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हीटवेव का बड़ा असर! स्विट्जरलैंड के ग्लेशियर तेजी से पिघले रहे, वैज्ञानिकों ने दी ये चेतावनी

लगातार पड़ रही हीटवेव और कम बर्फबारी की वजह से स्विट्जरलैंड के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो इस साल भी बर्फ का बड़ा नुकसान हो सकता है.

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स्विट्जरलैंड के ग्लेश्च में मौजूद रोन ग्लेशियर को धूप से बचाने के लिए प्रोटेक्टिव फोम लगाया गया है. (Photo: AFP)
स्विट्जरलैंड के ग्लेश्च में मौजूद रोन ग्लेशियर को धूप से बचाने के लिए प्रोटेक्टिव फोम लगाया गया है. (Photo: AFP)

यूरोप में पड़ रही भीषण हीटवेव का असर अब स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों पर साफ दिखने लगा है. ग्लेशियर मॉनिटरिंग इन स्विट्जरलैंड (GLAMOS) के मुताबिक, इस साल सर्दियों में जमा हुई लगभग पूरी बर्फ सोमवार तक पिघल जाएगी. इसके बाद अक्टूबर तक जितनी भी बर्फ पिघलेगी, वह सीधे ग्लेशियरों का आकार कम करेगी. वैज्ञानिकों का कहना है कि 2022 के बाद यह दूसरा सबसे जल्दी आने वाला 'ग्लेशियर लॉस डे' होगा.

ग्लेशियर लॉस डे उस दिन को कहा जाता है, जब सर्दियों में ग्लेशियरों पर जमा हुई पूरी बर्फ पिघल जाती है. इसके बाद होने वाली हर बर्फ की पिघलन सीधे ग्लेशियर की बर्फ को कम करती है. आमतौर पर यह स्थिति अगस्त के बीच में आती थी, लेकिन इस साल यह जून के आखिर में ही पहुंच गई है.

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 Switzerland glaciers Heatwave

हीटवेव ने बढ़ाई पिघलने की रफ्तार

GLAMOS के प्रमुख मैथियास हस के मुताबिक, पूरे आल्प्स क्षेत्र में बर्फ और बर्फीली चट्टानों के पिघलने की रफ्तार बहुत तेज हो गई है. उन्होंने बताया कि केवल 10 दिनों में रोन (Rhone) ग्लेशियर की बर्फ करीब एक मीटर तक पिघल गई. उनका कहना है कि एक ही हीटवेव सबसे बड़ी समस्या नहीं होती, लेकिन जब लंबे समय तक लगातार बहुत ज्यादा गर्मी रहती है, तब ग्लेशियरों को सबसे ज्यादा नुकसान होता है.

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कम बर्फबारी और सहारा की धूल भी बनी वजह

वैज्ञानिकों के अनुसार, इस साल ग्लेशियरों पर जमी बर्फ 2010 से 2020 के औसत की तुलना में करीब 25 प्रतिशत कम रही. मई में सामान्य से ज्यादा गर्मी पड़ने की वजह से बर्फ जल्दी पिघल गई. वहीं मार्च में सहारा रेगिस्तान से आई धूल भी ग्लेशियरों पर जम गई. इससे सफेद बर्फ की चमक कम हुई और नीचे मौजूद गहरे रंग की बर्फ धूप को ज्यादा सोखने लगी, जिससे पिघलने की रफ्तार और बढ़ गई.

 Switzerland glaciers Heatwave

2000 के बाद सबसे खराब दौर

आंकड़ों के मुताबिक, साल 2000 के बाद केवल 2022 में ही ग्लेशियर लॉस डे इससे पहले आया था. वैज्ञानिकों का कहना है कि 2026 की स्थिति कई मामलों में 2022 जैसी दिख रही है, जिसे आल्प्स के ग्लेशियरों के लिए अब तक का सबसे खराब साल माना जाता है. उनका कहना है कि इस साल भी ग्लेशियरों में बर्फ का नुकसान काफी ज्यादा रहने की आशंका है.

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तेजी से घट रहे हैं स्विट्जरलैंड के ग्लेशियर

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वैज्ञानिकों के अनुसार, स्विट्जरलैंड के ग्लेशियर पिछले करीब 170 वर्षों से लगातार पीछे हट रहे हैं, लेकिन हाल के दशकों में यह प्रक्रिया और तेज हो गई है. 2000 से 2024 के बीच देश के ग्लेशियरों का कुल आयतन 38 प्रतिशत तक घट चुका है. पिछले 50 वर्षों में स्विट्जरलैंड 1,200 ग्लेशियर खो चुका है और अब वहां करीब 1,300 ग्लेशियर ही बचे हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि इनमें से कई छोटे ग्लेशियर पूरी तरह खत्म हो चुके हैं, जबकि बाकी भी लगातार सिकुड़ रहे हैं.

 Switzerland glaciers Heatwave

वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर आने वाले वर्षों में तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो इस सदी के अंत तक स्विट्जरलैंड में केवल कुछ ही ग्लेशियर बच पाएंगे. उनका मानना है कि लगातार बढ़ती गर्मी, कम बर्फबारी और लंबे समय तक रहने वाली हीटवेव ग्लेशियरों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है.

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