीड़ के बावजूद अपनी प्राइवेसी को बचा कर रखा है. स्थानीय लोग और प्रशासन दोनों पर्यटकों की भीड़ के बावजूद सड़कें बनाने का विरोध करते हैं. यहां के लोग दुनिया की रैट रेस का हिस्सा नहीं हैं बल्कि सुकून से जिंदगी एंजॉय करने के लिए जाने जाते हैं. लोगों के पास वक्त ही वक्त है पड़ोसी से बात करने के लिए, साथ बैठकर चाय पीने के लिए और प्रकृति को निहारने के लिए. यहीं कारण है कि जहां पूरी दुनिया 5G और सुपरफास्ट ट्रांसपोर्ट के पीछे पागल है, वहीं यह गांव 'स्लो लिविंग' को अपनाकर दुनिया का सबसे खुशहाल कोना बना हुआ है.