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निर्जला एकादशी व्रत कथा (Nirjala Ekadashi Vrat Katha)

निर्जला एकादशी व्रत कथा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण और पुण्यदायी माना जाता है. इस दिन श्रद्धालु अन्न और जल का त्याग कर भगवान विष्णु की उपासना करते हैं. मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करने से पूरे वर्ष की 24 एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है. कई धार्मिक ग्रंथों में इसे मोक्ष प्रदान करने वाला व्रत भी बताया गया है.

निर्जला एकादशी व्रत कथा
निर्जला एकादशी व्रत कथा

कथा के अनुसार जब वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया था. तब युधिष्ठिर ने कहा - जनार्दन! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिए. भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे राजन्! इसका वर्णन परम धर्मात्मा व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान् हैं.

 

तब वेदव्यासजी कहने लगे- कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है. द्वादशी को  स्नान करके पवित्र होकर फूलों से भगवान केशव की पूजा करें. फिर पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करें. यह सुनकर भीमसेन बोले- परम बुद्धिमान पितामह! मेरी उत्तम बात सुनिए. राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव, ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि भीमसेन एकादशी को तुम भी न खाया करो परन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूं कि मुझसे भूख नहीं सही जाएगी.

 

भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा- यदि तुम नरक को दूषित समझते हो और तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और तो दोनों पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन नहीं करना.

 

भीमसेन बोले महाबुद्धिमान पितामह! मैं आपके सामने सच कहता हूं. मुझसे एक बार भोजन करके भी व्रत नहीं किया जा सकता, तो फिर उपवास करके मैं कैसे रह सकता हूं. मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूं, तभी यह शांत होती है. इसलिए महामुनि! मैं पूरे वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूं. जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूं, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये. मैं उसका यथोचित रूप से पालन करुंगा.

 

व्यासजी ने कहा- भीम! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो. केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान् पुरुष मुख में न डालें, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है. एकादशी को सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है. इसके बाद द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करे. इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करें. वर्षभर में जितनी एकादशियां होती हैं, उन सबका फल इस निर्जला एकादशी  से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है. शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि ‘यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है."

 

कुन्तीनन्दन! निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो. उस दिन जल में शयन करने वाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु यानी पानी में खड़ी गाय का दान करना चाहिए, सामान्य गाय या घी से बनी गाय का दान भी किया जा सकता है. इस दिन दक्षिणा और कई तरह की मिठाइयों से ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए. उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं. 

 

जिन्होंने श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस निर्जला एकादशी का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आने वाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुंचा दिया है. निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए. जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है. जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है. चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इस कथा को सुनने से भी मिलता है. 

 

भीमसेन! ज्येष्ठ मास में शुक्ल पक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए. उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुंचकर आनन्द का अनुभव करता है. इसके बाद द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे. जो इस प्रकार पूर्ण रूप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है. यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया.

 

विष्णु जी आरती 

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥

 

जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥

 

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥

 

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥

 

तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥

 

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥

 

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥

 

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥

 

तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥

 

जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…॥

 

 

निर्जला एकादशी व्रत कथा पूजा सामग्री

  • विष्णु जी चित्र, प्रतिमा
  • पीले वस्त्र
  • तुलसी पत्ते, पंचामृत, गंगाजल, नारियल
  • ऋतुफल, धूप, दीप, कपूररोली, मौली, अक्षत
  • भोग के लिए मिठाई

 

निर्जला एकादशी व्रत कथा पूजा विधि

  • स्नान और संकल्प
  • चौकी सजाना
  • अभिषेक, श्रृंगार
  • भोग, आरती
  • दान का फल

 

निर्जला एकादशी व्रत कथा मुख्य लाभ और महत्व

  • एकादशियों का फल
  • पापों का नाश
  • मोक्ष की प्राप्ति
  • आत्म-संयम

-------समाप्त-------

समाप्त

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