आजतक में डिप्टी एडिटर के पद पर काम कर रहे संदीप कुमार सिंह के लिए डिजिटल पत्रकारिता पेशा नहीं जुनून है. बिल्कुल ऐसे जैसे दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने हों. परिवर्तन, सीख और पहचान का एक मजबूत बॉन्ड. बिल्कुल ऐसा जैसे डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का विजनरी सोच से था, जैसे नीरज चोपड़ा का भाले से है, जैसे शाहरुख खान का रोमांटिक सीन से और जैसे सचिन तेंदुलकर का स्ट्रेट ड्राइव से. लंबी पारी इसी बॉन्ड का परिचायक है.
संदीप कुमार सिंह डिजिटल पत्रकारिता के उन चंद लोगों में हैं जो नवीन प्रयोग के लिए जाने जाते हैं. न सिर्फ खबरों और हेडलाइन में नए प्रयोग के लिए बल्कि आने वाले कल पर फोकस कर स्टोरीज लिखने में उन्हें महारत हासिल है. आजतक डिजिटल के लिए चाहे कंटेंट प्लानिंग का मोर्चा हो, चाहे नए आइडियाज का... संदीप कुमार सिंह युद्ध के मैदान में खड़े योद्धा के मोड पर हमेशा रहते हैं, सब हो जाएगा, सब मस्त हो जाएगा टाइप. उनके बगल से गुजरने वाला शख्स एक-दो नया स्टोरी आइडिया लेकर ही वापस लौटता है. खासकर हेडलाइन में नवीनतम प्रयोगों के लिए न्यूजरूम में अधिकांश साथी उनसे लगातार संपर्क में रहते हैं.उनकी लिखी स्टोरीज खासकर फोकस करती हैं- बदलती हुई दुनिया पर, आने वाले कल के लाइफस्टाइल पर, नए तौर-तरीकों से बस रहे शहरों की प्लानिंग पर. इन टॉपिक्स पर उनकी स्टोरी की एक पूरी सीरीज है जो भीड़ से हटकर लेखनी और आने वाले कल को देखने की अद्भुत क्षमता को प्रदर्शित करती हैं.
संदीप कुमार सिंह AI के सोशल फायदे, Gen-Z की बदलती आदतों, बदलती हुई तकनीक और बदलते हुए 'सोशल सॉफ्टवेयर' को एक तरफ जहां अपनी लेखनी के जरिए उठाते हैं. दूसरी ओर किताबों के पन्नों में छिपे भारत के अद्भुत दौर को भी वे किस्सों-कहानियों के जरिए सामने लाते हैं ताकि आपको पता चल सके की ये दिल्ली-मुंबई कैसे ऐसी भागमभाग वाली नहीं थी. कैसे इस दिल्ली में रहने के लिए लोग नहीं थे, कैसे दिल्ली कुछ ही महीने गुलजार रहती थी और पहाड़ों पर एक और दिल्ली बसती थी, कैसे कनॉट प्लेस के पास मकानों की भरमार थी लेकिन रहने वाले लोग नहीं थे. जहां आज विशाल सरकारी इमारतें हैं उन जगहों पर कभी कौओं का डेरा हुआ करता था. कैसे बदले ये शहर और कैसे बदलते चले जाएंगे. ये सारे पहलू आपको संदीप कुमार सिंह की स्टोरी सीरीज में मिल जाएंगी. वे न केवल आजतक डिजिटल की न्यूज टीम को लीड करते हैं, बल्कि पूरी डिजिटल टीम के लिए मानव संसाधन मैनेजमेंट का एक आधार भी हैं, जैसे टीम प्लानिंग, स्पेशल टीम्स के गठन और यहां तक की 'छुट्टियों' की प्लानिंग तक.
