तेलंगाना की एक लोकधुन ने हाल ही में ऐसा सफर तय किया, जिसकी शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी. अपनी मिट्टी से जुड़ी देसी और ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर येशनागुला (Yeshanagula) अमेरिका के डलास के खचाखच भरे कॉन्सर्ट एरिना तक पहुंच गया. यहां तमिल संगीतकार अनिरुद्ध रविचंदर ने इसे लाइव परफॉर्म किया. एक्टर नानी उनके साथ मंच पर थे. इस दौरान हजारों प्रशंसक इस लोकधुन पर झूमते और नाचते नजर आए.
तेलुगू फिल्म द पैराडाइज के दूसरे सिंगल येशनागुला को 28 अगस्त को अनिरुद्ध ने डलास कॉन्सर्ट में लाइव लॉन्च किया. आमतौर पर किसी फिल्म के गाने की लॉन्चिंग एक सामान्य प्रमोशनल इवेंट होती है, लेकिन येशनागुला के साथ ऐसा नहीं हुआ. डलास में इसकी लाइव परफॉर्मेंस ने गाने की लॉन्चिंग को एक बड़े और यादगार संगीत समारोह में बदल दिया.
इसे और दिलचस्प बनाता है इस गाने को पेश करने वाले कलाकारों का अलग-अलग जगहों से होना. तमिलनाडु के संगीतकार अनिरुद्ध रविचंदर और आंध्र प्रदेश से जुड़ी जड़ों वाले अभिनेता नानी दोनों तेलंगाना की मिट्टी से निकले इस लोकगीत पर नाच रहे थे और सामने मौजूद भीड़ को झूमने पर मजबूर कर रहे थे. इस लोकधुन को फिल्म द पैराडाइज में निर्देशक श्रीकांत ओडेला लेकर आए हैं और इसके नए बोल कसारला श्याम ने लिखे हैं. श्रीकांत और श्याम दोनों तेलंगाना से हैं.
दिलचस्प बात यह है कि डलास में मौजूद ज्यादातर लोगों को शायद गाने के आधे से ज्यादा बोलों का मतलब भी पता न हो. यही बात तेलुगू सुनने वाले कई युवाओं पर भी लागू होती है. फिर भी जैसे ही येशनागुला बजता है, हर कोई नाचने लगता है और इसके नाम को जोर-जोर से दोहराता है. यही बताता है कि यह गाना अपनी भाषा और जगह की सीमाओं से निकलकर कितनी दूर तक पहुंच चुका है. यही किसी लोकधुन के पैन इंडिया सफर की असली कहानी है. भाषा की सीमा खत्म हो जाती है और लय अपनी भाषा खुद बना लेती है.
येशनागुला की लोकप्रियता को समझने के लिए सबसे पहले अनिरुद्ध रविचंदर के संगीत को समझना होगा. उन्होंने इस गाने की तेलंगाना वाली लोक पहचान को चमकदार बनाने के चक्कर में उसे बदलने की कोशिश नहीं की. इसके उलट, उन्होंने उसकी देसी खूबी को और बढ़ा दिया.
गाने की शुरुआत होते ही रिदम पकड़ में आ जाती है. तेज परकशन, बीट्स, प्रोग्राम्ड साउंड, सिंथ और कीबोर्ड. सब मिलकर लोकधुन के इर्द-गिर्द एक ऐसा संगीतमय संसार बनाते हैं, जिसमें मूल धुन दबती नहीं बल्कि और उभरकर सामने आती है. करीब 168 बीट्स प्रति मिनट की रफ्तार वाला यह ट्रैक श्रोता को ज्यादा देर स्थिर रहने का मौका ही नहीं देता. हुक आती है, बीट लॉक होती है और गाना लगातार आगे धकेलता रहता है. ऐसा लगता है कि इसे पहले किसी स्क्रीन के लिए नहीं, बल्कि एक विशाल भीड़ को नचाने के लिए डिजाइन किया गया है.
