प्रशांत महासागर के गर्म होने के साथ समुद्र के अंदर पानी की 'उम्र' भी बदल रही है. अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन डिएगो के वैज्ञानिकों ने एक मॉडल की मदद से अगले 100 साल में होने वाले बदलावों को समझने की कोशिश की है. रिसर्च में पता चला कि प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों में नया पानी पुराना हो सकता है, जबकि कुछ हिस्सों में पुराना पानी नया हो सकता है. इसकी बड़ी वजह समुद्र के गर्म होने के बाद पानी की अलग-अलग परतों के बीच हलचल कम होना है.
यह बदलाव खास तौर पर समुद्र की 200 से 1,000 मीटर गहराई वाली परत में देखा गया है. इसे थर्मोक्लाइन कहते हैं. यह समुद्र की गर्म ऊपरी परत और नीचे मौजूद ठंडे पानी के बीच की परत होती है. समुद्र गर्म होने पर ये परतें पहले की तरह आसानी से आपस में नहीं मिलतीं. इससे पानी का ऊपर-नीचे जाना धीमा हो जाता है. अलग-अलग जगहों पर पानी की उम्र और ऑक्सीजन में बदलाव आने लगता है.
यह भी पढ़ें: कैंसर का खौफ बढ़ा रहे ये 5 इंफेक्शन! 2024 में 23 लाख नए केस से जुड़ा कनेक्शन, जानें कितना बड़ा है खतरा
पानी की 'उम्र' का मतलब क्या है?
यहां पानी की उम्र का मतलब पानी के कितने साल पुराने होने से नहीं है. वैज्ञानिक यह देखते हैं कि पानी कितने समय से समुद्र की सतह पर नहीं आया है. जब पानी समुद्र की सतह पर होता है तो उसे हवा से ऑक्सीजन मिलती है. इसके बाद जब पानी नीचे जाता है तो समुद्री जीव और बैक्टीरिया उस ऑक्सीजन का इस्तेमाल करते हैं. इसलिए जो पानी लंबे समय तक समुद्र के अंदर रहता है, उसमें ऑक्सीजन कम होती जाती है और उसे 'पुराना पानी' कहा जाता है.
वहीं जो पानी हाल ही में सतह से नीचे गया है, वह 'नया पानी' माना जाता है और उसमें आमतौर पर ज्यादा ऑक्सीजन होती है. गर्म पानी ठंडे पानी से हल्का होता है. इसलिए समुद्र में ऊपर गर्म पानी और नीचे ठंडे पानी की अलग-अलग परतें रहती हैं. जब समुद्र और गर्म होता है तो इन दोनों परतों के बीच अंतर बढ़ जाता है.

इससे ऊपर का पानी नीचे और नीचे का पानी ऊपर कम आता-जाता है. यानी समुद्र के अंदर पानी की आवाजाही धीमी होने लगती है. वैज्ञानिकों ने इसी बदलाव को अपने मॉडल में देखा. उन्हें पता चला कि इसका असर प्रशांत महासागर के हर हिस्से में एक जैसा नहीं होगा.
उत्तरी प्रशांत में नया पानी हो सकता है पुराना
उत्तरी प्रशांत के एक हिस्से में ऊपर से आने वाला नया पानी थर्मोक्लाइन तक पहुंचता है. लेकिन गर्मी बढ़ने पर यह पानी नीचे कम पहुंच सकता है. ऐसा होने पर वहां का पानी ज्यादा समय तक समुद्र के अंदर रह सकता है. यानी नया पानी धीरे-धीरे 'पुराना' हो सकता है.
यह भी पढ़ें: समुद्र बढ़ा तो घुसपैठिए जीव करेंगे नए इलाकों पर कब्जा, 122 समुद्री प्रजातियों पर चौंकाने वाली स्टडी
इसके साथ वहां ऑक्सीजन भी कम हो सकती है. रिसर्च के मुताबिक इसका असर समुद्री जीवों पर पड़ सकता है, क्योंकि उन्हें जिंदा रहने के लिए पानी में मौजूद ऑक्सीजन की जरूरत होती है. प्रशांत महासागर के ट्रॉपिकल हिस्से में इसका असर उलटा हो सकता है. यहां नीचे से ऊपर आने वाला पानी पहले से पुराना और कम ऑक्सीजन वाला होता है.
गर्मी बढ़ने पर नीचे से ऊपर आने वाली पानी की आवाजाही धीमी हो सकती है. इससे पुराना पानी ऊपर कम पहुंचेगा. नतीजा यह होगा कि ऊपर की परत में पानी की औसत उम्र कम हो सकती है. यानी प्रशांत महासागर के एक हिस्से में पानी पुराना हो सकता है, जबकि दूसरे हिस्से में पुराना पानी कम होकर पानी तुलनात्मक रूप से नया हो सकता है.

अंटार्कटिका की गर्मी का भी असर
वैज्ञानिकों ने इस बदलाव में दक्षिणी महासागर की भूमिका भी बताई है. दक्षिणी महासागर अंटार्कटिका के आसपास का समुद्री इलाका है. इस इलाके में बढ़ती गर्मी समुद्र की बड़ी पानी की आवाजाही को बदल सकती है. इसका असर सीधे प्रशांत महासागर तक पहुंच सकता है. इसी वजह से वैज्ञानिक इसे समुद्र के एक हिस्से की गर्मी का दूसरे हिस्से पर दूर से असर मान रहे हैं.
गर्म पानी अपने अंदर कम ऑक्सीजन रख सकता है. इसके अलावा पानी की आवाजाही धीमी होने से भी समुद्र की गहराई तक ऑक्सीजन पहुंचने का तरीका बदल सकता है. हालांकि इस रिसर्च में समुद्री जीवों पर पड़ने वाले पूरे असर का अध्ययन नहीं किया गया है.
यह भी पढ़ें: कावेरी इंजन का रूस में ट्रायल सफल, अमेरिका को लगा 48.5 किलोन्यूटन थ्रस्ट का झटका!
वैज्ञानिकों का कहना है कि मौजूदा कम-ऑक्सीजन वाले इलाकों में अगले 100 साल में ऑक्सीजन की कमी बहुत ज्यादा बढ़ने की उम्मीद नहीं है. लेकिन इन इलाकों में ऑक्सीजन पहले से कम है. वहीं उत्तरी प्रशांत में पानी के ज्यादा पुराना होने और ऑक्सीजन में बदलाव का असर समुद्री जीवों के लिए ज्यादा अहम हो सकता है.
आगे और रिसर्च की जरूरत
वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन में एक सरल समुद्री मॉडल की मदद से करीब 100 साल आगे के बदलावों को समझा है. आगे की रिसर्च में समुद्री हवाओं और उनके बदलते पैटर्न को भी शामिल करना होगा. इस रिसर्च से इतना साफ है कि जलवायु परिवर्तन का असर पूरे प्रशांत महासागर पर एक जैसा नहीं होगा. समुद्र के अलग-अलग हिस्सों में पानी की आवाजाही, उसकी 'उम्र' और ऑक्सीजन का स्तर अलग तरीके से बदल सकता है. इससे आने वाले समय में समुद्री पर्यावरण पर भी असर पड़ सकता है.