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'तारीख पर तारीख' नहीं, चाहिए समय पर न्याय... 25 साल पुराने केस पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की फटकार

25 साल से लंबित अपहरण केस की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्याय में देरी पर सख्त टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि सिर्फ 'तारीख पे तारीख' देना इंसाफ नहीं हो सकता.

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25 साल पुराने केस में सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने जताई सख्त नाराजगी. (File Photo)
25 साल पुराने केस में सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने जताई सख्त नाराजगी. (File Photo)

करीब 25 साल से अदालत में एक अपहरण का केस चल रहा है. इसकी सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने न्याय व्यवस्था पर सख्त टिप्पणी की है. कोर्ट ने साफ कहा कि किसी मामले में सालों तक सिर्फ 'तारीख पर तारीख मिलना इंसाफ नहीं है'. साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि हर व्यक्ति को समय पर सुनवाई और न्याय मिलने का पूरा अधिकार है.

दरअसल, यह पूरा मामला साल 2001 का है. बहराइच के पयागपुर थाने में एक अपहरण का केस दर्ज हुआ था. इस केस में अजय कुमार उर्फ चिंगी और राम चंद्र के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था. आगे चलकर दोनों आरोपियों ने अपनी अग्रिम जमानत के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच का दरवाजा खटखटाया. सुनवाई के दौरान अदालत के सामने एक बेहद चौंकाने वाली बात आई. जिस महिला को इस मामले में पीड़िता बताया गया था, वह अपनी मर्जी से अजय कुमार के साथ गई थी.

महिला ने बाद में आरोपी अजय कुमार से शादी कर ले ली थी. आज के समय में दोनों पति-पत्नी के रूप में एक साथ रह रहे हैं. उनका परिवार पूरी तरह सेटल है. अदालत में सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि राज्य सरकार इन तमाम ठोस तथ्यों का कोई मजबूत जवाब पेश नहीं कर सकी. इसके बावजूद निचली अदालत में यह मामला दो दशकों से अधिक समय से लगातार लंबित पड़ा रहा.

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कोर्ट बोला- सिर्फ तारीख देना न्याय नहीं

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने पाया कि 25 साल बीतने के बाद भी ट्रायल में कोई खास प्रगति नहीं हुई थी. इस पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी आपराधिक मामले को इतने लंबे समय तक लटकाए रखना सही नहीं है. अगर किसी केस में सालों तक सिर्फ अगली तारीख मिलती रहे, तो उसे इंसाफ नहीं कहा जा सकता. कोर्ट ने कहा कि मुकदमों को बिना किसी वजह के लटकाना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले त्वरित और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के खिलाफ है.

अपने आदेश में हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने फिल्म 'दामिनी' के मशहूर डायलॉग 'तारीख पे तारीख' का भी जिक्र किया. इस पर अदालत ने कहा कि यह डायलॉग फिल्मों तक ही ठीक है. यह हमारी असली न्याय व्यवस्था की पहचान नहीं बन सकता. लोगों को हर हाल में समय पर सुनवाई मिलनी चाहिए. अदालतों का काम मुकदमों का फैसला बिना किसी वजह के करना है. वहीं दूसरी तरफ, न्याय में अनावश्यक देरी सीधे तौर पर लोगों के अधिकारों को प्रभावित करती है.

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत देते समय जो टिप्पणियां की गई हैं, उनका असर मुकदमे की सुनवाई पर नहीं पड़ना चाहिए. ट्रायल कोर्ट मामले में मौजूद सबूतों और गवाहों के आधार पर स्वतंत्र रूप से फैसला करेगा. साथ ही हाईकोर्ट ने एक बार फिर साफ किया कि न्याय तभी पूरा माना जाएगा, जब लोगों को बिना बेवजह देरी के समय पर फैसला मिले, सिर्फ 'तारीख पे तारीख' नहीं.

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