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Mahabharat Facts: महाभारत के वह अनसुलझे रहस्य, जो आज तक नहीं थे आपको पता! जानें

Mahabharat Facts: महाभारत केवल एक युद्ध की गाथा नहीं, बल्कि गूढ़ रहस्यों और जीवन दर्शन से भरा ग्रंथ है. जानें वेदव्यास, शिशुपाल और दुर्योधन से जुड़े 3 सबसे बड़े और अद्भुत. रहस्य.

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महाभारत (Photo: ITG)
महाभारत (Photo: ITG)

Mahabharat Facts: महाभारत धर्म और अधर्म के बीच लड़ा गया एक ऐसा युद्ध था, जिसमें सिर्फ लाखों सैनिकों की ही नहीं, बल्कि कई रिश्तों की भी मृत्यु हुई थी. इस युद्ध में भाई ने भाई को मारा, शिष्य ने गुरु के खिलाफ युद्ध किया, चाचा और भतीजे आमने-सामने आए और न जाने कितने रिश्तों की आहुति इस महायुद्ध में देनी पड़ी. हर तरफ फैले शव और युद्ध का विनाश यह संदेश देते हैं कि जब समाज अधर्म की राह पर आगे बढ़ता है, तो विनाश और महाभारत जैसी स्थिति पैदा होना तय हो जाता है. तो आइए आज हम महाभारत से जुड़े कुछ अनसुने और रोचक रहस्यों के बारे में जानते हैं.

अंबिका, अंबालिका और विदुर के जन्म की कहानी

अगर आपको याद हो तो महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह की मृत्यु का कारण शिखंडी बने थे. शिखंडी अपने पूर्व जन्म में काशी की राजकुमारी अंबा थीं. भीष्म से बदला लेने के लिए अंबा ने कठोर तपस्या की और भगवान शिव से वरदान प्राप्त किया. इसके बाद अगले जन्म में उनका जन्म शिखंडी के रूप में हुआ और वह भीष्म पितामह की मृत्यु का कारण बने.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि अंबा की दो बहनें भी थीं, जिनका नाम अंबिका और अंबालिका था. इन दोनों का विवाह हस्तिनापुर के राजा विचित्रवीर्य से हुआ था. विवाह के कुछ समय बाद ही विचित्रवीर्य की मृत्यु हो गई. उनके कोई संतान नहीं थी, जिसके कारण हस्तिनापुर के सिंहासन के उत्तराधिकारी को लेकर संकट खड़ा हो गया था. विचित्रवीर्य की मां सत्यवती को इस बात की चिंता सताने लगी कि आखिर उनके बाद हस्तिनापुर का सिंहासन कौन संभालेगा. इस समस्या का समाधान निकालने के लिए सत्यवती ने अपने विवाह से पहले जन्मे पुत्र महर्षि वेदव्यास को बुलाया.

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महर्षि वेदव्यास ने सत्यवती को नियोग की व्यवस्था के माध्यम से वंश आगे बढ़ाने का उपाय बताया. इसके बाद सत्यवती ने अंबिका और अंबालिका को वेदव्यास के पास जाने का आदेश दिया था. कथा के अनुसार, जब अंबिका वेदव्यास के सामने गईं तो उनके तेज और स्वरूप को देखकर भयभीत हो गईं और उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं. माना जाता है कि इसी कारण उनके पुत्र धृतराष्ट्र जन्म से नेत्रहीन हुए.

वहीं, जब अंबालिका वेदव्यास के सामने पहुंचीं तो भय के कारण उनका चेहरा पीला पड़ गया. इसके बाद उनके पुत्र पांडु का जन्म हुआ, जिनका रंग पीला और शरीर कमजोर बताया जाता है.

एक स्वस्थ और योग्य पुत्र की कामना से सत्यवती ने अंबिका को एक बार फिर वेदव्यास के पास जाने के लिए कहा. लेकिन अंबिका पहले ही इतनी भयभीत थीं कि वह दोबारा जाने के लिए तैयार नहीं हुईं. उन्होंने अपनी जगह अपनी दासी को वेदव्यास के पास भेज दिया. दासी ने बिना भय के वेदव्यास का स्वागत किया, जिसके बाद विदुर का जन्म हुआ. आगे चलकर विदुर कुरु वंश के सबसे बुद्धिमान और प्रमुख सलाहकारों में से एक बने.

श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की 100 गलतियां क्यों माफ कीं?

महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण को कई रूपों में देखा गया है. कहीं वह अधर्म और पाप का नाश करने वाले हैं, तो कहीं अर्जुन के सारथी बनकर उन्हें धर्म का मार्ग दिखाते हैं. श्रीकृष्ण ने ही अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान भी दिया था. लेकिन, श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ा एक ऐसा प्रसंग भी है, जिसमें उन्होंने बार-बार अपना अपमान करने वाले व्यक्ति को नजरअंदाज किया. वह व्यक्ति था शिशुपाल.