यही अनिरुद्ध की सबसे बड़ी खूबी है. वह लोक संगीत को मॉडर्न बनाने के लिए उसकी पहचान नहीं छीनते. वह उसकी ऊर्जा को पकड़ते हैं और उसे इतना बड़ा कर देते हैं कि वह किसी भी भाषा और किसी भी भूगोल के श्रोता तक पहुंच सके. जिस लोकगीत की उम्र द पैराडाइज से कहीं ज्यादा है लेकिन येशनागुला की कहानी द पैराडाइज से शुरू नहीं होती. इसकी मशहूर हुकलाइन ‘येशनागुला कट्टा मीदा’ एक पुराने तेलंगाना लोकगीत से आती है, जिसे लोकगायक जांगी रेड्डी अड्डुला से जोड़ा जाता है. दिलचस्प बात यह है कि अड्डुला ने ही अनिरुद्ध के नए वर्जन में भी अपनी आवाज दी है.
फिल्म में आने से पहले यह गीत गांवों के आयोजनों, स्थानीय समारोहों और लोक संगीत के मंचों पर अपनी जिंदगी जी रहा था. फिर यूट्यूब, डीजे और शॉर्ट वीडियो ने इसकी पहुंच का दायरा बढ़ाया. यानी ‘द पैराडाइज’ ने इस धुन को जन्म नहीं दिया, बल्कि उसे एक बहुत बड़े मंच तक पहुंचा दिया.
निर्देशक श्रीकांत ओडेला ने कथित तौर पर यह गीत बचपन में सुना था और लंबे समय से इसे अपनी किसी फिल्म का हिस्सा बनाना चाहते थे. जब मौका ‘द पैराडाइज’ में आया तो उन्होंने इसकी पहचान बदलने के बजाय इसकी मशहूर हुकलाइन को बरकरार रखा. इसके आसपास कसारला श्याम ने नए बोल लिखे और इस तरह एक पुरानी लोकधुन को फिल्म की दुनिया में नया संदर्भ मिल गया.
कसारला श्याम के लिखे बोलों में तेलंगाना की स्थानीय भाषा, खान-पान और स्मृतियां गहराई से मौजूद हैं. मसलन, ‘बुड्डा परकाला कूरा’ एक ऐसी करी की ओर इशारा करता है जो छोटी स्थानीय मछली ‘बुड्डा परका’ से बनाई जाती है. वहीं ‘बुडिमतला बिय्यम’ चावल की एक खास किस्म का संदर्भ है, जिसे आज की युवा पीढ़ी शायद उतना न पहचानती हो. लेकिन यही तो इन शब्दों की खूबसूरती है. ये किसी ग्रामीण पृष्ठभूमि को दिखाने के लिए जोड़े गए सजावटी शब्द नहीं हैं. ये उस रोजमर्रा की जिंदगी के हिस्से हैं जिसमें एक खास पीढ़ी ने अपनी जिंदगी बिताई है. इन शब्दों में खाना है, घर है, बोली है और यादें हैं.
मैं खुद ‘बुड्डा परका’ या ‘बुडिमतला बिय्यम’ को इसलिए पहचानता हूं क्योंकि मेरे पिता इन्हें जानते हैं. इसलिए नहीं कि मेरी पीढ़ी ने इन्हें रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होते हुए देखा है. यही अंतर इस गाने को और दिलचस्प बनाता है.
‘येशनागुला’ को सिर्फ इसकी तेज बीट और डांस के जरिए सुनना इसके एक महत्वपूर्ण हिस्से को मिस कर देना होगा. इन बोलों के भीतर एक स्त्री का अपने पति के लिए चाहत और इंतजार भी छिपा है. वह अपने पति को प्यार, अपनापन और इच्छा के साथ संबोधित करती है. यानी बाहर से यह जितना उन्मुक्त, शोरभरा और ऊर्जावान सुनाई देता है, उसके भीतर उतनी ही निजी और अंतरंग लोक संवेदना भी मौजूद है. यही लोकगीतों की ताकत है. वे अक्सर उस समाज की भावनाओं को दर्ज करते हैं, जिन्हें औपचारिक इतिहास या दस्तावेजों में जगह नहीं मिलती.
‘येशनागुला’ में भी एक तरफ ढोल और बीट्स हैं, दूसरी तरफ एक स्त्री की निजी दुनिया. गाने की कोरियोग्राफी को शुरुआत में सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने बेहद साधारण और सामान्य बताया. लेकिन जैसे-जैसे गाने की रील्स सामने आने लगे, उसकी यही सादगी इसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी. आटा संदीप मास्टर की कोरियोग्राफी में ऐसे मूव्स हैं जिन्हें देखकर दर्शक यह नहीं सोचता कि ‘मैं यह कर पाऊंगा या नहीं’. बल्कि शरीर खुद उन स्टेप्स को पकड़ लेता है.
