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उस जादुई सड़क की कहानी... जहां लोग खड़े रहते हैं और शहर चलता है!

रोज चलते-चलते इंसान थक जाते हैं, पर सड़कें कभी नहीं रुकतीं. लेकिन दुनिया में एक जगह ऐसी भी है जहां लोग नहीं जादुई रूप में सड़क चलती है. आप सुबह दफ्तर के लिए घर से निकलते हैं, हाथ में कॉफी का मग है और दूसरे हाथ में अखबार. सामने एक ऊंची पहाड़ी की चढ़ाई है, लेकिन आपको एक कदम भी चलने की जरूरत नहीं. आप बस सड़क के एक किनारे पर खड़े होते हैं और रास्ता खुद-ब-खुद आपको मंजिल की ओर ले जाने लगता है. है न हैरंतगेज?

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चलती हुई सड़क का ये सिस्टम अलग-अलग दिशा में चलता है (Photo-ITG)
चलती हुई सड़क का ये सिस्टम अलग-अलग दिशा में चलता है (Photo-ITG)

जरा सोचिए, आप अपने घर के दरवाजे से बाहर निकलते हैं, फिर आपको ऑफिस तक खुद चलकर जाने की जरूरत नहीं है. सड़क बगल से चलती हुई आती है, आप उस पर चढ़ कर खड़े हो जाते हैं और अखबार पढ़ने में या मोबाइल पर आए जरूरी मैसेज को चेक करने में बिजी हो जाते हैं. या दिल चाहे तो आसपास से गुजर रहे घरों, सड़कों या खुले आसमान को देखते चले जाते हैं.

इस दौरान सड़क खुद ब खुद चलती रहती है. बिना एक भी कदम बढ़ाए सीधे आप अपने ऑफिस के दरवाजे तक पहुंच जाते हैं. कोई ट्रैफिक नहीं, कोई हॉर्न नहीं, बस शहर का नजारा और आप.

यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि हांगकांग की रोजमर्रा की जिंदगी की हकीकत है. यहां दुनिया का सबसे लंबा आउटडोर कवर्ड एस्केलेटर सिस्टम है, जिसे स्थानीय लोग 'शहर की लाइफलाइन' कहते हैं. यह एक ऐसी सड़क है जो खुद चलती है.

जब आप इस 800 मीटर लंबे एस्केलेटर पर खड़े होते हैं, तो हांगकांग आपके सामने एक सिनेमाई रील की तरह घूमता है. बाईं ओर पुराने जमाने की छोटी-छोटी दुकानें दिखती हैं, तो दाईं ओर चमकते हुए आधुनिक बार और रेस्टोरेंट. जैसे-जैसे आप ऊपर चढ़ते हैं, हवा ठंडी होने लगती है और नीचे सड़कों पर फंसी टैक्सियों का शोर धीमा पड़ता जाता है. यह चलती हुई सड़क आपको हांगकांग सेंट्रल से उठाकर मिड-लेवल महंगे रिहायशी इलाके की पहाड़ियों तक ले जाता है. रास्ते में आप ऐतिहासिक इमारतों, प्रार्थना घरों और जीवंत बाजारों के ऊपर से गुजरते हैं.

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कैसे आया आइडिया?
दरअसल, हांगकांग दुनिया के सबसे घने बसे शहरों में से एक है. 1980 के दशक तक, यहां की पहाड़ी ढलानों पर बसे लोगों के लिए नीचे शहर तक पहुंचना एक दुःस्वप्न बन गया था. बसें और कारें संकरी गलियों में घंटों फंसी रहती थीं. हांगकांग की सरकार इस बात से परेशान थी कि पहाड़ पर रहने वाले हजारों लोग नीचे शहर कैसे आएं. सड़कें जाम थीं और नई सड़कें बनाने की जगह नहीं थी. तब इंजीनियरों ने सोचा कि क्यों न एक ऐसा रास्ता बनाया जाए जो खुद चले.

