स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बाद गल्फ का दूसरा ट्रेड रूट बाब अल मंदेब भी लगभग बंद हो चुका है. बाब अल मंदेब को हूती विद्रोहियों ने ब्लॉक कर रखा है. हूती विद्रोही यहां से गुजरने वाले अमेरिकी समेत किसी भी जहाज पर हमला कर रहे हैं. लेकिन चीन ने यहां भी अपना जुगाड़ शुरू कर दिया है. चीन ने गल्फ में अमेरिका और सऊदी अरब के दुश्मन हूती विद्रोहियों के साथ डील शुरू कर दी है.
चीन की इस पहल का मकसद अपने तेल टैंकरों को लाल सागर के रणनीतिक जलमार्ग से सुरक्षित गुजरने की अनुमति दिलाना है. इसके लिए चीन ने यमन के ईरान समर्थित हूती समूह के साथ गुप्त वार्ता शुरू कर दी है.
यह बातचीत चीन की बढ़ती कूटनीतिक चतुराई और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को चुनौती देने वाली रणनीति को उजागर करती है.
एक सीनियर ईरानी अधिकारी समेत कई सूत्रों के अनुसार बीजिंग ने सीधे तौर पर हूतियों से अपने टैंकरों के सुरक्षित गुज़रने का वादा करने को कहा है.
चीन उन शुरुआती देशों में से एक था जिसने बाब अल-मंदेब से गुज़रने के बारे में हूतियों से सीधे संपर्क किया था. बाब अल-मंदेब लाल सागर के दक्षिणी छोर पर स्थित एक स्ट्रेट जिसके पूर्वी किनारे पर यमन है. बाब अल मंदेब का अर्थ आंसुओं का दरवाजा होता है. मामले की संवेदनशीलता के कारण इन सूत्रों ने अपनी पहचान ज़ाहिर नहीं करने का फैसला किया.
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चीन के विदेश मंत्रालय ने हूतियों के साथ बातचीत की पुष्टि किए बिना कहा है कि वह लाल सागर में हो रही गतिविधियों पर बारीकी से नज़र रख रहा है.
Kpler के एनालिसिस और LSEG और मैरिन ट्रैफिक के शिप-ट्रैकिंग डेटा के अनुसार 20 जुलाई को हूतियों द्वारा पाबंदियों की घोषणा के बाद से कम से कम चार टैंकरों ने सऊदी बंदरगाहों से चीन के लिए कच्चा तेल लोड किया है और बाब अल-मंदेब से गुज़रे हैं.
एक सूत्र का कहना है कि चीनी अधिकारियों ने हर जहाज के लिए हूतियों से अलग-अलग मंज़ूरी ली है.
हूतियों ने अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों को ईमेल के ज़रिए सूचित किया है कि अगर वे सऊदी अरब के बंदरगाहों पर कार्गो लोड या अनलोड करते हैं तो जहाज़ों पर हमला किया जा सकता है.
चीन के व्यापार से जुड़े दो अलग-अलग सूत्रों का कहना है कि सुरक्षा चिंताओं के कारण बाब अल-मंदेब से लाल सागर में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे कुछ टैंकरों ने अपना रास्ता बदल लिया है.
चीन के लिए क्यों अहम है बाब अल मंदेब
बाब अल मंदेब चीन के लिए बेहद रणनीतिक और आर्थिक महत्व रखती है. यूरोप, मध्य पूर्व और अफ्रीका के साथ होने वाला चीन के समुद्री व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है, यह रास्ता आगे स्वेज़ नहर से जुड़ता है, जिससे जहाज सीधे भूमध्य सागर और यूरोप पहुंचते हैं.
चीन के तेल और गैस आयात का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा इसी मार्ग से आता है. यदि बाब अल-मंदेब में संघर्ष, समुद्री हमले या नाकेबंदी होती है, तो चीनी जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी सिरे केप ऑफ गुड होप का लंबा चक्कर लगाना पड़ सकता है, जिससे समय और परिवहन लागत दोनों बढ़ जाते हैं. यही कारण है कि चीन ने अफ्रीकी देश जिबूती में अपना पहला विदेशी सैन्य अड्डा स्थापित किया, ताकि इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग और अपने व्यापारिक हितों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके.
हमले के कारण चीनी कंपनियां रास्ता बदलने पर मजबूर
चीन विश्व का सबसे बड़ा तेल आयातक है और मध्य पूर्व से उसका बड़ा हिस्सा लाल सागर मार्ग से आता है. विश्लेषकों के अनुसार हूती हमलों के कारण कई चीनी कंपनियां मार्ग बदल चुकी हैं, जिससे लागत बढ़ी है. लाल सागर में चीनी टैंकरों की सुरक्षा सुनिश्चित करके बीजिंग न केवल अपने ऊर्जा आयात को सुरक्षित रखना चाहता है, बल्कि क्षेत्र में अपना कूटनीतिक प्रभाव भी बढ़ाना चाहता है. हूती नेताओं के साथ बातचीत में चीन ने "निष्पक्षता" और "क्षेत्रीय स्थिरता" की वकालत की है.
हूती विद्रोहियों के साथ चीन की कथित "सेटिंग" चीन की "ड्रैगन डिप्लोमेसी" का हिस्सा है. चीन गल्फ क्षेत्र में अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी माना जाता है. यहां अमेरिका इजरायल और सऊदी अरब जैसे सहयोगियों के साथ खड़ा है, चीन ईरान और उसके प्रॉक्सी गुटों के साथ रिश्ते मजबूत कर रहा है.
हूती विद्रोहियों को ईरान के इशारे पर ही काम करने वाला माना जाता है. चीन ने ईरान के साथ भी संतुलित रिश्ते रखे हैं. इसी का फायदा उठाकर चीन हूती विद्रोहियों को प्रभावित करना चाहता है.
वाशिंगटन हूती हमलों को ईरान समर्थित "एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस" का हिस्सा मानता है, जबकि बीजिंग खुद को "तटस्थ मध्यस्थ" के रूप में पेश कर रहा है. चीन ने पहले भी हूती हमलों की निंदा से परहेज किया था, जबकि अमेरिकी जहाजों की सुरक्षा के लिए गठबंधन में शामिल होने से इनकार कर दिया.
चीन ने कभी सार्वजनिक रूप से हूतियों को सैन्य या राजनीतिक समर्थन देने की घोषणा नहीं की है. बीजिंग आधिकारिक तौर पर लाल सागर में नौवहन की सुरक्षा, तनाव कम करने और बातचीत के जरिए समाधान की बात करता है और किसी पक्ष का खुला समर्थन करने से बचता है.
चीन-हूती संबंध वैचारिक या सैन्य साझेदारी से अधिक व्यापारिक और रणनीतिक हितों पर आधारित हैं. हूतियों के बेस जिबूती में चीन का सैन्य अड्डा इसका सबूत है. चीन की प्राथमिकता अपने ऊर्जा आयात और समुद्री व्यापार मार्गों को सुरक्षित रखना है, इसलिए वह हूतियों के साथ संवाद बनाए रखता है, लेकिन खुलकर उनके पक्ष में खड़ा होने से बचता है. हालांकि इस नए घटनाक्रम पर अमेरिका की प्रतिक्रिया क्या होती ये देखना अहम होगा.