एक बाढ़ का पानी उतरता नहीं कि अगले खतरे की चिंता शुरू हो जाती है. नेपाल का रसुवा 5 साल में पांच बड़ी बाढ़ झेल चुका है. आखिर हिमालय का यह इलाका बार-बार ऐसी तबाही के निशाने पर क्यों आता है? नेपाल का रसुवा जिला एक बार फिर बाढ़ की चपेट में है.
26 अगस्त को यहां अचानक आई बाढ़ ने काफी नुकसान किया. लेकिन रसुवा में ऐसी बाढ़ पहले भी कई बार आ चुकी है. नेपाल की नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी के आंकड़ों के मुताबिक, 2022 से 2026 के बीच रसुवा में कम से कम पांच बड़ी बाढ़ आई हैं. 2025 में आई दो बाढ़ में कम से कम 20 लोगों की मौत हुई थी.
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रसुवा में बार-बार बाढ़ आने की कई वजहें हैं. यह नेपाल-चीन सीमा के पास ऊंचे पहाड़ों में बसा है. ऊपर पहाड़ों और ग्लेशियरों से पानी नीचे आता है. लेकिन यहां पहाड़ों के बीच खुली जमीन बहुत कम है. इसलिए पानी के पास फैलने या धीमा होने की ज्यादा जगह नहीं होती. पानी तेज रफ्तार से नीचे आता है और रास्ते में आने वाले गांवों, सड़कों और पुलों को नुकसान पहुंचाता है.

2023 में भोटेकोशी नदी का पानी दो बार अचानक बढ़ गया था. पहली बार 3 जून और दूसरी बार 13 जुलाई को. इसके बाद 25 अगस्त 2024 को केरुंग नदी की एक छोटी धारा से बाढ़ आई. इन दोनों सालों में लोगों को समय रहते सुरक्षित जगहों पर ले जाया गया था, इसलिए किसी की मौत नहीं हुई.
लेकिन 2025 में बाढ़ ज्यादा खतरनाक साबित हुई. 8 और 30 जुलाई को ल्हेंदे-भोटेकोशी नदी में बाढ़ आई. दोनों घटनाओं में कम से कम 20 लोगों की मौत हुई. 8 जुलाई की बाढ़ में तिब्बत के प्योरपु ग्लेशियर के पास बनी एक झील से अचानक बहुत ज्यादा पानी बाहर आया था. यह जगह नेपाल-चीन सीमा से करीब 35 किलोमीटर दूर ऊपर की तरफ है. पानी तेजी से नीचे आया और रास्ते में भारी नुकसान हुआ.
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पहाड़ों के बीच फंसा है रसुवा
रसुवा के तिमुरे, रसुवागढ़ी और स्याफ्रुबेसी जैसे इलाके पहाड़ों के बीच हैं. यहां समतल जमीन बहुत कम है. जब ऊपर से बहुत सारा पानी नीचे आता है तो वह संकरी जगह से होकर तेजी से आगे बढ़ता है. पानी को फैलने की जगह नहीं मिलती. इसलिए उसकी ताकत कम नहीं होती और नीचे बसे इलाकों में नुकसान ज्यादा हो सकता है. नदी के आसपास अब सड़कें, पुल, घर और बिजली बनाने के प्रोजेक्ट भी हैं. जब नदी का पानी अचानक बढ़ता है तो ये सभी चीजें उसकी चपेट में आ सकती हैं.

ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं
हिमालय में बढ़ती गर्मी भी इस खतरे को बढ़ा रही है. ICIMOD की 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2000 के बाद ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार करीब दोगुनी हो गई है. पिछले 50 साल में करीब 89 फीसदी ग्लेशियरों ने बर्फ खोई है. यानी ग्लेशियर जितनी बर्फ जमा कर रहे हैं, उससे ज्यादा बर्फ पिघल रही है.
ग्लेशियरों के पिघलने से उनके पास बनी झीलों में पानी बढ़ सकता है. अगर झील की दीवार टूट जाए तो बहुत सारा पानी एक साथ नीचे आ सकता है. इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है. ऐसी बाढ़ बहुत कम समय में नीचे बसे इलाकों तक पहुंच सकती है.
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आगे क्या करना होगा?
जानकारों का कहना है कि बाढ़ के बाद सिर्फ टूटी सड़क और पुल को फिर से बना देना काफी नहीं है. यह भी देखना जरूरी है कि गांव, सड़क और दूसरे बड़े प्रोजेक्ट कहां बनाए जा रहे हैं. ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के बीच रसुवा जैसे इलाकों में पहले से खतरे का पता लगाना जरूरी है. लोगों को समय पर चेतावनी मिले और नदी के बहुत करीब बड़े निर्माण न हों, तो बाढ़ से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है.