धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोमवती अमावस्या व्रत और इसकी पौराणिक कथा का श्रवण एवं पाठ करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है. इस व्रत के प्रभाव से विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है. साथ ही इस दिन किए गए पूजा-पाठ, दान और पितृ तर्पण से पूर्वजों की आत्मा को तृप्ति मिलती है तथा व्यक्ति को अपने कर्मों से जुड़े दोषों और नकारात्मकताओं से मुक्ति पाने का मार्ग प्रशस्त होता है.
पौराणिक कथा के अनुसार एक गरीब ब्राह्राण का परिवार था. उस परिवार में पति-पत्नी और उनकी एक बेटी थी. समय के साथ बेटी बड़ी होने लगी. वह बहुत ही सुंदर, संस्कारी और गुणों से भरपूर थी, लेकिन गरीबी के कारण उसके माता-पिता उसकी शादी नहीं कर पा रहे थे. एक दिन उनके घर एक साधु आए. बेटी ने बड़े आदर और सेवा भाव से उनकी सेवा की. साधु उसकी सेवा से बहुत खुश हुए और उसे आशीर्वाद दिया. लेकिन ध्यान लगाकर उन्होंने कहा कि इस कन्या के हाथों में विवाह का योग नहीं है.
यह सुनकर माता-पिता बहुत चिंतित हो गए और साधु से उपाय पूछने लगे. साधु ने ध्यान करके बताया कि पास के एक गांव में ‘सोना’ नाम की एक धोबिन रहती है, जो बहुत धर्मपरायण और अपने पति के प्रति समर्पित है. अगर यह कन्या उसकी सेवा करे और वह अपने मांग का सिंदूर इस लड़की की मांग में लगा दे, तो इसके विवाह का योग बन सकता है. अगले ही दिन से वह लड़की रोज सुबह अंधेरे में उठकर सोना धोबिन के घर जाने लगी. वह चुपचाप घर के सारे काम कर देती और बिना किसी को बताए वापस आ जाती.
कुछ दिनों बाद सोना धोबिन को शक हुआ कि आखिर घर का काम कौन करता है. उसने और उसकी बहू ने एक दिन निगरानी की. तब उन्होंने देखा कि एक लड़की सुबह-सुबह आकर सारा काम कर जाती है. जब उन्होंने उस लड़की को रोका और पूछा, तब उसने सारी सच्चाई बता दी. सोना धोबिन उसकी भक्ति और सेवा से प्रभावित हो गई और उसकी मदद करने के लिए तैयार हो गई.
एक दिन उसने अपने मांग का सिंदूर उस लड़की की मांग में भर दिया. लेकिन उसी समय उसके पति की मृत्यु हो गई. यह जानकर भी वह घबराई नहीं. उस दिन सोमवती अमावस्या थी. वह बिना पानी पिए घर से निकली थी. उसने सोचा कि पीपल के पेड़ की पूजा करके ही जल ग्रहण करेगी. रास्ते में उसने ईंट के टुकड़ों से 108 बार भंवरी दी और पीपल के पेड़ की 108 बार परिक्रमा की. उसकी सच्ची श्रद्धा और भक्ति के कारण चमत्कार हुआ. उसके पति के मृत शरीर में फिर से प्राण आ गए और वह जीवित हो उठे. इस तरह उस धोबिन की तपस्या और सेवा भावना ने न केवल एक लड़की का जीवन सुधारा, बल्कि उसके अपने पति को भी नया जीवन दे दिया.
शिवजी की आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥
ओम जय शिव ओंकारा॥ स्वामी ओम जय शिव ओंकारा॥
-------समाप्त-------