डिजिटल पत्रकारिता की पिच पर संदीप साल 2015 से डटे हुए हैं. हालांकि, उनका डेब्यू उससे पहले जागरण.कॉम से हुआ था, फिर उन्होंने अमर उजाला की वेबसाइट के लिए स्पेशल न्यूज प्रोजेक्ट पर काम किया. उसके बाद 8 साल टेलीविजन पत्रकारिता में बिताया देश के सरकारी न्यूज चैनल दूरदर्शन न्यूज के साथ. इस दौरान उन्होंने बुलेटिन एडिटर के रूप में काम किया, बजट टीम के साथ काम किया, टीवी न्यूज के लिए स्क्रिप्ट लिखी, न्यूज पैकेजेज लिखे, टीवी बुलेटिन के लिए हेडलाइंस पर हाथ आजमाए और फिर बदलते वक्त को देखते हुए डिजिटल जर्नलिज्म में शिफ्ट हो गए. तब से आजतक डिजिटल ही उनका ठिकाना है. यहां असिस्टेंट एडिटर से डिप्टी एडिटर तक के सफर में काफी कुछ सीखा. न्यूज का बदलता हुआ ट्रेंड, हेडलाइंस के प्रयोग, बदलती हुई तकनीक और पाठक की उसको लेकर बदलती हुई रुचि सबकुछ उन्हें लगातार खुद में सुधार करने की प्रेरणा देता रहा. बल्कि कहा जाए तो लगातार वे डिजिटल मीडिया की भाषा और ट्रेंड को डिकोड करते रहे.
संदीप कुमार सिंह का ताल्लुक बिहार के सारण की उस भूमि से है जहां से राजेंद्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण और राहुल सांकृत्यायन जैसी हस्तियों का नाम जुड़ता है. जहां की धरती पर स्थित चिरांद में 4000 साल पुरानी पाषाणकालीन संस्कृति के अवशेष मिलते हैं और बताते हैं हां अस्तित्व था यहां भी सभ्यता का, इंसानों का. 12वीं तक की पढ़ाई सारण में करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए संदीप महामना मदन मोहन मालवीय की ज्ञानस्थली बीएचयू यानी बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी चले गए. फिर पत्रकारिता के क्षेत्र में आने का शौक उन्हें दिल्ली लाया और भारतीय जनसंचार संस्थान यानी IIMC ले आया. जो कि पत्रकारिता के क्षेत्र में देश का सर्वोच्च संस्थान है. यहां से रेडियो और टीवी जर्नलिज्म कोर्स करने के बाद तमाम प्रमुख संस्थानों के साथ काम करने का मौका मिला. टीवी के बाद डिजिटल मीडिया में शिफ्ट होकर पत्रकारिता के बदलते ट्रेंड के साथ उन्होंने खुद को ढाला.
खबरों की दुनिया से मौका पाते ही संदीप किताबों की दुनिया में पहुंच जाते हैं- पढ़ने और लिखने के मिशन पर. अध्यात्म, बायोग्राफिज और शेयर मार्केट से जुड़ी किताबों में खास रुचि है. ओशो-बुद्ध-कृष्ण के विचार हों, जापान की जेन जीवनशैली हो या महात्मा गांधी-स्वामी विवेकानंद-कलाम की जीवनी से लेकर फिल नाइट, वॉरेन बफेट, पीटर लिंच और पीटर थील जैसे व्यावसायिक जगत के दिग्गजों की अनगिनत किताबें उनकी मुख्यप्रेरणा स्रोत रही हैं.
फिलवक्त संदीप बदलती जीवनशैली और आधुनिकता से जूझ रहे मानव के सरल जीवन के जटिल हो जाने की थीम पर किताब पर भी काम कर रहे हैं. जो उधेड़बुन में उलझे आधुनिक इंसान की मुश्किलों को हल करने का रास्ता बताने की एक कोशिश होगी. संगीत में पसंद की बात करें तो सदाबहार जगजीत सिंह की गजलकारी और वर्तमान वक्त में सतिंदर सरताज के पंजाबी सूफियाने गानों के लिए दीवानगी कहें तो ज्यादा नहीं होगा. जीवन के तमाम फील्ड्स में एआई के बढ़ते दखल को अपने लिए एक्सपेरिमेंट का दायरा समझकर लगातार इसे सीखने और अपनाने की कवायद भी जारी है. इतिहास में खास रुचि है, इतिहास का छात्र भी रहा हूं तो उसे अलग तरीके से समझने की कोशिश भी जारी है. इस फील्ड में सबसे ज्यादा प्रभावित किया है इजरायली इतिहासकार युवाल नोआ हरारी की लेखनी ने जो हजारों साल पहले के होमो सेपियंस के आधुनिक मानव में बदलने की कहानी को रोचक अंदाज में परोसते हैं. इन सारे अनुभवों का बेहतर इस्तेमाल कैसे डिजिटल पत्रकारिता में होता रहे यही संदीप की रोज की जिंदगी की कोशिश रहती है.