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अब शुरू हुई इंजीनियरिंग की असली चुनौती. पहाड़ की खड़ी ढलान पर 20 एस्केलेटर और 3 मूविंग वॉकवे को आपस में जोड़ना एक बड़ी चुनौती थी. इसे इस तरह डिजाइन किया गया कि यह सड़कों के ऊपर एक 'फ्लोटिंग ब्रिज' की तरह काम करे. उस समय इसे बनाने में लगभग 240 मिलियन हांगकांग डॉलर यानी लगभग 30 मिलियन अमेरिकी डॉलर का खर्च आया. शुरुआत में इसकी आलोचना हुई कि यह बहुत महंगा है, लेकिन आज इसे 'मास्टरस्ट्रोक' माना जाता है.

कैसे काम करती है ये 'चलती सड़क'?
चलती हुई सड़क का ये सिस्टम 24 घंटे एक ही दिशा में नहीं चलता. ये बहुत दिलचस्प है. सुबह 6 AM से 10 AM तक यह ऊपर से नीचे की ओर चलता है, ताकि पहाड़ी पर रहने वाले लोग आसानी से अपने ऑफिस पहुंच सकें. फिर दोपहर से रात यानी 10 AM से आधी रात तक यह दिशा बदल लेता है और नीचे से ऊपर की ओर चलने लगता है, ताकि थके-हारे लोग बिना चढ़ाई चढ़े दफ्तरों या बाजारों से अपने घर जा सकें.

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इस पूरे सिस्टम को पार करने में लगभग 20 से 25 मिनट का समय लगता है. अगर आप इसे पैदल चढ़ते, तो शायद आपकी सांसें फूल जातीं. इस 'चलती सड़क' ने हांगकांग की तीन बड़ी समस्याओं का समाधान किया.

1. ट्रैफिक जाम का खात्मा- हजारों लोग जो पहले गाड़ियों का इस्तेमाल करते थे, अब इस एस्केलेटर का उपयोग करते हैं. इससे सड़कों पर कारों का दबाव काफी कम हो गया.

2. समय की बचत- पहाड़ चढ़ने में लगने वाला समय आधा हो गया.

3. आर्थिक विकास- इस एस्केलेटर के बनने से इसके आस-पास के इलाकों की कायापलट हो गई. यहां दुनिया भर के रेस्टोरेंट और दुकानें खुल गईं, जिससे यह एक बड़ा पर्यटन केंद्र बन गया.

रोज 80 हजार से अधिक लोग इस चलती हुई सड़क का इस्तेमाल करते हैं. यह सड़क जमीन से लगभग 135 मीटर यानी 443 फीट की ऊंचाई तक जाती है. इस कारण कई चुनौतियां भी हैं. जैसे सबसे बड़ी समस्या तब होती है जब इसका कोई हिस्सा मेंटेनेंस के लिए बंद किया जाता है. उस दिन हजारों लोगों को हजारों सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं. यह एक ऐसा मॉडल है जिसे भारत के पहाड़ी शहरों में लागू किया जा सकता है.

हालांकि, दुनिया में इस तरह के कई प्रयोग फेल भी हुए हैं. सबसे चर्चित उदाहरण पेरिस का 'ट्रोटॉयर रौलांट रैपिड' है, जिसे 2002 में मोंटपार्नास-बिएनवेन्यू मेट्रो स्टेशन पर लगाया गया था. यह एक 'हाई-स्पीड' मूविंग वॉकवे था जिसकी रफ्तार 12 किमी/घंटा तक पहुंचती थी. प्रयोग इसलिए फेल हुआ क्योंकि लोग इसकी तेज रफ्तार और चढ़ने-उतरने के दौरान संतुलन नहीं बना पा रहे थे, जिससे कई लोग गिरकर चोटिल हो गए और अंततः साल 2009 में इसे सामान्य गति पर सेट कर दिया गया. इसके अलावा, टोक्यो के कुछ स्टेशनों और टोरंटो के पियर्सन एयरपोर्ट पर भी एक्सप्रेस वॉकवेज के प्रयोग किए गए, जो तकनीकी रूप से तो सफल रहे लेकिन रखरखाव के भारी खर्च और यात्रियों की सुरक्षा चिंताओं के कारण बहुत सीमित रह गए.

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लेकिन हांगकांग का ये सफल मॉडल वाली चलती सड़क हमें सिखाती है कि आधुनिकता का मतलब सिर्फ बड़ी गाड़ियां या चौड़े हाईवे नहीं हैं. असली विकास वो है जो एक आम आदमी का पसीना बचाए और उसे बिना किसी शोर-शराबे के उसकी मंजिल तक पहुंचा दे.

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