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रवि प्रदोष व्रत कथा (Ravi Pradosh Vrat Katha)

रवि प्रदोष व्रत कथा

रवि प्रदोष व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ और श्रवण करने से भगवान शिव के साथ-साथ सूर्यदेव की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है. मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से कुंडली में मौजूद सूर्य दोष और पितृदोष शांत होते हैं. साथ ही साधक को उत्तम स्वास्थ्य, आरोग्य, दीर्घायु, सुख-समृद्धि और मनचाहे शुभ फलों की प्राप्ति होती है.

रवि प्रदोष व्रत कथा
रवि प्रदोष व्रत कथा

एक समय की बात है, एक गांव में अत्यंत निर्धन ब्राह्मण परिवार निवास करता था. उस ब्राह्मण की पत्नी अत्यंत धार्मिक और साध्वी थी, जो श्रद्धा पूर्वक नियमित रूप से प्रदोष व्रत किया करती थी. इस दंपत्ति का एकमात्र पुत्र था, जो उनका परम प्रिय था. एक दिन वह बालक गंगा स्नान के लिए अकेले ही निकल पड़ा.

 

रास्ते में दुर्भाग्यवश कुछ डाकुओं ने उसे घेर लिया. उन्होंने बालक को धमकाते हुए कहा, "हम तुझे हानि नहीं पहुंचाएंगे, लेकिन तू हमें अपने पिता के छिपे हुए धन के बारे में बता दे." बालक ने डरते हुए और विनम्रता से उत्तर दिया, "बंधुओं! हम अत्यंत निर्धन हैं. हमारे पास छिपाने योग्य कुछ भी नहीं है." चोरों ने संदेहपूर्वक पूछा, "फिर तेरे पास यह पोटली किसलिए है?" बालक ने सरलता से उत्तर दिया, "मेरी मां ने मेरे लिए इसमें रोटियां रखी हैं." यह सुनकर डाकु आपस में बोले, "यह तो सचमुच गरीब है, इससे कुछ नहीं मिलेगा. चलो किसी और को ढूंढ़ते हैं." और वे उसे बिना हानि पहुंचाए छोड़कर चले गए.

 

बालक आगे बढ़ते हुए एक नगर पहुंचा. नगर के बाहर एक विशाल बरगद का वृक्ष था. थकावट के कारण वह बालक उसी वृक्ष की छांव में लेट गया और वहीं सो गया. उसी समय नगर के सिपाही डाकुओं की खोज में वहां पहुंचे. उन्होंने उस सोते हुए बालक को देखकर संदेहवश उसे चोर समझ लिया और बंदी बनाकर राजा के समक्ष प्रस्तुत किया. राजा ने बिना जांच-पड़ताल किए बालक को कारावास में डालने का आदेश दे दिया.

 

इधर, उसी रात बालक की मां ने प्रदोष व्रत किया और भगवान शिव की भक्ति में लीन रही. उसी रात्रि राजा को स्वप्न में भगवान शिव ने दर्शन दिए और कहा- जिस बालक को तुमने बंदी बनाया है, वह निर्दोष है. यदि प्रातःकाल उसे मुक्त नहीं किया गया, तो तुम्हारा राज्य और वैभव समाप्त हो जाएगा.

 

सुबह होते ही राजा भयभीत होकर उठा और बालक को बुलवाकर उससे पूरी घटना पूछी. बालक ने रोते हुए सारी सच्चाई कह सुनाई. राजा ने सत्य जानने के बाद सिपाहियों को आदेश दिया कि बालक के माता-पिता को नगर में बुलवाया जाए.

 

जब वे पहुंचे, तो राजा ने उन्हें सांत्वना दी और कहा, "तुम निश्चिंत रहो, तुम्हारा पुत्र निर्दोष है. तुम पर संकट आया था, लेकिन शिव की कृपा से  अब वह टल गया है." राजा ने उनकी दरिद्रता देखकर उन्हें पांच गांव दान में दे दिए. इसके बाद वह ब्राह्मण परिवार सुख और समृद्धि से भर गया. शिव की कृपा और प्रदोष व्रत के प्रभाव से उनका जीवन आनंदमय हो गया.

 

शिवजी की आरती

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

 

एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

 

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

 

अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

 

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

 

कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

 

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

 

त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥

 

ओम जय शिव ओंकारा॥ स्वामी ओम जय शिव ओंकारा॥

 

-------समाप्त-------

समाप्त

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