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नेपाल में मलबे से कई दिन बाद जिंदा निकले लोग, न खाना मिला ना पानी... फिर कैसे बची जान?

मलबे में फंसे इंसान के लिए सिर्फ रेस्क्यू टीम ही नहीं, उसका अपना शरीर भी लड़ रहा होता है. जानिए इस लड़ाई में शरीर किस तरह एनर्जी बचाता है और कब मुश्किल बढ़ने लगती है.

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नेपाली सेना ने एक चीनी नागरिक को 10 दिन बाद मलबे से जिंदा निकाला. (Photo: Nepal Army Via AP)
नेपाली सेना ने एक चीनी नागरिक को 10 दिन बाद मलबे से जिंदा निकाला. (Photo: Nepal Army Via AP)

नेपाल में बाढ़ और मलबे के बीच कई दिन तक फंसे लोगों के जिंदा मिलने की खबरों ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है कि आखिर इंसान बिना खाना और पानी के कितने समय तक जिंदा रह सकता है? हाल में 64 साल की चंद्रिका कुमारी श्रेष्ठा को नेपाल के बेट्रावती में ढहे घर के मलबे से करीब 11 दिन बाद जिंदा निकाला गया. बचाव दल को मलबे के अंदर एक छोटी सी खाली जगह में वह मिलीं. इसी तरह हाइड्रोपावर सुरंगों में फंसे कुछ लोगों को भी कई दिन बाद बचाया गया.

वैज्ञानिकों के मुताबिक, बिना खाना रहना और बिना पानी रहना दो अलग बातें हैं. शरीर के पास खाना न मिलने पर कुछ समय तक अपनी जमा ऊर्जा इस्तेमाल करने का तरीका होता है. लेकिन पानी की कमी शरीर पर ज्यादा तेजी से असर डालती है. इसलिए किसी इंसान के लिए यह बताना संभव नहीं है कि वह बिना खाना या पानी के ठीक कितने दिन जिंदा रहेगा. यह उम्र, सेहत, शरीर में मौजूद पानी और फैट, मौसम, चोट और उस व्यक्ति की हालत पर निर्भर करता है.

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खाना नहीं मिलने पर शरीर क्या करता है?

खाना बंद होने के बाद शरीर अपनी पहले से जमा ऊर्जा का इस्तेमाल करना शुरू करता है. NCBI की मेडिकल जानकारी के मुताबिक, शुरुआत में शरीर लीवर में जमा ग्लाइकोजन, यानी आसानी से इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा, से काम चलाता है. करीब 24 घंटे के बाद इसका भंडार काफी कम होने लगता है. इसके बाद शरीर जमा फैट से ऊर्जा लेना शुरू करता है.

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Nepal Disaster

लंबे समय तक खाना नहीं मिलने पर शरीर ऊर्जा बनाने के लिए मांसपेशियों से भी प्रोटीन लेना शुरू कर सकता है. यानी शरीर पहले अपनी जमा ऊर्जा बचाने की कोशिश करता है, लेकिन लंबे समय तक खाना न मिलने पर कमजोरी और मांसपेशियों का नुकसान बढ़ता जाता है.

इसी वजह से बिना खाना जिंदा रहने का कोई एक तय नंबर नहीं है. कुछ लोगों में लंबे समय तक खाना न मिलने के बावजूद शरीर कुछ समय तक काम करता रह सकता है, जबकि कम वजन, बीमारी या पहले से कमजोर शरीर में खतरा जल्दी बढ़ सकता है. लंबे समय तक भूखे रहने से शरीर में कई गंभीर बदलाव हो सकते हैं.

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पानी की कमी क्यों ज्यादा खतरनाक है?

शरीर के लिए पानी लगातार जरूरी है. पानी पेशाब, पसीने, सांस और मल के जरिए शरीर से निकलता रहता है. जब इसकी भरपाई नहीं होती तो शरीर में पानी की कमी होने लगती है. WHO के मुताबिक, शरीर के वजन का करीब 1% पानी कम होने पर प्यास लगने लगती है. करीब 5% की कमी पर मुंह सूखना, सिरदर्द और काम करने की क्षमता में कमी जैसे असर दिख सकते हैं. 10% पानी की कमी जानलेवा हो सकती है.

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पानी की कमी बढ़ने पर पेशाब कम हो सकता है, चक्कर और बहुत ज्यादा कमजोरी हो सकती है. गंभीर स्थिति में इंसान भ्रमित हो सकता है, बेहोश हो सकता है और शरीर के जरूरी अंगों पर भी असर पड़ सकता है. NCBI की मेडिकल जानकारी भी बताती है कि शरीर से पानी की कमी बढ़ने पर तेज धड़कन, थकान, चक्कर और गंभीर स्थिति में भ्रम जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

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फिर मलबे में कई दिन तक कैसे बचते हैं लोग?

मलबे में फंसे व्यक्ति की स्थिति सामान्य तौर पर खाना न मिलने जैसी नहीं होती. अगर मलबे के बीच हवा के लिए जगह बची हो, व्यक्ति ज्यादा हिल-डुल नहीं रहा हो और शरीर से पानी कम निकल रहा हो, तो कुछ समय तक बचने की संभावना हो सकती है.

नेपाल में चंद्रिका कुमारी श्रेष्ठा के मामले में भी बचाव दल ने उन्हें एक छोटे एयर पॉकेट, यानी हवा वाली खाली जगह, में पाया था. यही जगह उन्हें सांस लेने में मदद कर सकती थी. हालांकि इस एक घटना से यह नहीं कहा जा सकता कि हर व्यक्ति इतने दिनों तक मलबे में जिंदा रह सकता है.

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इसलिए मलबे में फंसे किसी व्यक्ति को सिर्फ इस आधार पर मृत मान लेना कि उसे कई घंटे या कई दिन से खाना नहीं मिला है, वैज्ञानिक तौर पर सही नहीं है. जब तक सांस लेने की जगह और बचने की संभावना मौजूद हो, रेस्क्यू टीमों का तलाश जारी रखना जरूरी है.

सीधी बात यह है कि शरीर बिना खाने के कुछ समय तक अपनी जमा ऊर्जा से काम चला सकता है, लेकिन पानी और सांस लेने के लिए हवा की कमी ज्यादा जल्दी जानलेवा हो सकती है. नेपाल में कई दिन बाद मिले लोगों की घटनाएं दिखाती हैं कि इंसानी शरीर मुश्किल हालात में कुछ समय तक खुद को संभाल सकता है, लेकिन इसकी कोई तय 'सर्वाइवल लिमिट' नहीं होती.

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