शायद यही वजह है कि गाना सिर्फ फिल्मों के डांस फ्लोर तक सीमित नहीं रहा. लोग इसे अपने-अपने तरीके से करने लगे. ऐसा लगता है कि कोरियोग्राफी ने जिंदगी से मूव्स उठाए हैं, जिंदगी को कोरियोग्राफी सिखाने की कोशिश नहीं की.
तमिलनाडु, आंध्र, तेलंगाना और केरल... एक गाने में पूरा भारत
‘येशनागुला’ की यात्रा इसके कलाकारों की भौगोलिक विविधता को भी दिलचस्प बना देती है. श्रीकांत ओडेला तेलंगाना की लोकस्मृति से इस गीत को लेकर आते हैं. कसारला श्याम उसके शब्दों में तेलंगाना की भाषा और संस्कृति को बनाए रखते हैं. तमिलनाडु के अनिरुद्ध उस लोकधुन को ऐसा संगीत देते हैं जो पूरे देश के कानों तक पहुंच सके.
आंध्र प्रदेश से जुड़ी जड़ों वाले नानी इस गीत को पर्दे पर आगे लेकर आते हैं. वहीं केरल से आने वाली कीर्ति सुरेश इस स्पेशल नंबर में डांस करती नजर आती हैं और फिर डलास में यही गीत हजारों भारतीय और तेलुगू संगीतप्रेमियों के सामने बजता है यानी एक लोकगीत, जिसकी जड़ें तेलंगाना के स्थानीय जीवन में हैं. उसे तमिल संगीतकार गा रहा है, आंध्र से जुड़ा अभिनेता उसके साथ नाच रहा है, केरल की अभिनेत्री उस पर परफॉर्म कर रही है और अमेरिका में बैठी भीड़ उसे अपना बना रही है.
यह सिर्फ एक फिल्मी गाने की सफलता नहीं है. यह भारतीय पॉप कल्चर के उस बदलते भूगोल की तस्वीर है, जहां स्थानीय अब स्थानीय नहीं रहना चाहता लेकिन लोकप्रिय होने के लिए अपनी पहचान छोड़ना भी जरूरी नहीं है.
दरअसल, तेलंगाना के लोक संगीत की यह यात्रा पिछले कुछ वर्षों से लगातार दिखाई दे रही है. साई पल्लवी पर फिल्माया गया ‘सारंगा दरिया’ तेलंगाना के पुराने लोकगीत को मुख्यधारा की फिल्म लव स्टोरी (2021) के सबसे चर्चित संगीत पलों में ले आया. इसी तरह कसारला श्याम का लिखा ‘रामुलू रामुला’, अला वैकुंठपुरमुलू (2020) के जरिए तेलंगाना की लोक धुनों और भाषा को एक बड़े कमर्शियल डांस नंबर में लेकर आया.
बदलाव सिर्फ इतना आया है कि अब लोकगीत के पास पहले से कहीं ज्यादा रास्ते हैं. गांव के मंच से यूट्यूब तक, स्थानीय समारोह से इंस्टाग्राम रील तक लोकगायक से फिल्म स्टार तक और फिर भारत से हजारों किलोमीटर दूर किसी कॉन्सर्ट एरिना तक. लोकगीत को लोकप्रिय होने के लिए अपनी मिट्टी छोड़ने की जरूरत नहीं ‘येशनागुला’ की असली सफलता शायद इसी बात में छिपी है. इसने यह साबित किया है कि किसी लोकगीत को पैन इंडिया बनाने के लिए उसकी भाषा या उसकी सांस्कृतिक पहचान को मिटाना जरूरी नहीं है.
उन्होंने तेलंगाना की लोकधुन को किसी चमकदार पॉप नंबर में बदलने के बजाय उसकी धड़कन को और तेज कर दिया. श्रीकांत ओडेला ने उसकी स्मृति को बचाए रखा. कसारला श्याम ने उसके भीतर की स्थानीय दुनिया को शब्द दिए और दर्शकों ने उसे अपनी भाषा से आगे जाकर स्वीकार कर लिया.