हीटवेव की सीमा तब पूरी होती है जब किसी मौसम केंद्र का अधिकतम तापमान मैदानी इलाकों में कम से कम 40 डिग्री सेल्सियस, तटीय इलाकों में 37 डिग्री और पहाड़ी इलाकों में 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और सामान्य से कम से कम 4.5 डिग्री सेल्सियस अधिक होता है. गर्मी के मौसम में जब मैदानी इलाकों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस या उससे ऊपर होता है तब हवा काफी गर्म हो जाती है, जिसके कारण लू लगने का खतरा बना रहता है (Heatwaves).
इस मौसम में भारत के दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी राजस्थान के अधिकांश हिस्सों में हीटवेव का खतरा बना रहता है. भारतीय मौसम विभाग (IMD) इस बीच रेड अलर्ट जारी करता रहता है.
दिल्ली, चंडीगढ़ और इन राज्यों के अन्य प्रमुख शहरों में तापमान 44 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाती है.
दुनिया रिकॉर्ड तोड़ गर्मी के एक नए दौर में जा रही है. वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार सुपर अल-नीनो पिछले 150 सालों का सबसे ताकतवर बनेगा, जिसका असर दुनिया के मौसम पर पड़ सकता है.
हीटवेव के बाद अब जंगल की आग नई चुनौती बनकर सामने आई है. तेजी से फैलती लपटों ने हजारों लोगों को सुरक्षित जगहों पर जाने के लिए मजबूर कर दिया.
सिर्फ 16 दिनों में 20 हजार से ज्यादा मौतें. फ्रांस से आए नए आंकड़ों ने दिखा दिया कि हीटवेव अब सिर्फ बढ़ता तापमान नहीं, बल्कि हजारों लोगों की जान लेने वाला बड़ा क्लाइमेट क्राइसिस बन चुकी है.
फ्रांस में 17 जून से 2 जुलाई के बीच 21,674 मौतें दर्ज हुईं, जो सामान्य से 5,764 अधिक हैं. स्वास्थ्य एजेंसी के अनुसार, भीषण गर्मी ने खासकर बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों पर गंभीर असर डाला है. एक्सपर्ट्स ने भविष्य में बेहतर तैयारी, समय पर चेतावनी और जनजागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया है.
जापान में बढ़ती गर्मी ने मौसम विभाग की शब्दावली बदल दी है. 40°C पार करने वाले दिनों के लिए अब नई 'ब्रूटली हॉट डे' कैटेगरी बनाई गई है, जो लगातार बढ़ते तापमान की गंभीरता को दिखाती है.
भारत के अधिकांश हिस्सों में सूखा पड़ रहा है, लेकिन प्रशांत महासागर में मौसमी सिस्टम बन रहे हैं. अगर ये बंगाल की खाड़ी पहुंचे तो 18-25 जुलाई में मॉनसून की वापसी हो सकती है.
फ्रांस में तीन न्यूक्लियर रिएक्टर बंद करने पड़े. वजह थी बढ़ती गर्मी और नदियों का बढ़ता तापमान. अब सवाल है कि क्या भारत के परमाणु बिजलीघरों के सामने भी कभी ऐसी स्थिति आ सकती है?
IITM पुणे की नई स्टडी में खुलासा हुआ कि भारत के मॉनसून की 25% बारिश हवा में ही उड़ जाती है. पश्चिमी घाट क्षेत्र में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा है.
गर्मी सिर्फ तापमान नहीं बढ़ा रही, मौतों का आंकड़ा भी बढ़ा रही है. यूरोप में जून के आखिरी सप्ताह में 10 हजार से ज्यादा अतिरिक्त मौतें दर्ज होने के बाद वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है.
यूरोप में आई हीटवेव को लेकर वैज्ञानिकों ने बड़ा दावा किया है. क्लाइमेट चेंज ने गर्मी इतनी बढ़ा दी कि करीब 1500 लोगों की मौत इससे जुड़ी पाई गई.
