
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज स्थित दशाश्वमेध घाट पर सावन के महीने में दिव्यांग कमलेश कुमार और दृष्टिहीन राजेश कुमार ने विधि-विधान से पूजा-पाठ और गंगा स्नान के बाद कांवड़ में जल भरकर बनारस के शिवालय के लिए यात्रा शुरू की है. चलने में असमर्थ कमलेश अपनी ट्राई साइकिल से और देख न पाने वाले राजेश पैदल यात्रा कर रहे हैं. कमलेश की कामना है कि भगवान शिव उन्हें अगले जन्म में दिव्यांगता का कष्ट न दें, वहीं राजेश मन की आंखों से महादेव के दर्शन कर सुख-शांति की प्रार्थना कर रहे हैं.
ट्राई साइकिल से कांवड़ यात्रा पर निकले कमलेश
बचपन से दिव्यांग कमलेश कुमार पिछले कई सालों से सावन में कांवड़ यात्रा कर रहे हैं. चलने में असमर्थ होने के बावजूद उनके हौसले में कोई कमी नहीं है. दशाश्वमेध घाट पर पूजा-अर्चना और गंगाजल भरने के बाद वे अपनी ट्राई साइकिल से बनारस के लिए निकल पड़े. रास्ते भर उनके मुंह से 'बोल बम' और 'ॐ नमः शिवाय' के जयकारे गूंज रहे हैं. कमलेश का मानना है कि यदि वे दिव्यांग न होते तो जीवन में और बेहतर काम कर पाते, लेकिन वे हिम्मत हारे बिना निरंतर संघर्ष कर रहे हैं.

दृष्टिहीन राजेश मन की आंखों से कर रहे शिव दर्शन
दशाश्वमेध घाट से ही राजेश कुमार भी कांवड़ लेकर बनारस के लिए पैदल रवाना हुए हैं. आंखों से देख न पाने वाले राजेश का कहना है कि वे मन की आंखों से भगवान शिव को देखते हैं. वे पिछले 5 सालों से कांवड़ उठा रहे हैं और उनका मानना है कि शिव की शक्ति के बल पर ही वे पूरी आस्था के साथ बनारस के शिवालय पहुंचकर जलाभिषेक करते हैं. वे भगवान शिव से अपने जीवन में सुख-शांति और सब कुछ सकुशल रहने की कामना करते हैं.

अद्वितीय आस्था और हौसले का संदेश
कमलेश कुमार अपनी कांवड़ यात्रा के जरिए परिवार की सुख-समृद्धि और सभी के अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना कर रहे हैं. उनकी सबसे बड़ी इच्छा यही है कि जो दिव्यांगता का दर्द उन्होंने इस जन्म में झेला है, वह अगले जन्म में न मिले. दोनों श्रद्धालुओं की यह अटूट आस्था समाज को यह संदेश देती है कि कोई भी शारीरिक चुनौती इंसान के बुलंद हौसले, अटूट विश्वास और भक्ति के रास्ते में रोड़ा नहीं बन सकती है.