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गुरु पूर्णिमा व्रत कथा (Guru Purnima Vrat Katha)

गुरु पूर्णिमा व्रत कथा

गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है. इस शुभ दिन पर श्रद्धापूर्वक व्रत रखने और कथा का श्रवण करने से ज्ञान, विवेक, अनुशासन, एकाग्रता और सकारात्मक सोच को बढ़ावा मिलता है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन गुरु की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सफलता व आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है.

गुरु पूर्णिमा व्रत कथा
गुरु पूर्णिमा व्रत कथा

धार्मिक कथा के अनुसार, महर्षि वेदव्यास जी को भगवान विष्णु का अंश माना गया है. वेदव्यास जी की माता का नाम सत्यवती और पिता का नाम ऋषि पराशर था. महर्षि वेदव्यास जी को बचपन से ही अध्यात्म में बहुत रुचि थी. एक बार उन्होंने अपने माता-पिता से प्रभु के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की और वन में तपस्या करने की अनुमति मांगी. वेदव्यास जी की इस बात को सुनकर उनकी माता ने उन्हें वन जाने को मना कर दिया. मां के मना करने पर भी वेदव्यास जी वन जाने की हठ करने लगें. 

 

वेदव्यास जी के हठ करने की वजह से माता सत्यवती को उन्हें वन जाने की आज्ञा देनी पड़ी. जब वेदव्यास जी वन की ओर जा रहे थे, तब उनकी माता ने उनसे कहा कि जब तुम्हें अपने घर की याद आ जाए, तो तुम वापस आ जाना. माता के इस वचन को सुनकर वेदव्यास जी वन की तरफ चल दिए.

 

वन में जाकर वेदव्यास जी कठोर तपस्या करने लगें. भगवान के आशीर्वाद से वेदव्यास जी को संस्कृत भाषा का ज्ञान हो गया. इसके बाद उन्होंने वेद, महाभारत 18 महापुराणों एवं ब्रह्म सूत्र की रचना की. लोगों को वेदों का ज्ञान देने की वजह से आज भी इन्हें गुरु पूर्णिमा के दिन प्रथम गुरु के रूप में याद किया जाता है.

 

भारतीय ज्ञान परंपरा को व्यवस्थित स्वरूप देने के कारण उन्हें आदि गुरु का सम्मान प्राप्त हुआ. यही वजह है कि गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है.

 

आरती

 

जय गुरुदेव अमल अविनाशी, ज्ञानरूप अन्तर के वासी,
पग पग पर देते प्रकाश, जैसे किरणें दिनकर कीं।
आरती करूं गुरुवर की॥
 

जब से शरण तुम्हारी आए, अमृत से मीठे फल पाए,
शरण तुम्हारी क्या है छाया, कल्पवृक्ष तरुवर की।
आरती करूं गुरुवर की॥
 

ब्रह्मज्ञान के पूर्ण प्रकाशक, योगज्ञान के अटल प्रवर्तक।
जय गुरु चरण-सरोज मिटा दी, व्यथा हमारे उर की।
आरती करूं गुरुवर की।
 

अंधकार से हमें निकाला, दिखलाया है अमर उजाला,
कब से जाने छान रहे थे, खाक सुनो दर-दर की।
आरती करूं गुरुवर की॥
 

संशय मिटा विवेक कराया, भवसागर से पार लंघाया,
अमर प्रदीप जलाकर कर दी, निशा दूर इस तन की।
आरती करूं गुरुवर की॥
 

भेदों बीच अभेद बताया, आवागमन विमुक्त कराया,
धन्य हुए हम पाकर धारा, ब्रह्मज्ञान निर्झर की।
आरती करूं गुरुवर की॥

 

करो कृपा सद्गुरु जग-तारन, सत्पथ-दर्शक भ्रांति-निवारण,
जय हो नित्य ज्योति दिखलाने वाले लीलाधर की।
आरती करूं गुरुवर की॥

 
प्यारे गुरुवर की आरती, आरती करूं गुरुवर की।

 

-------समाप्त-------
 

समाप्त

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