दुनिया 2035 में नहीं पहुंची है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है उस समय के मौसम की डरावनी झलक अभी दिख रही है. आने वाले महीनों में कई देशों में रिकॉर्ड गर्मी, सूखा, बाढ़ और जंगलों में आग जैसी घटनाएं बढ़ सकती हैं.
दिल्ली में मॉनसूनी बारिश के बावजूद फील-लाइक तापमान 49 डिग्री तक पहुंच गया. ज्यादा ह्यूमिडिटी के कारण गर्मी का एहसास बहुत ज्यादा है. IMD ने 10 जुलाई तक बारिश की संभावना जताई है.
WMO ने चेतावनी दी है कि इस साल जुलाई से सितंबर के बीच अल-नीनो तेजी से मजबूत होगा. इससे सूखा, भारी बारिश, लू और समुद्री हीटवेव बढ़ेंगी. भारत समेत कई देशों में कृषि, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा.
पहले रिकॉर्ड तोड़ गर्मी ने झुलसाया, अब वही मौसम जंगलों को धधका रहा है. फ्रांस में आग से निपटने के लिए हेलीकॉप्टर, विमान और हजारों दमकलकर्मी काम कर रहे हैं.
यूरोप इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है. रिकॉर्ड तोड़ तापमान ने कई देशों में जनजीवन को प्रभावित किया है. फ्रांस, स्पेन, बेल्जियम और नीदरलैंड जैसे देशों में हीटवेव के कारण 4 हजार से ज्यादा मौतें दर्ज की गई हैं. विशेषज्ञ इसे जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव का संकेत मान रहे हैं.
उत्तर अमेरिका में भीषण लू की लहर वर्ल्ड कप के नॉकआउट मैचों को प्रभावित कर रही है. जलवायु परिवर्तन ने इस हीटवेव को कई गुना ज्यादा खतरनाक बना दिया है. खिलाड़ियों और फैंस की सेहत को खतरा है.
यूरोप में रिकॉर्डतोड़ हीटवेव ने सिर्फ तापमान ही नहीं बढ़ाया, बल्कि वहां के घरों की डिजाइन पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. सर्दियों से बचाने के लिए बने मकान अब भीषण गर्मी में 'ओवन' जैसे महसूस हो रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में यूरोप की पारंपरिक हाउसिंग अब नई चुनौती बनती जा रही है.
हीटवेव और बढ़ते तापमान के बीच खुले इलाकों को ठंडा रखने वाली मिस्ट कूलिंग तकनीक चर्चा में है. जानिए यह सिस्टम कैसे काम करता है और इसे गर्मी से राहत का नया ऑप्शन क्यों माना जा रहा है.
अल-नीनो से यूरोप और अमेरिका जैसे ठंडे इलाके अचानक भीषण गर्मी की चपेट में आ गए हैं. प्रशांत महासागर के गर्म पानी ने हवाओं को बदला, जिससे हीटवेव बढ़ गईं. जलवायु परिवर्तन ने इसे और खतरनाक बना दिया.
यूरोप इस समय रिकॉर्डतोड़ हीटवेव की चपेट में है. फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन और कई दूसरे देशों में तापमान नए रिकॉर्ड बना रहा है. हालात ऐसे हैं कि लोगों के घरों में साबुन पिघल रहे हैं, शराब की बोतलों के कॉर्क बाहर निकल रहे हैं और कई मकान दिन में 'ओवन' जैसे महसूस होने लगे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी बड़ी वजह सिर्फ गर्मी नहीं, बल्कि यूरोप के पुराने घरों की बनावट भी है.
अमेरिका में भीषण हीटवेव ने करोड़ों लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. नेशनल वेदर सर्विस ने 18 राज्यों में खतरनाक गर्मी की चेतावनी जारी की है. तापमान के साथ उमस इतनी ज्यादा होगी कि लोगों को 115 डिग्री फारेनहाइट यानी करीब 46 डिग्री सेल्सियस जैसी गर्मी महसूस होगी. 6 करोड़ से ज्यादा लोग हीट अलर्ट के दायरे में हैं.