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जब युधिष्ठिर ने इंद्रप्रस्थ में राजसूय यज्ञ का आयोजन किया था, तब श्रीकृष्ण को विशेष सम्मान दिया गया. लेकिन यह बात शिशुपाल को बिल्कुल पसंद नहीं आई. वह श्रीकृष्ण से ईर्ष्या करता था और भरी सभा में उनका अपमान करने लगा था. इसके बावजूद श्रीकृष्ण लंबे समय तक शांत रहे. इसके पीछे एक वचन था, जो उन्होंने शिशुपाल की मां को दिया था.

कथा के अनुसार, शिशुपाल का जन्म सामान्य बालक की तरह नहीं हुआ था. उसके जन्म के समय उसके चार हाथ और तीन आंखें थीं. साथ ही यह भविष्यवाणी हुई थी कि जिस व्यक्ति की गोद में बैठते ही उसके अतिरिक्त हाथ और आंख गायब हो जाएंगे, वही व्यक्ति भविष्य में उसका वध करेगा.

जब शिशुपाल को श्रीकृष्ण की गोद में रखा गया तो उसके अतिरिक्त दो हाथ और एक आंख गायब हो गए. यह देखकर उसकी मां भयभीत हो गईं. उन्होंने श्रीकृष्ण से अपने पुत्र के प्राणों की रक्षा करने की प्रार्थना की. तब श्रीकृष्ण ने अपनी बुआ से वचन दिया कि वह शिशुपाल की 100 गलतियों को क्षमा करेंगे.

बड़े होने के बाद शिशुपाल रुक्मिणी से विवाह करना चाहता था, लेकिन रुक्मिणी भगवान श्रीकृष्ण से प्रेम करती थीं और उन्होंने श्रीकृष्ण को अपना पति चुना. कहा जाता है कि इस घटना के बाद शिशुपाल के मन में श्रीकृष्ण के प्रति ईर्ष्या और बढ़ गई. राजसूय यज्ञ के दौरान जब शिशुपाल लगातार श्रीकृष्ण का अपमान करता रहा और उसकी 100 गलतियां पूरी हो गईं, तब श्रीकृष्ण अपने वचन से मुक्त हो गए. इसके बाद जब शिशुपाल ने सीमा पार कर दी, तो श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया.

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दुर्योधन का पूरा शरीर वज्र जैसा क्यों नहीं बन पाया?

महाभारत युद्ध के अंतिम चरण में गांधारी अपने लगभग सभी पुत्रों को खो चुकी थीं. उनके केवल एक पुत्र दुर्योधन जीवित था. इसलिए वह किसी भी तरह उसकी रक्षा करना चाहती थीं. कथा के अनुसार, गांधारी ने वर्षों तक आंखों पर पट्टी बांधकर तप और संयम का जीवन बिताया था. माना जाता है कि इससे उनकी दृष्टि में विशेष शक्ति आ गई थी. उन्होंने दुर्योधन से कहा कि वह गंगा में स्नान करने के बाद बिना वस्त्र धारण किए उनके सामने आए, ताकि उनकी दिव्य दृष्टि से उसका शरीर अत्यंत मजबूत और अभेद्य हो सके.

दुर्योधन अपनी मां की आज्ञा मानकर स्नान के बाद उनके पास जा रहा था. रास्ते में उसकी मुलाकात श्रीकृष्ण से हुई. श्रीकृष्ण ने उससे कहा कि एक बड़े पुत्र का अपनी मां के सामने बिना वस्त्रों के जाना उचित नहीं है. दुर्योधन इस बात को लेकर दुविधा में पड़ गया. उसने अपनी कमर और जंघाओं को पत्तों से ढक लिया और इसके बाद अपनी मां के सामने पहुंचा.

गांधारी ने अपनी आंखों से पट्टी हटाई और दुर्योधन के शरीर को देखा. उनकी दृष्टि के प्रभाव से दुर्योधन का अधिकांश शरीर वज्र के समान कठोर हो गया. लेकिन शरीर का वह हिस्सा, जिसे उसने पत्तों से ढका हुआ था, उनकी दृष्टि के प्रभाव से वंचित रह गया.

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इसके बाद दुर्योधन और भीम के बीच गदा युद्ध हुआ. दुर्योधन का शरीर बेहद मजबूत होने के कारण भीम के प्रहार उस पर ज्यादा असर नहीं कर रहे थे. तब श्रीकृष्ण ने संकेत के माध्यम से भीम को दुर्योधन की जंघा पर प्रहार करने के लिए कहा.

श्रीकृष्ण का संकेत समझते ही भीम ने दुर्योधन की जंघा पर प्रहार किया. वह गंभीर रूप से घायल हो गया और अंततः उसकी मृत्यु हो गई. इस तरह महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ और इसे अधर्म पर धर्म की जीत के रूप में देखा गया. महाभारत केवल एक युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि यह जीवन, रिश्तों, कर्तव्य, न्याय, धर्म और कर्म के गहरे संदेशों से भरा हुआ एक महान ग्रंथ है.

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