देवशयनी एकादशी व्रत कथा पढ़ने या सुनने से भक्तों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवशयनी एकादशी व्रत करने से मानसिक शांति मिलती है, धन-धान्य की वृद्धि होती है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस कथा का पाठ करने या सुनने मात्र से मनुष्य को मृत्यु के पश्चात वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है.
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने पूछा- हे भगवन् . आषाढ़ के शुक्ल- पक्ष में कौन-सी एकादशी होती है? उसका नाम और विधि क्या है ? यह बताने की कृपा करें.
भगवान श्रीकृष्ण बोले- राजन! आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम 'शयनी' है. मैं उसका वर्णन करता हूं. वह महान पुण्यमयी, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाली, साथ ही सब पापों को हरने वाली एकादशी है. इसका व्रत करना अति उत्तम फल देने वाला होता है.
जिन्होंने आषाढ़ शुक्ल पक्ष में शयनी एकादशी के दिन जिन्होंने कमल-पुष्प से कमल लोचन भगवान विष्णु का पूजन और एकादशी का उत्तम व्रत किया है, उन्होंने तीनों लोकों और तीनों सनातन देवताओं का पूजन करने के समान फल प्राप्त होता है. हरिशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु राजा बलि के यहां रहते हैं और दूसरा क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर तब तक शयन करता है, जब तक आगामी कार्तिक की एकादशी नहीं आ जाती, अतः आषाढ़ शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक मनुष्य को अच्छे से धर्म का आचरण करना चाहिए. जो मनुष्य इस व्रत का अनुष्ठान करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है, इस कारण विधि पूर्वक और सच्ची निष्ठा के साथ इस एकादशी का व्रत करना चाहिए.
एकादशी की रात में जागरण करना चाहिए और शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान विष्णु की भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए. ऐसा करने वाले पुरुष के पुण्य की गणना करने में चतुर्मुख ब्रह्माजी भी असमर्थ हैं. ऐसा करने से व्यक्ति के पुण्य कई ज्यादा गुणा बढ़ जाते हैं. राजन्! जो इस प्रकार भोग और मोक्ष प्रदान करने वाले सर्वपापहारी एकादशी के उत्तम व्रत का पालन करता है, वह जाति का चाण्डाल होने पर भी संसार में सदा मेरा प्रिय रहता है. जो मनुष्य दीपदान, पलाश के पत्ते पर भोजन और व्रत करते हुए चौमासा व्यतीत करते हैं, वे मेरे लिए प्रिय हैं. चौमासे में भगवान विष्णु सोये रहते हैं, इसलिये मनुष्य को भूमि पर शयन करना चाहिए. सावन में साग, भादों में दही, कारमें दूध और कार्तिक में दाल का त्याग कर देना चाहिए.
जो व्यक्ति चौमासा में ब्रह्मचर्य का पालन करता है, वह ह परम गति को प्राप्त होता है. राजन्! एकादशी के व्रत से ही मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है. अतः सदा इसका व्रत करना चाहिए. कभी भी जानबूझकर इसे भूलना नहीं चाहिए. 'शयनी' और 'बोधिनी' के बीच में जो कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि आती है, वही गृहस्थों के लिए व्रत रखने योग्य हैं, अन्य मासों की कृष्ण पक्ष एकादशी गृहस्थ के रखने योग्य नहीं होती. शुक्ल पक्ष की एकादशी सभी गृहस्थजनों को करनी चाहिए.
विष्णु जी आरती
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…॥
-------समाप्त-------