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'खुद को कानून से ऊपर समझती है यूपी पुलिस', इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाई फटकार

इलाहाबाद HC ने गौतमबुद्ध नगर में एक व्यक्ति को हिरासत में लेने और गिरफ्तार करने की प्रक्रिया को गलत ठहराया. कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने FIR दर्ज होने से पहले ही व्यक्ति को हिरासत में ले लिया था. इसके अलावा, दस्तावेजों में तारीखों को लेकर भी कई गड़बड़ियां थीं. कोर्ट ने आदेश दिया कि अगर व्यक्ति किसी दूसरे मामले में आरोपी नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 3 साल पुराने मामले में यूपी पुलिस को फटकार लगाई है. (File Photo: ITG)
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 3 साल पुराने मामले में यूपी पुलिस को फटकार लगाई है. (File Photo: ITG)

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्रवाई पर सख्त नाराजगी जताई है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यूपी पुलिस खुद को कानून से ऊपर समझती है. दरअसल, गौतमबुद्ध नगर के एक मामले में कोर्ट ने पाया कि FIR दर्ज होने से पहले ही एक व्यक्ति को हिरासत में ले लिया गया था. अदालत ने हिरासत और गिरफ्तारी की प्रक्रिया को अवैध करार दिया. साथ ही आदेश दिया कि व्यक्ति किसी दूसरे मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए.

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जज अचल सचदेव की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि यह मामला राज्य पुलिस की बेहद चिंताजनक स्थिति को दिखाता है. कोर्ट के मुताबिक, कई मामलों में कानूनी प्रक्रिया की जरूरी शर्तों का पालन नहीं किया जाता और दस्तावेजों में ऐसी गलतियां होती हैं, जो हिरासत की वैधता पर सवाल खड़े करती हैं.

FIR से पहले ही हिरासत में लिया गया

दरअसल, यह मामला 23 अगस्त 2026 को गौतमबुद्ध नगर में दो गुटों के बीच हुई हिंसक झड़प से जुड़ा है. याचिकाकर्ता दीपक और चार अन्य लोगों को शाम 7:34 बजे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 126, 135 और 170 के तहत हिरासत में लिया गया था. इसके बाद रात 9:39 बजे लिखित शिकायत के आधार पर FIR दर्ज की गई. दीपक को अगले दिन यानी 24 अगस्त को दोपहर 2:57 बजे इस FIR में औपचारिक रूप से गिरफ्तार दिखाया गया.

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हाईकोर्ट ने घटनाक्रम के आधार पर कहा कि एफआईआर दर्ज होने से पहले ही पुलिस दीपक को हिरासत में ले चुकी थी. बाद में उसी हिरासत के दौरान उनकी औपचारिक गिरफ्तारी दिखाई गई. अदालत ने यह भी पाया कि पुलिस ने निवारक कार्रवाई के लिए तय कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया.
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कोर्ट ने जांच अधिकारी की ओर से तैयार दस्तावेजों में तारीखों की विसंगतियां भी पाईं. एक दस्तावेज पर 23 अगस्त की तारीख थी, जबकि उसमें गिरफ्तारी की तारीख 24 अगस्त लिखी गई थी. व्यक्तिगत तलाशी और जब्ती से जुड़े दस्तावेजों में भी दो जगह अधिकारी के हस्ताक्षर के साथ 23 अगस्त की तारीख दर्ज थी.

जांच अधिकारी ने इन विसंगतियों को तारीख लिखने में हुई गलतियां बताया. लेकिन हाईकोर्ट इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुआ. अदालत ने कहा कि दस्तावेजों में पांच जगहों पर तारीखों की गड़बड़ी थी. न तो इन गलतियों को ठीक किया गया और न ही किसी संशोधन को प्रमाणित किया गया.

खंडपीठ ने निवारक कार्रवाई से जुड़े दूसरे दस्तावेजों में भी कमियां पाईं. बंधपत्र में राशि का कॉलम खाली था. उस पर यह बताने के लिए जरूरी साइन, तारीख या समय भी दर्ज नहीं था कि सहायक पुलिस आयुक्त ने बंधपत्र स्वीकार किया था या उसे खारिज किया था.

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इसके अलावा, BNSS की धारा 130 के तहत 24 अगस्त को जारी दिखाए गए नोटिस पर सहायक पुलिस आयुक्त-द्वितीय कमलेश कांत के साइन थे. जबकि नोटिस सहायक पुलिस आयुक्त-प्रथम के नाम से जारी बताया गया था. हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया इन परिस्थितियों से मजबूत आशंका पैदा होती है कि संबंधित दस्तावेज बाद में भरे गए थे.

'तनावपूर्ण हालात कानून तोड़ने की छूट नहीं देते'

राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि घटना के समय तनावपूर्ण स्थिति थी और मौके पर भीड़ मौजूद थी. सरकार के मुताबिक, पुलिस ने हालात को और बिगड़ने से रोकने के लिए सद्भावना में कार्रवाई की थी.

हालांकि, हाईकोर्ट ने साफ कहा कि तनावपूर्ण हालात पुलिस को कानून का पालन करने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करते. गिरफ्तारी और हिरासत की प्रक्रिया का पालन करना पुलिस का दायित्व है. अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने से पहले कानून में तय सुरक्षा उपाय संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत मिले मौलिक संरक्षण से जुड़े हैं. पुलिस इन प्रावधानों की अनदेखी नहीं कर सकती.

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खंडपीठ ने नागरिक स्वतंत्रता के प्रति पुलिस के रवैये पर भी चिंता जताई. अदालत के मुताबिक, मामले के तथ्य बताते हैं कि पुलिस आम नागरिकों की स्वतंत्रता के प्रति पर्याप्त संवेदनशील नहीं है. कई बार यह विचार किए बिना गिरफ्तारी की ओर बढ़ा जाता है कि क्या बिना हिरासत में लिए भी मामले में आगे की कार्रवाई संभव है.

हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है. अदालत ने हिरासत को अवैध करार देते हुए आदेश दिया कि दीपक को किसी दूसरे मामले में जरूरत न होने पर तत्काल रिहा किया जाए.

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