पहले पाकिस्तान का राष्ट्रगान गाते थे, अब 'जन गण मन' गाते हैं. पहले पाकिस्तान के झंडे को सलाम करते थे, अब तिरंगे के सामने सिर झुकाते हैं. पहले 14 अगस्त को आजादी का दिन मानते थे, अब 15 अगस्त का इंतजार रहता है. पाकिस्तान में पैदा हुए, वहीं बड़े हुए, वहीं जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा गुजारा. लेकिन, जब भारत आए तो सिर्फ सरहद पार नहीं की, बल्कि जैसे अपनी जिंदगी का एक दूसरा अध्याय शुरू किया. अब मुल्क वो नहीं है, पहचान बदल गई... और इसी के साथ बदल गया 'आजादी' का मतलब भी. ये कहानी है, उन लोगों को जो कई साल पाकिस्तान से रहने के बाद पाकिस्तान आए और अब भारतीय हो गए हैं.
पाकिस्तान में रहने के दौरान 14 अगस्त उनके कैलेंडर में आजादी का दिन था, लेकिन कई लोगों के लिए वह दिन सिर्फ एक तारीख और एक रस्म बनकर रह गया था. भारत आने के बाद पहली बार उन्हें लगा कि आजादी सिर्फ झंडा फहराने या राष्ट्रगान गाने का नाम नहीं है.
'आजादी तो यहां है...'
पाकिस्तान से भारत आए हिंदुओं से जब पूछा गया कि आखिर उनके लिए आजादी क्या है, तो जवाब सिर्फ राजनीतिक नहीं था. उनके जवाबों में डर से बाहर निकलने, अपनी पहचान के साथ जीने और अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित देखने की इच्छा थी. करीब 28 साल पाकिस्तान में रहने के बाद 2014 में भारत आए जान बहादुर सिंह ने बताया था कि भारत आने के बाद उन्हें पहली बार लगा कि वे सच में आजाद हैं. पाकिस्तान में उन्हें जिंदगी घुटन भरी लगती थी, जबकि भारत आने के बाद उन्हें खुलकर सांस लेने का अहसास हुआ.
लेकिन आजादी का यह एहसास सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है. वहां से आए सोभराज बताते हैं कि आजादी तो यहां है. वहां 14 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाने की मजबूरी थी और मजबूरी में ही वहां का राष्ट्रगान गाते थे, वहां के झंडे के सामने सिर झुकाते थे. लेकिन, उस वक्त दिल से तो 15 अगस्त को ही आजादी का दिन मानते थे. भारत के लिए प्रेम था. वहां के लिए मजबूरी सब किया करते थे, वहां की सरकार को दिखाने के लिए ये सब करते थे. लेकिन, जब 2014 में भारत आए तो पता चला आखिर आजादी है क्या. उस साल जब 15 अगस्त आया तो लगा कि असली आजादी तो अब मिली है. हमारे लिए तो यहां ही आजादी है.
वहां क्या होता था?
उन्होंने बताया कि 14 अगस्त को वे भी आजादी का दिन मनाते हैं. झंडा लगते हैं, कार्यक्रम होते हैं, स्कूलों में प्रोग्राम होते हैं, नेता लोग आते हैं और भाषण देते हैं. सब भारत की तरह ही है. लेकिन, वहां रह रहे हिंदू तो वहां के लोगों को दिखाने के लिए ये सब करते थे. जिस आजादी को वे बचपन से किताबों में पढ़ते थे, उसे उन्होंने भारत आने के बाद अपने जीवन में महसूस किया. उन्होंने बताया कि पहले आजादी एक तारीख थी, अब एक अहसास है.