भगवान जगन्नाथ की कथा सत्ययुग में राजा इंद्रद्युम्न और नील माधव की भक्ति से प्रारंभ होती है. मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ के विग्रह में श्रीकृष्ण का दिव्य हृदय विराजमान है, इसलिए भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की अपूर्ण मूर्तियां भी पूर्ण दिव्यता और श्रद्धा के साथ पूजी जाती हैं. माना जाता है कि उनकी यह कथा पढ़ने से भक्तों को जीवन के सभी दुखों और पापों से छुटकारा मिलता है.
पौराणिक कथा के अनुसार, सत्ययुग में मालवा के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे. उन्हें एक दिव्य रूप 'नीलमणि अवतार' के बारे में पता चला, जिसे एक सबर कबीले के मुखिया विश्ववसु घने जंगलों में छिपाकर पूजते थे. राजा ने अपने पुरोहित विद्यापति को उनका पता लगाने के लिए भेजा. विद्यापति ने जंगल में जाकर वहां के मुखिया की बेटी से विवाह कर लिया और अंततः नीला माधव तक पहुंचने का मार्ग खोज लिया.
जब राजा इंद्रद्युम्न अपने सैनिकों के साथ वहां पहुंचे, तब तक नीला माधव अंतर्ध्यान हो चुके थे. निराश राजा ने समुद्र तट पर आमरण अनशन शुरू कर दिया. तब उन्हें आकाशवाणी हुई कि भगवान समुद्र में तैरते हुए एक दिव्य 'दारु' (पवित्र लकड़ी के लट्ठे) के रूप में प्रकट होंगे. राजा ने उस लकड़ी को खोजकर भव्य मंदिर का निर्माण कराया.
लकड़ी तो मिल गई, लेकिन उसे तराशना असंभव था क्योंकि कोई भी औजार उस पर काम नहीं कर रहा था. तब वृद्ध रूप में स्वयं भगवान विश्वकर्मा वहां पहुंचे. उन्होंने राजा के सामने एक शर्त रखी कि वे बंद कमरे में मूर्ति बनाएंगे और कोई भी उन्हें 21 दिन तक नहीं देखेगा. कई दिनों तक कमरे से कोई आवाज न आने पर, रानी की उत्सुकता के कारण राजा ने दरवाजा खोल दिया. उसी क्षण मूर्तिकार (भगवान विश्वकर्मा) अंतर्ध्यान हो गए. इसी कारण आज भी जगन्नाथ धाम में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र (बलराम) और देवी सुभद्रा की मूर्तियां बिना हाथों और पैरों के (अधूरी) रूप में स्थापित हैं.
द्वापर युग के अंत में, जब जरा बहेलिया के बाण से श्रीकृष्ण का देहांत हुआ, तो पांडवों ने उनका अंतिम संस्कार किया. लेकिन श्रीकृष्ण का हृदय (पिंड) अग्नि में नहीं जला. उसे समुद्र में प्रवाहित कर दिया गया, जो बाद में उसी पवित्र लकड़ी के लट्ठे के रूप में पुरी पहुंचा और आज भी जगन्नाथ जी की मूर्ति के भीतर सुरक्षित माना जाता है.
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन, भगवान जगन्नाथ की इच्छा अनुसार राजा ने पवित्र नदियों के जल से युक्त 108 स्वर्ण कलशों से प्रभु का अभिषेक किया. मान्यता है कि तभी से यह परंपरा 'देव स्नान पूर्णिमा' के रूप में चली आ रही है.
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